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राहुल की कुल्हाड़ी अपने पांव पर

राहुल की कुल्हाड़ी अपने पांव पर

राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस चुनाव तो अक्सर हारती रही है मगर अब उसे सैंद्दातिक हार का भी सामना करना पड़ेगा। आरएसएस और उसकी विचारधारा गांधी हत्या के लिए जिम्मेदार रहे हैं यह दावा करना कांग्रेस का सैद्धांतिक शिगूफा रहा है। महात्मा गांधी की हत्या के लिए आरएसएस को दोषी ठहराने के बारे में दिए बयान पर मानहानि का मुकदमा झेल रहे कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बीच आगे का मुकाबला महाराष्ट्र की निचली अदालत में होगा। इस मामले को लेकर बार-बार यू-टर्न लेने के कारण चर्चा में रहे राहुल गांधी ने फिर यू-टर्न लिया है। अब राहुल ने कहा है कि वह अपने पुराने बयान पर कायम हैं। सुप्रीम कोर्ट में राहुल गांधी के वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि राहुल अपने उस बयान पर कायम हैं कि आरएसएस के लोगों ने ही गांधी जी की हत्या की और वो मुकदमा लडऩे के लिए तैयार हैं। राहुल गांधी ने सुप्रीम कोर्ट से अपनी याचिका वापस ले ली। वह महाराष्ट्र की निचली अदालत में मानहानि का मुकदमा लड़ेंगे। भिवंडी कोर्ट ने राहुल को पेशी में छूट देने से इनकार कर दिया है। यानी 16 नवंबर को उन्हें अदालत में पेश होना होगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य ने भी राहुल के इस कदम पर सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि, ”राहुल क्यों इस ट्रॉयल से पिछले दो वर्षों से बचते रहे। वे बार-बार यू-टर्न क्यों लेते रहे? क्या वे सच का सामना करने से कतरा रहे हैं?’’

दो साल पहले एक चुनावी सभा में राहुल गांधी ने महात्मा गांधी की हत्या के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को जिम्मेदार ठहराया था। तब एक संघ कार्यकर्ता ने इस बयान के चलते उनके ऊपर मानहानि का मुकदमा दायर किया। इस मामले के खिलाफ कांग्रेस उपाध्यक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई थी। इस पर सुनवाई के दौरान उनके वकील ने कहा कि राहुल ने महात्मा गांधी की हत्या के लिए संघ को हत्यारा नहीं कहा था बल्कि संगठन से जुड़े लोगों के लिए हत्यारा शब्द का इस्तेमाल किया था। राहुल गांधी के इस बयान के बाद ट्विटर पर ‘पप्पू मुकर गया’ ट्रेंड चलता रहा। कमलेश ने लिखा, ‘तो आज राहुल गांधी ने वो चीज कर दी जिसके लिए अरविंद केजरीवाल एक मास्टर की तरह जाने जाते हैं। वो है यू-टर्न लेना।’ किशोर ने लिखा, ‘राहुल गांधी को लगता है कि वे राजनीति के मामले में शेर हैं लेकिन कोर्ट के आगे वो मात्र एक बिल्ली हैं। कोर्ट के बाहर आने के बाद राहुल ने फिर यू-टर्न लिया और बिल्ली से शेर बनते हुए दहाड़े।’ राहुल ने ट्वीट किया, ‘मैं आरएसएस के घृणित और विभाजनकारी एजेंडे के खिलाफ हमेशा लड़ता रहूंगा। मैं अपने कहे हर एक शब्द पर आज भी कायम हूं।’ इस पर रा.स्व.संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य ने चुटकी लेते हुए कहा, ‘वे किन शब्दों पर कायम हैं- जो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे में कहे या सार्वजनिक मंच से भाषण के दौरान बोले।’

राहुल गांधी से बिना शर्त माफी की मांग करते हुए वैद्य ने एक अखबार का उदाहरण दिया जिसने आरएसएस के बारे में बताते हुए लिखा था, ‘गांधी को मारने वाली संस्था।’ वैद्य ने कहा, ‘द स्टेट्समैन ने 2000 में यह संपादकीय प्रकाशित किया था। जब अदालत में वह तथ्य गलत और आधारहीन साबित हो गया, तब उन्होंने माफी मांगी।’ वैद्य ने पूछा – ‘क्या, राहुल गांधी और उनकी पार्टी में सत्य के प्रति इतनी इज्जत है कि वे ऐसा माफीनामा लिखित में दे सकें और यह गारंटी ले सकें कि वह या उनकी पार्टी भविष्य में झूठ नहीं बोलेगी।’

राहुल से भी ज्यादा बयानबाजी उनके वकील कपिल सिब्बल कर रहे हैं। उन्होंने एक अंग्रेजी अखबार को दिए इंटरव्यू में कहा – प्रधानमंत्री आरएसएस के प्रचारक हैं। उनसे कहिए कि हमें बताएं कि नाथूराम गोडसे ने संघ से इस्तीफा कब दिया था। लेकिन राजनीति के जानकारों का कहना है कि पहले कपिल सिब्बल यह बताएं कि नाथूराम ने आरएसएस का फॉर्म कब भरा था। वैसे शायद इतिहास के जानकार कपिल सिब्बल को यह पता ही होगा कि 1942 में नाथूराम गोडसे ने अपना स्वयंसेवक दल बनाया था जिसका नाम था हिन्दू राष्ट्र दल। सावरकर की जीवनी के लेखक धनंजय कीर ने भी गोडसे द्वारा हिन्दु राष्ट्र दल की स्थापना का जिक्र किया है। नाथूराम गोडसे पर लिखे कई लेखों में इसका जिक्र मिलता है जो यह दर्शाता है कि गोडसे ने संघ से अलग होकर अपना अलग संगठन बना लिया था। कई जीवन परिचयों में यह कहा गया था कि गोडसे ने सविनय अवज्ञा आंदोलन में भी हिस्सा लिया था तो क्या यह माना जाए कि वह कांग्रेसी था। फिर हिन्दू महासभा तो घोषित तौर पर कांग्रेस का हिस्सा रही हैं। महामना मालवीय और लाला लाजपत राय जैसे कांग्रेसी नेता उसके भी नेता रहे हैं तो यह माना जाए कि नाथूराम गोडसे कांग्रेसी था।दरअसल कांग्रेस और वामपंथी नेताओं का रवैया यही रहा है पंचायत का फैसला सरमाथे मगर नाला तो यही से बहेगा। यानी अदालत कछ, भी कहे हम तो संघ को गांधी हत्या का दोषी मानते हैं। उस पर वे आज भी डटे हैं और इस झूठ को लगातार फैला रहे हैं। संघ को बदनाम करना उनकी वोट की राजनीति का हिस्सा है।

01-10-2016

राहुल गांधी माफी नहीं मांगेंगे और मुकदमें का सामना करेंगे। लेकिन राहुल गांधी को समझ लेना चाहिए ऐसा करके वे राजनीतिक खुदकशी ही करेंगे। अच्छा होता वे गांधी हत्या के बारे में कोर्ट का फैसला पढ़ लेते। अब वे जल्दी ही कांग्रेस के अध्यक्ष बनने वाले हैं उन्हें कांग्रेस का इतिहास पढ़कर भलीभांति जान लेना चाहिए कि सोनिया गांधी से पहले कांग्रेस के अध्यक्ष रहे चुके सीताराम केसरी ने भी गांधी हत्या के बारे में संघ पर आरोप लगाया था मगर उन्हें माफी मांगनी पड़ी थी। कम से कम राहुल गांधी उस इतिहास से तो सबक लेते। और ऐसा अनर्गल आरोप लगाने से बाज आते। प्रसिद्ध स्तम्भकार एजी नूरानी को भी द स्टैटसमैन अखबार के लेख के लिए माफी मांगनी पड़ी थी। लेकिन लगता है राहुल गांधी इतिहास से कोई सबक लेने को तैयार नहीं हैं। कहना न होगा कि जो इतिहास से सबक नहीं लेते वे इतिहास को दोहराने के लिए बाध्य होते हैं। यानी अब देरसबेर राहुल को माफी मांगनी ही पड़ेगी।

इस तरह गांधी हत्या के लिए संघ को दोषी ठहराने का खेल अब भी जारी है। कुछ अर्से पहले बीबीसी फीचर सेवा के एक लेख में कहा गया था कुछ वर्ष पहले तक यह धारणा व्याप्त थी कि गांधीजी की हत्या से संघ का कोई संबंध था, यह इतिहास का पहला कारगर और राजनीति प्रायोजित मिथक था। गोडसे नाम की राजनैतिक महत्ता इसलिए है कि उसे एक वैचारिक पहचान देने और उस पहचान में समूचे हिन्दुत्व को लपेट देने भर से पूरी हो जाती है, बहुत सीधा सा रूट है। गोडसे से सावरकर, सावरकर से दाएं-बाएं होते हुए संघ, और संघ तक पहुंचते ही अगला स्टॉप भाजपा। इसी के साथ सेक्युलरिज्म की बौद्धिक यात्रा अपने गंतव्य पर पहुंच जाती है। तर्क-सबूत भला किसे चाहिए?

बात सही भी है। महात्मा गांधी की हत्या जांच के लिए 4 मई, 1948 को विशेष अदालत बनी थी। उसने नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को मृत्युदंड की सजा सुनाई थी। शेष पांच को आजन्म कारावास की सजा हुई। इसी फैसले में न्यायालय ने स्पष्ट तौर पर कहा कि महात्मा गांधी की हत्या से संघ का कोई लेना-देना नहीं है। बाद में, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को दबाव या भरोसे में लेकर इस मामले को फिर से उखाड़ा गया। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने गांधी हत्या का सच सामने लाने के लिए न्यायमूर्ति जीवनलाल कपूर की अध्यक्षता में कपूर आयोग का गठन किया। कपूर आयोग ने तकरीबन चार साल में  अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। आयोग अपनी रिपोर्ट में असंदिग्ध घोषणा करता है कि महात्मा गांधी की जघन्य हत्या के लिए संघ को किसी भी प्रकार से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। (रिपोर्ट खंड 2 पृष्ठ 76)

मगर कांग्रेस और वामपंथी नेताओं का रवैया यही रहा कि अदालत कुछ भी कहे हम तो संघ को गांधी हत्या का दोषी मानते हैं। उस पर वे आज भी डटे हैं और इस झूठ को लगातार फैला रहे हैं। न्यायालय और आयोग के स्पष्ट निर्णयों के बाद भी आज तक संघ विरोधी गांधी हत्या के मामले में संघ को बदनाम करने से बाज नहीं आते। इस प्रकरण से यह भी स्पष्ट होता है कि संघ विरोधियों का भारतीय न्याय व्यवस्था, संविधान और इतिहास के प्रति क्या दृष्टिकोण है। जब यह मामला न्यायालय में पहुंच गया है तब न्यायालय को यह भी ध्यान देना चाहिए कि गांधी हत्या के लिए बार-बार संघ को जिम्मेदार बताने से न केवल एक संगठन पर कीचड़ उछाली जाती है, वरन भारतीय न्याय व्यवस्था के प्रति भी अविश्वास का वातावरण बनाया जाता है। लेकिन हमारे देश के गोयबेल्स के चेलों को झूठ को सच साबित करने का खेल ही न्यारा है।

सतीश पेडणेकर

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