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भरण पोषण और वाद खर्च बनाम लैंगिक न्याय

भरण पोषण और वाद खर्च बनाम लैंगिक न्याय

आज विवाह एक कानूनी मसला भी है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जहां करीब एक दशक पहले 1000 में से मुश्किल से एक विवाहित जोड़ा तलाक के लिए कोर्ट जाता था, वहीं अब यह आंकड़ा करीब 15 प्रति हजार है। इसका कारण चाहे जो भी हो, लेकिन भारत में विवाह अब पारिवारिक पहलुओं से हटकर कानूनी पेचदगियों में फंसने लगा है। आज आलम यह है कि दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बंगलौर, लखनऊ, गाजियाबाद, हैदराबाद जैसे बड़े शहरों में हर महीने में सैकड़ों की संख्या में तलाक के केस फाइल किए जाते हैं। वैवाहिक मामलों में कानून और न्यायपालिका महिलाओं के प्रति हमेशा से उदार रहा है और अक्सर पुरुषों की शिकायत रहती है कि उनके साथ केवल पुरुष होने के कारण भेदभाव होता है। उन्हें यह भेदभाव तब और भी अधिक अखरता है जब कानून के महिलाओं के पक्ष में ज्यादा झुके होने से, उन्हें कोई खास मदद नहीं मिल पाती। आज भी समाज इस भ्रामक धारणा पर चलता है कि किसी पुरुष द्वारा महिला के खिलाफ तलाक की याचिका फाइल करना उसके प्रति क्रूरता है और महिला द्वारा पुरुष के खिलाफ तलाक याचिका फाइल करना महिला सशक्तिकरण और नारी मुक्ति आंदोलन का हिस्सा है। यहां अभी हमारे कानून को थोड़ा और परिपक्व होने की जरूरत है ताकि हम लैंगिक विभेदीकरण वाली कानून व्यवस्था से आगे चलकर वास्तविक लैंगिक न्याय व्यवस्था की स्थापना कर सकें।

आज के समय में ऐसे पुरुषों की संख्या करोड़ों में है, जो अपने वैवाहिक जीवन से दुखी हैं लेकिन इसके बावजूद तलाक की याचिका दायर करने वाले पुरुषों की संख्या लाख से भी कम है। इसका कारण है कि सामाजिक और पारिवारिक दबाव, जिसमें उसका पक्ष सुने बिना ही उसे क्रूर करार दे दिया जाता है। इसके अलावा अगर कोई पुरुष बहुत ही अधिक प्रताडि़त होकर, किसी तरह से हिम्मत दिखाता भी है तो उसे तुरंत आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 125 (भरण-पोषण), भारतीय दंड संहिता 498ए (पत्नी और उसके नातेदारों के साथ क्रूरता), 406 (अमानत में खयानत), हिन्दू विवाह अधिनियम 1956 की धारा 24 (भरण-पोषण और वाद खर्च), घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 के तहत अत्यधिक प्रताडऩा झेलनी पड़ती है और बिना किसी अपराध के मुकदमा लडऩे की सजा भुगतनी पड़ती है।

यही नहीं महिलाएं अपने पति को परेशान करने के लिए भरण और पोषण का मुकदमा ऐसे जगह से फाइल करती हैं, जहां पति को अधिक से अधिक यात्रा करके केस लडऩा पड़े क्योंकि आपराधिक प्रक्रिया संहिता 125 के अनुसार भरण-पोषण का मुकदमा किसी पत्नी द्वारा वहाँ से चलाया जा सकता है, जहां वह मौजूदा समय में रह रही हो। महिलाएं इस प्रावधान का फायदा उठाकर पति को शारीरिक, आर्थिक और मानसिक रूप से परेशान करती हैं, लेकिन ऐसा नहीं है कि इसके खिलाफ ऊपरी अदालतों में मजबूती से अपना तर्क रखने पर सफलता नहीं मिल सकती है। उच्चतम न्यायालय की जस्टिस बी एस चौहान और जस्टिस जे एस खेहर की बेंच ने 7 जनवरी, 2013 को दीपांकर घोष बनाम मौखी दत्ता के केस में पत्नी द्वारा अगरतल्ला में दायर किए गए भरण पोषण (सीआरपीसी 125) और घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 के दो केसों को पति की याचिका पर हैदराबाद में स्थानांतरित करने का आदेश पारित किया।

इसी तरह से उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एच एल दत्तू और जस्टिस ए के सीकरी की बेंच ने 8 जनवरी, 2015 को तलाक के एक मामले में पत्नी की गाजियाबाद से बेतुल स्थानांतरित करने की याचिका को खारिज कर दिया था। बेंच ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था, ‘महिलाओं की ट्रांसफर पिटीशन को लेकर हमारा रुख हमेशा से नरम रहा है और हम उनकी सुविधानुसार केस ट्रांसफर करते रहे हैं लेकिन अब हम मेरिट पर डिसाइट करेंगे, आखिर पति ही हमेशा क्यों सफर करे?’

भरण-पोषण और वाद खर्च का प्रावधान जरूरमंद महिलाओं के लिए बनाया गया है, जो कम पढ़ लिखी हैं, अशक्त हैं और उनके पास कोई हुनर या व्यावसायिक योग्यता नहीं है लेकिन पढ़ी-लिखी और व्यावसायिक योग्यता रखने वाली चालक औरतें इस कानून का इतना अधिक बेजा इस्तेमाल करने लगी हैं कि इस तरह के केसों की विश्वसनीयता पर संकट छाने लगा है। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने 24 मार्च, 2000 को ममता बनाम राजेश के वाद में उच्च शिक्षा प्राप्त और जॉब करने में सक्षम महिला को भरण-पोषण प्राप्त करने का अधिकारी नहीं माना है। यही नहीं न्यायालय ने ऐसी महिला द्वारा मुकदमा लडऩे के लिए एक सहायक के खर्च को भी देने से मना कर दिया। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इस वाद में कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि एक महिला जो पढ़ी-लिखी है और पूरी तरह से नौकरी करने में सक्षम है, वह अपने पति पर आर्थिक भार नहीं बन सकती क्योंकि हर कोई अपनी जरूरतों के लिए कमाता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि सक्षम लोगों को भरण-पोषण का लाभ देने का मतलब है, समाज में अकर्मण्यता को बढ़ावा देना और उसे पीछे की ओर ले जाना। इसी तरह वर्ष 2008 में दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस एस एन धींगरा ने एक एमबीबीएस पत्नी को भरण-पोषण के एवज में गांव में जाकर नि:शुल्क चिकित्सा सेवा की शर्त रखी क्योंकि पत्नी ने अपनी याचिका में कहा था कि वह अपनी योग्यता का व्यावसायिक इस्तेमाल नहीं करती है। हाल ही में दिल्ली की एक कोर्ट ने पढ़ी-लिखी और सक्षम महिला को केवल साल तक के लिए गुजारे-भत्ते का योग्य माना और आदेश दिया कि इस एक साल की अवधि में वह नौकरी खोज ले, जिसमें उसका पति उसे मदद करेगा।

आज भी न्यायालयों का झुकाव महिलाओं के प्रति ज्यादा है लेकिन ऐसे न्यायिक विवेक वाले जजों की संख्या बढ़ रही है जो महिला और पुरुष से आगे बढ़कर मेरिट के आधार पर फैसले दे रहे हैं। अगर पत्नी बिना पर्याप्त आधार के पति से अलग रह रही है या वह अपनी स्वेच्छा से पति के आवास को छोडकर चली गयी है या उसने अपने पति का त्याग कर दिया है या उसका किसी और पुरुष से संबंध है या वह नौकरी कर रही है या उच्च शिक्षा प्राप्त है और नौकरी करने या कोई व्यवसाय करने में सक्षम है तो वह गुजारे-भत्ते की हकदार नहीं होगी। इसके साथ ही अगर यह साबित होता है कि पत्नी ने पति के साथ क्रूरता की है तो भी वह गुजारे-भत्ते की हकदार नहीं होगी।

सबसे पेंचीदा मामला है वाद खर्च का है। पति ने जैसे ही अपनी पत्नी से प्रताडि़त होकर तलाक की याचिका डाली, वैसे ही पत्नी का वकील तुरंत ही हिन्दू विवाह अधिनियम 1956 के धारा 24 के तहत मुकदमा खर्चा की याचिका लगा देता है। यह व्यवहार में है कि जब तक धारा 24 की याचिका का निस्तारण नहीं हो जाता है तब तक तलाक की याचिका पर विचार नहीं किया जाता है। सामान्यत: न्यायालय यह मानती हैं कि पत्नी को पति के खिलाफ वाद खर्च मिलना ही चाहिए। इसी तरह से वाद खर्च में एक बड़ा हिस्सा वकीलों का होता है, जो हर हाल में वाद खर्च का ऑर्डर करवाना ही चाहते हैं। कानूनी रूप से पतियों के लिए इस दोहरे दबाव से बचना बहुत ही मुश्किल हो जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वकीलों के अपने स्वार्थ हैं और जज डाइनैमिक नहीं है। गुजरात हाईकोर्ट ने 1997 में इसी तरह के एक वाद में आदेश पारित करते हुए कहा कि हिन्दू विवाह अधिनियम 1956 पहले का है जबकि उसके बाद विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 लागू हो चुका है, जिसमें आर्थिक रूप अक्षम लोगों के लिए अनिवार्य रूप से नि:शुल्क विधिक सहायता का प्रावधान है यानि अगर कोई भी नागरिक कहता है कि उसके पास मुकदमा लडऩे के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं है तो विधिक सेवा प्राधिकरण यह सुविधा उपलब्ध कराएगी। इस तरह का प्रावधान होते हुए भी अगर वकील वाद खर्च का लंबा चौड़ा व्योरा प्रस्तुत करता है तो यह वकील द्वारा शोषण है जो विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 की नि:शुल्क न्याय की मंशा के खिलाफ है। इस तरह से साफ है कि यह प्रावधान किसी भी पत्नी पर लागू होता है और पति को वाद का खर्चा उठाने के लिए आदेशित करना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता है।

भारतीय संविधान ने पुरुष और महिला को समान शिक्षा और रोजगार के अधिकार दिये हैं। आज के युग में एक महिला के नियंत्रण में भी सैकड़ों या हजारों पुरुष काम करते हैं। इसलिए उच्च शिक्षा प्राप्त और नौकरी करने के योग्य अथवा नौकरी कर रही या कर चुकी, कोई भी महिला सामाजिक या आर्थिक हैसियत में आज किसी भी पुरुष से कम नहीं है, चाहे वह वह उसका पति ही क्यों न हो। कोई भी महिला यह कहकर अपने आप को जीविका कमाने के लिए असक्षम घोषित नहीं कर सकती कि उसने अपनी व्यावसायिक डिग्री केवल शौक के लिए ली है। इसी तरह से कोई महिला खुद से पति के आवास और नौकरी को छोडकर बिना किसी ठोस वजह के पिता के आवास पर आकर रहने मात्र से भोली-भाली गुडिय़ा अथवा आजीविका कमाने में असक्षम नहीं बन जाती है। इस तरह से असक्षम महिलाओं के हित के लिए बनाए गए कानूनों के व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त और सक्षम महिलाओं दावरा दुरुपयोग किए जाने से न्याय की मूल भावना की अवहेलना होती है और लैंगिक बराबरी के समाज के निर्माण की प्रक्रिया बाधित होती है। यह उन महिलाओं का मजाक उड़ाना है, जो अभावों के चलते अच्छी शिक्षा, व्यावसायिक डिग्री तथा रोजगार के अवसर से वंचित है। अब समय आ गया है कि भरण-पोषण के मामले को पति अथवा पत्नी के चश्मे से बाहर निकलकर, मेरिट के आधार पर तय किया जाय। किसी भी महिला को हक नहीं होना चाहिए कि व्यावसायिक योग्यता और जॉब करने की क्षमता होने के बावजूद वह खुद को खुद से ही असक्षम बना ले। इससे एक अकर्मण्य समाज के निर्माण को बढ़ावा मिलेगा, जो एक स्वस्थ समाज के लिए चिंता का विषय है। यही कारण है कि समाज में ऐसी महिलाओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है। आज विवाह जैसी संस्था की विश्वसनियता को धनलोलुप महिलाओं से बचाना बहुत ही जरूरी हो गया है, जिससे समाज आगे बढ़ सके और एक बराबरी के समाज के निर्माण की संकल्पना केवल संकल्पना बनकर न रह जाय बल्कि वास्तविक धरातल पर साकार होता भी दिखे।

 विनय जायसवाल

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