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हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा

हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा

अदम्य साहस, विरले आत्मविश्वास और प्रचंड ईच्छाशक्ति ने श्री कन्नूभाई एच. टेलर को अपनी शारीरिक असहायता पर विजय पाकर शरीर से अक्षम लोगों की मदद के लिए ‘डिसेबल वेलफेयर ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ को असीम ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उन्होंने उदय इंडिया के महेंद्र राउत से बातचीत में अपने जीवन के संघर्षों की विस्तार से चर्चा की। कुछ अंश:-

आपके जीवन में कब और कैसी प्रेरणा जगी कि आज हम सूरत में आपका ऐसा विशाल रूप देख पा रहे हैं ?

मैं 10वीं कक्षा में पढ़ता था और पैर घिसट-घिसट कर स्कूल जाया करता था। बच्चे मेरा मजाक उड़ाया करते थे। उस समय मेरे मन में आता कि जिंदगी को खत्म कर देना ही, इस जलालत से छुटकारा पाने का एकमात्र सही उपाय है। अचानक एक दिन बिना कुछ सोचे-समझे मैंने 10-12 नींद की गोलियां खा लीं और बिस्तर पर गिर गया। अगली सुबह जब मेरी आंख खुली तो दिल से एक गहरी आवाज आई, अभी तो वक्त शुरू हुआ है! मन में एक संकल्प जगा कि  जिंदगी में बहुत कुछ हासिल करना है, जिंदगी को खत्म करने से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला। तब मैंने बड़े आत्मविश्वास के साथ कॉलेज में दाखिला लिया। वहां लोगों और दोस्तों से मैंने बहुत कुछ सीखा। कॉलेज की पढ़ाई पूरी होने के बाद 1985 में मैं सूरत चला आया। सूरत में तीन साल अपने काम में लगा रहा लेकिन उन तीन साल में भी, एक बात रोजाना मेरे मन में टीसती रहती थी कि मुझे दिव्यांगलोगों की दर्दभरी जिंदगी में एक नया सवेरा जरूर लाना है जिससे उनमें कभी अपने को कमजोर समझने का एहसास न गहराए। इसलिए मैंने दिव्यांग लोगों के लिये एक संस्थान की स्थापना की, जो भगवान की कृपा से उन दिव्यांग बच्चों के लिए काफी मददगार साबित हो रही है और पूरे एशिया में सबसे बड़ी संस्था हो गई है।

01-10-2016

आज भारत में विकलांगों की संख्या अधिक है और कई संस्थाएं उनके बीच कार्य कर रही हैं। आपकी संस्था में दूसरों से अलग क्या है, इन लोगों के लिए?

यह संस्थान मैंने चार बच्चों से शुरू किया था। थोड़े दिनों बाद एक-एक करके चारों ने आना छोड़ दिया। वजह जानने के लिए एक दिन मैं उन बच्चों के घर पहुंचा। उनके  घरवालों ने बताया ”कन्नू भाई हमारी घरेलु स्थिति इतनी अच्छी नहीं है कि हम हर दिन अपने विकलांग बच्चों के आने-जाने का खर्च उठा सकें। बेहतर यह होगा कि हम अपने बच्चों को घर पर रखकर उसी पैसे से इनके खाने और दवाइयों की व्यवस्था करें।’’ यह सुनकर मुझे भारी दुख हुआ। लेकिन कुछ साल बाद एक दाता ने मुझे एक रिक्शा उपहार में दिया तो उस दुख का समाधान दिखने लगा। फिर एक से काम चलना मुश्किल हो गया तो दूसरा रिक्शा भी दिया। इस तरह की मदद से मेरी संस्था से साल भर में ही तकरीबन 113 बच्चे आ जुड़े। फिर मुझे लगा कि अगर मैं इन सभी बच्चों को खाना-पीना और आने-जाने कीसुविधा मुहैया करा पाया  तभी इन बच्चों का भविष्य सुधारा जा सकता है। यह सोचकर मैंने विकलांग बच्चों के लिए यह सुविधा मुफ्त उपलब्ध करवाई। ये कोशिशें सफलता की नई कहानी रचने लगीं।  अब तक मेरी संस्था से निकले करीब 3000 बच्चे विभिन्न क्षेत्रों में सफलता के झंडे गाड़ रहे हैं। कोई डॉक्टर बना तो कोई इंजीनियर, कोई वकील है तो कोई शिक्षक। आज इसी सफलता के चलते कोई विकलांग बच्चा यहां सड़कों पर नहीं है। यह इस संस्थान के लिये एक गर्व की बात है। शुरू में संस्थान में सातवीं तक पढ़ाई होती थी। उसके बाद बच्चे घर पर रहते थे और उनकी जिंदगी थम जाती थी। उन्हें दर्दनाक कठिनाइयों का सामाना करना पड़ता था। इस एहसा के साथ मैंने स्कूल को कक्षा 8वीं तक कर दिया। लेकिन उससे कोई फर्क नहीं पड़ा। धीरे-धीरे 9वीं और फिर 12वीं तक पढ़ाई शुरू हुई। उसके बाद कॉलेज भी शुरू किया गया।  लेकिन जब पता चला कि बच्चों के आने जाने की समस्या बड़ी है और उनके मां-बाप भी उनको कॉलेज में नहीं भेजने से हिचकते हैं। उनके आसपास के  कॉलेज में भी आने जाने की सुविधा उपलब्ध नहीं है। कॉलेज की फीस भरने में भी मुश्किल होती है। इन सभी समस्याओं पर विचार करके हमने बच्चों के लिये बीसीए कॉलेज शुरू किया। इस कोर्स के बाद विकलांगों को कंप्यूटर से संबंधित नौकरी आराम से मिल जाती है। आज इस व्यवस्था को भी चालू किये तीन साल हो गए हैं। हर कॉलेज में 25 बच्चे होते हैं जिनकी फीस माफहोती है। तकरीबन 13,000 बच्चे हमारे संस्थान में हैं। इनमें कोई बच्चा फुटपाथ पर नहीं रहता है। मैं चाहता था कि मेरे बच्चे पढ़ें और तरक्की करें। आज जब उन्हें आगे बढ़ता देखता हूं तो लगता है कि मेरा जीवन अब सफल हुआ है। हमारे यहां प्रभु अस्पताल भी है, जहां हर महीने 20 विकलांगों का ऑपरेशन मुफ्त होता है। इस संस्थान की सबसे बड़ी बात यही है कि हम विकलांगों से एक भी पैसा नहीं लेते और उनको पढ़ाई के लिए सभी सुविधा मुहैया करवाते हैं। इसी के चलते उनके घरवालों को भी दिक्कतें नहीं होती हैं। अब देश के दूसरे राज्यों में से भी बच्चे यहां आते हैं। उनके लिए यहां हॉस्टल उपलब्ध है। यह संपूर्ण कार्य नरेन्द्र मोदी जी के वजह से सफल हुआ। उन्होंने 40 करोड़ रु. की जमीन विकलांगों के लिये दी। रिलायंस, ओएनजीसी ग्रुप ने और बाकी संस्थानों ने मिलकर इतनी विशाल मीनार खड़ी कर दी है।

01-10-2016

एक समय था जब अपके पास कुछ नहीं था लेकिन आज वो समय है जब अपके साथ बहुत सारे समर्थक हैं तो भविष्य में विकलांगों के लिए आपकी क्या योजना है?

मेरा साथ देने के लिये मेरे साथ बहुत प्रमुख लोग हैं। थावरचंद गहलोत (केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री), गंगवार साहब (वित्त राज्यमंत्री) और गुजरात के सभी मंत्रियों से मुझे मदद मिलती है।

सरकार से अपको कितनी सहायता मिलती है?

गुजरात सरकार ने कुछ दिन पहले ही सहायता देनी शुरू की है। हमारे स्टाफ को पहले 2800-2900 रुपए मिलते थे लेकिन अभी 15 दिनों पहले मालूम चला है कि उनकी पगार पूरी कर दी गई हैं। केंद्र सरकार ने भी दिव्यांग बच्चों के लिए रिहैब सेंटर खोला है ताकि उनकी और ज्यादा मदद की जा सके।

क्या आप सरकार की किसी कमेटी के साथ हैं?

हां, अभी वरिष्ठ नागरिक समिति बनी है उसमे मुझे पश्चिम क्षेत्र का प्रभार मिला है। विकलांग बच्चों के लिये और 1991 के डिसेबल एक्ट की गवर्निंग बॉडी में भी हूं। रेलवे बोर्ड में विकलांगों की सुविधा के लिये सलाहकार के रूप में कार्य करता हूं। अभी रेलवे बोर्ड को रेलों मे रैंप और व्हीलचेयर की सुविधा मुहैया करवाने के लिये सलाह दी है। नरेंद्र मोदी जी के एक्सेसिबल इंडिया अभियान में भी मैंने भागीदारी की है। हमारी सस्ंथा दिव्यांगों के लिये और भी कार्य कर रही है।

विकलागों के लिए कांग्रेस के समय भी बहुत बदलाव हुए थे लेकिन अब बीजेपी केंद्र में है। क्या अब विकलांगों पर पहले के मुकाबले ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है?

पहले के समय में कई अधिनियम बने हुए थे लेकिन उन पर अमल नहीं किया जाता था। जब इसकी खबर नरेन्द्र मोदी जी को लगी तो उन्होंने इन सभी अधिनियम को लागू करवाया। इससे न सिर्फ  विकलांगों को सुविधा मिली, बल्कि वरिष्ठ नागरिकों और गर्भवती महिलाओं को भी फायदा हुआ है।01-10-2016

आपको नहीं लगता कि विकलांगों को सामाजिक सुरक्षा सरकार की तरफ से प्राप्त होनी चाहिए?

भारत में बहुसंख्या में लोग रहते हैं जिसके कारण सरकार सबकी जरूरतें पूरी नहीं कर सकती है। लेकिन यह एक अच्छा विचार है जिसके लागू होने में भारत में काफी समय लग सकता हैं क्योंकि भारत का इतना बजट भी नहीं होता कि वह हर वारीष्ठ नागरिक या दिवयांग को सोशल सेक्युरिटी प्रदान करा सके लेकिन मैं आशा करता हूं कि नरेन्द्र मोदी जी इस विचार को सफल बनाएंगे।

आप उन विकलांगों के लिये क्या कहेंगे जो अपने शरीर को लेकर या अपने आपको लेकर नकारात्मक विचार रखते हैं?

 मैं बस यही कहूंगा कि इंसानियत न ही शरीर से और न ही रंग-रूप से पहचानी जाती है। इंसानियत हमारे सकारात्मक विचार और दूसरों के प्रति प्रेमभाव से ही पहचानी जा सकती है। यही विचार सब पर लागू होता है चाहे वह विकलांग हो या स्वस्थ व्यक्ति।  कभी अपने आसपास के वातावरण को नकारात्मक न होने दें और सकारात्मक बातों पर ध्यान दे।

01-10-2016

आपके जीवन में ऐसा कोई पल जब आप अपनी विकलांगता से निराश हो गए हों?

हां… पहले हुआ करता था लेकिन अब नहीं, पहले इसलिए दुख होता था क्योंकि मै अपने आपको विकलांग समझता था लेकिन वक्त के साथ मैंने यह स्वीकार किया कि मैं विकलांग शरीर से हूं, दिमाग से नहीं। अब बस अच्छा महसूस करता हूं, अच्छा रहता हूं और अच्छा सोचता हूं।

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