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मुम्बई का महालक्ष्मी मंदिर आस्था का केंद्र

मुम्बई का महालक्ष्मी मंदिर  आस्था का केंद्र

भारत में बहुत सारे मंदिर हैं जहां आस्था और विश्वास का अदभुत नजारा देखने को मिलता है। इसी क्रम में मुम्बई के महालक्ष्मी मंदिर का नाम अगर न लिया जाये ये बेमानी होगा। मुम्बई का महालक्ष्मी मंदिर अपने आप में काफी अदभुत एवं आस्था का प्रतीक है। देश भर से श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं और काफी सुकून पाते हैं। मुम्बई के भूलाभाई देसाई मार्ग पर समुद्र के किनारे स्थित इस मंदिर की सुंदरता अवर्णनीय है। यहां पहुंचकर ही आपको असीम शांति मिलेगी। इस आकर्षक मंदिर के पीछे भी एक अनोखी घटना है। बताया जाता है कि बहुत समय पहले मुम्बई में वर्ली और मालाबार हिल को जोडऩे के लिए दीवार का निर्माण-कार्य चल रहा था। सैंकड़ों मजदूर इस दीवार के निर्माण-कार्य में लगे हुए थे, मगर हर दिन कोई-न-कोई बाधा आ रही थी। इसके कारण ब्रिटिश इंजीनियर काफी परेशान हो गए। इतनी मेहनत के बावजूद भी दीवार खड़ी नहीं हो पा रही थी। कई बार तो पूरी की पूरी दीवार ढह गई। समस्या को कोई समाधान नहीं मिल रहा था। इसी बीच इस प्रोजेक्ट के मुख्य अभियंता ने एक अनोखा सपना देखा। सपने में मां लक्ष्मी प्रकट हुईं और कहा कि वर्ली में समुद्र के किनारे मेरी एक मूर्ति है। उस मूर्ति को वहां से निकालकर समुद्र के किनारे ही मेरी स्थापना करो। ऐसा करने से हर बाधा दूर हो जाएगी और वर्ली-मालाबार हिल के बीच की दीवार आसानी से खड़ी हो जाएगी। मुख्य अभियंता को काफी आश्चर्य हुआ। उसने मजदूरों को स्वप्न में बताये गए स्थान पर जाने को कहा और मूर्ति ढूंढ लाने का आदेश दिया। आदेशनुसार कार्य शुरू हुआ। थोड़ी मेहनत के बाद ही महालक्ष्मी की एक भव्य मूर्ति प्राप्त हुई। यह देखकर स्वप्न पाने वाले अभियंता का शीश नतमस्तक हो गया। पहले वह असमंजस में था कि पता नहीं सपने कि बात सत्य है या नहीं। लेकिन सपना सच होते ही उसका रोम-रोम श्रद्धा से रोमांचित हो उठा। माता के आदेशानुसार समुद्र के किनारे ही उस मूर्ति की स्थापना की गई और छोटा सा मंदिर बनवाया गया। मंदिर के निर्माण के बाद वर्ली-मालाबार हिल के बीच की दीवार बिना किसी विघ्न-बाधा के खड़ी हो गई। इसपर प्रोजेक्ट में शामिल लोगों ने सुकून की सांस ली। ब्रिटिश अधिकारियों को भी दैवीय शक्ति पर भरोसा करना पड़ा। इसके बाद तो इस मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमडऩे लगी। सन 1831 में धाकजी दादा जी नामके एक व्यवसायी ने छोटे से मंदिर को बड़ा स्वरुप दिया एवं इसका जीर्णोद्धार कराया।01-10-2016

समुद्र के किनारे होने के कारण मंदिर की सुंदरता देखते ही बनती है। यहां आपको महालक्ष्मी के अलावा महाकाली महालक्ष्मी की भव्य प्रतिमा भी देखने को मिलेगी। दोनों प्रतिमाओं को सोने की नथ, सोने की चूडिय़ां एवं मोतियो के हार से सजाया गया है। इन प्रतिमाओं के दर्शन से ही चित्त भाव-विभोर हो जाता है। इस मंदिर में महालक्ष्मी को शेर पर सवार दिखाया गया है जो महिसासुर का वध कर रही हैं। दरअसल माता के इन तीनो रूपों को बनाया गया है। आमतौर पर दर्शनार्थी महालक्ष्मी की वास्तविक प्रतिमा नहीं देख पाते हैं क्योंकि वास्तविक प्रतिमा को आवरण से ढंक दिया जाता है। यहां के पुजारी ने बताया की असली प्रतिमा को देखने के लिए रात को यहां आना पड़ता है। रात के लगभग साढ़े नौ बजे वास्तविक प्रतिमा से आवरण हटाया जाता है। 10 से 15 मिनट के बाद पुन: प्रतिमा के ऊपर आवरण चढ़ा दिया जाता है। प्रतिमा के वास्तविक रूप का दर्शन कम ही लोग कर पाते हैं। रात में आवरण से ढंकने के उपरांत मंदिर का दरवाजा बंद हो जाता है।

01-10-2016

सुबह साफ-सफाई के बाद माताओं का अभिषेक होता है और फिर देश भर से आए दर्शनार्थियों के दर्शनों का सिलसिला शुरू हो जाता है। मंदिर में एक दीवार है जहां आपको बहुत सारे सिक्के चिपके हुए मिलेंगे। कहा जाता है कि भक्तगण अपनी मनोकामना के साथ सिक्के चिपकाते हैं यहां। ऐसा कहा जाता है कि सच्चे दिल से मांगी गई हर मनोकामनाएं यहां पूरी होती हैं। आप भी सिक्के चिपका कर देख सकते। इस दीवार पर आसानी से सिक्के चिपक जाते हैं।

मुम्बई की किसी भी जगह से भुलाभाई देसाई मार्ग पहुंचा जा सकता है। इसके लिए आप टैक्सी या बस का सहारा ले सकते हैं।

संजय सिन्हा

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