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कश्मीर समस्या वहाबी

कश्मीर समस्या वहाबी

जम्मू-कश्मीर में लम्बे समय से आईएसआईएस के बढ़ते प्रभाव के निशां मिलते रहे मगर कोई आतंकी घटना उसकी तरफ से नहीं हुई। पर हर शुक्रवार को पुराने शहर में जुमे की नमाज के बाद कुछ प्रदशर्नकारी आईएसआईएस के काले झंडे  लेकर प्रदर्शन करते हैं। यह माना जाता है  कि ये लोग आईएसआईस के लोग है जो कश्मीर में अपनी जड़े जमा रहे हैं। कई बार ये आईएसआईएस  के मुखपत्र  ‘दाबिक’ में धमकी देते है  – ‘आईएस कश्मीर पर कब्जा करेगा और गाय की पूजा करने वाले हिंदुओं को खत्म कर देगा।’ मैगजीन के 13वें एडिशन में आईएसआईएस के अफगानिस्तान-पाकिस्तान रीजन के कमांडर हाफिज सईद खान ने कहा – ‘इतिहास गवाह है कि इस रीजन में मुसलमानों का शासन रह चुका है; मगर अब यहां गाय की पूजा करने वाले हिंदू और नास्तिक चीनी रहने लगे हैं; हिंदुओं और काफिर मुस्लिमों को खत्म करने और खलीफा के शासन को बढ़ाने के लिए आईएस तैयारी कर रहा है।’

‘सईद ने आगे कहा – ‘अफगानिस्तान और पाकिस्तान रीजन (अफ-पाक) पर आईएस का कंट्रोल होना बहुत जरूरी है। ये खलीफा और मुसलमानों के शासन को बढ़ाने का गेटवे है। इराक और सीरिया की तरह शरिया कानून के तहत सिविल गवर्नेंस लागू किया जा चुका है। हम पाकिस्तान और अफगानिस्तान सरकार, तालिबान और लश्कर-ए-तैयबा को चेतावनी देते हैं कि वह खलीफा और जिहाद के बीच में न आए। आतंकी हाफिज सईद खान को मुल्ला सईद ओरकजई के नाम से भी जाना जाता है। वो पहले तहरीक-ए-तालिबान (टीटीपी) से जुड़ा था। बाद में आईएस से जुड़ गया। बता दें कि आईएस ने सईद खान को खुरासान का अमीर बनाया है। उसे रीजन के कमांडर की जिम्मेदारी दी गई है। ये भी बता दें कि इससे पहले भी आईएसआईएस ने भारत और पीएम मोदी को इस्लाम का दुश्मन बताते हुए कहा था कि मोदी मुस्लिमों के खिलाफ जंग की तैयारी कर रहे हैं।

दरअसल बुरहान वानी के तौर-तरीकों से इस बात को बल मिला कि आईएसआईएस का प्रभाव घाटी में बढ़ता जा रहा है। वानी नई भर्ती और प्रचार के लिए सोशल मीडिया का उपयोग करता था। इसके अलावा आईएसआईएस की तरह वह भी खिलाफत की स्थापना की बात करता था।

यह सारे दावे अपनी जगह हैं लेकिन अभी तक आईएस की तरफ से कोई आतंकी हरकत किए जाने की पुष्टि नहीं होती। वैसे आईएसआईएस कश्मीर में आया तो वहां की राजनीति में ऊथल पुथल मच जाएगी। लेकिन आईएसआईएस खुद युद्ध में फंसा है उसके पास कश्मीर के लिए फुर्सत नहीं हैं भले ही वह बयानबाजी करता रहे।

लेकिन  देखना यह है कि कश्मीर में आईएसआईएस ने पांव जमाए तो उसकी रणनीति क्या होगी। वह लश्कर-ए-तैयबा और जैशे मोहम्मद की तरह का केवल भारत सरकार के खिलाफ लडऩेवाला आतंकी संगठन नहीं है। वह  इस्लाम के धर्मद्रोहियों या धर्मत्यागियों के खिलाफ लडऩे वाला संगठन है। यह सही है कि कश्मीर की  आजादी का आंदोलन धार्मिक रूप ले चुका है, वह कश्मीरियत के बजाय मुस्लिम आंदोलन बन सुका है। लेकिन आईएसआईएस प्रमुख रूप से सुन्नी आंदोलन है। मगर कशमीर में शिया और सूफी सुन्नी भी हैं। आईएसआईएस उन्हें धर्मदोही मानता है और इसकी सजा मौत या सफाया है। ऐसी कोशिश वह कश्मीर में कर सकता है। अब तक कई देशों में उसने ऐसा किया है। कश्मीर घाटी में तो अब हिन्दू नहीं हैं उस पर सेना लगी हुई है ऐसी हालत में वह बहुत कुछ नही कर पाएगा। लेकिन अगर उसे कुछ करना होगा तो वह इन दो समुदायों को निशाना बना सकता है। ऐसा उसने कई देशों में किया है। इराक में वह हमेशा शिया आबादी पर ही हमले करता है।

हाल ही में अफगानिस्तान में हाजरा शियाओं के प्रदर्शन के दौरान हमले किए जिसमें 80 लोग मारे गए। यमन में उसने शिया मस्जिदों पर दो बार हमले किए। दमिश्क में भी उसने शिया मस्जिद पर हमले किए। बांग्लादेश में ज्यादा हिन्दुओ, ईसाइयो, शिया, सूफी, समलैंगिक, और सेकुलर ब्लागरों की हत्या की गई है। वैसे आईएसआईएस हजरत बल जैसी मस्जिद का भी विरोध कर सकता है क्योंकि अल्लाह के अलावा किसी की भी इबादत करने के खिलाफ है। इसलिए यदि आईएसआईएस  कश्मीर में पांव जमाएगा तो कश्मीर के मुस्लिम समाज में फूट डालेगा क्योंकि वह मुस्लिम एकता के नाम पर शिया, सुन्नी, सूफी के मेलजोल को पसंद नहीं करेगा। वैसे कश्मीर को सूफी कश्मीर कहा जाता है। सूफियों ने कश्मीर के इस्लामीकरण में  महत्वपूर्ण भूमिका निभाई लेकिन आईएसआईएस का अगर प्रभाव बढ़ा तो कश्मीरियों को तय करना पडेगा कि वे सूफी रहेंगे या वहाबी। वैसे पिछले कुछ समय में कश्मीर मे वहाबियत का प्रभाव काफी बढा है। वैसे आईएसआईएस गिलानी जैसे लोगों का भी विरोध करेगा जो कश्मीर को पाकिस्तान में शामिल करना चाहते हैं। वह उनका भी विरोध करेगा जो उसे भारत में बनाए रखना चाहते हैं। वह अलग कश्मीर राज्य का भी विरोध करेगा क्योंकि वह किसी भी तरह के राष्ट्रवाद का विरोधी है। वह चाहेगा कि कश्मीर खिलाफत का हिस्सा बनने के बाद भारत सरकार के खिलाफ जिहाद करे। इसलिए उसके किसी भी वक्तव्य में अलग कश्मीरी राज्य की बात नहीं मिलेगी। वह चाहेगा कि जिहाद हो मगर खलीफा के यानी आईएसआईएस के नेतृत्व में।

01-10-2016

कश्मीर जानकार बताते हैं कि कश्मीर समस्या आईएसआईएस नहीं वहाबी है। कश्मीर घाटी में पिछले 700 वर्षों से सूफी परंपरा जनजीवन का हिस्सा थी लेकिन  अब  वहाबी संप्रदाय वहां बहुत गहरी पैठ बनाने में कामयाब हो गया है। इस कारण  बहुसंख्यक बरेलवी मुसलमानों और तेजी के साथ फैल रहे अहले हदीथ पंथ के बीच तनाव बढ़ रहा है।

अहले हदीथ को बहुसंख्यक कश्मीरी मुसलमानों की सूफी परम्पराओं के प्रति असहिष्णु माना जाता है। उसके अनुयायी सूफियों और संतों का आदर नहीं करते जिन्हें कश्मीरी मुसलमान उच्च सम्मान देते हैं। आज हदिथ 700 मस्जिदों और 125 मदरसों का प्रबंधन करते हैं और उसकी सदस्यता 1,500,000 से ऊपर पहुंच गई है। दरअसल कश्मीर में इतनी मस्जिदें बन रही है जिनकी जरूरत नहीं है।

दरअसल इतनी मस्जिदें बनाने के पीछे मंशा यह है कि कि मस्जिदों में पुलिस और सुरक्षा बल आसानी से प्रवेश नहीं कर सकते। विचारधारा के स्तर पर सऊदी अरब के वहाबी पंथ से करीबी रखने वाले जमीयत अहले हदीथ को पैसा भी वहीं से मिलता है। इस कारण ही उसके लिए नई-नई मसजिदें और मदरसे बनाना संभव हो पा रहा है। अहले हदीथ की मस्जिदें भव्य और अच्छे रखरखाव वाली है तो सूफी मस्जिदे टूटी-फूटी और खस्ता हालत में हैं। 2012 में छह सूफी मस्जिदों मे आग लगी थी बहुत से लोग इसके पीछे वहाबियों का ही हाथ देखते थे। अहले हदीथ की मस्जिदों और मदरसों को सऊदी पैसे से प्रेरित कश्मीर के वहाबीकरण और तालिबानीकरण का अभियान  ही माना जाता है। केंद्रीय गृहमंत्रालय के एक अध्ययन से पता चला है कि घाटी के साठ फीसद युवा नेट या सीडी पर धार्मिक प्रवचन सुनने में ज्यादा दिलचस्पी लेते हैं। यह सामग्री ज्यादातर वहाबी मत की होती है। इसी परिप्रेक्ष्य में बरेलवी बनाम वहाबी का द्वंद्व शुरू हुआ। अक्टूबर 2011 में फेसबुक पर कश्मीर सूफी आंदोलन का पेज शुरू हुआ। कुछ अर्से पहले बरेलवी मत की विशाल रैली हुई। तब से ‘कारवां-ए-इस्लाम’ जैसे संगठनों के बैनर तले कश्मीर के हर हिस्से में समारोह हुआ। उनमें उग्र भाषण हुए और धर्म की रक्षा के लिए युवाओं को हथियार उठाने के लिए उकसाया गया। खास बात यह है कि ऐसे धार्मिक समारोहों में सरकारी अधिकारी तक शामिल हुए।

पिछले कुछ समय से घाटी की कई दरगाहों की दशा सुधारने और नई मस्जिदें बनाने के लिए पैसा आबंटित कर सेना के संचालन क्षेत्र में अतिक्रमण शुरू हुआ। पुलवामा में 202 बड़ी मस्जिदें होने के बाद भी 2011 में 43 नई मस्जिदें बनीं। श्रीनगर के पास बडगाम में 66 नई मस्जिदें बनीं। इस काम में दोनों मतों के नेता विशेष रुचि दिखा रहे हैं। मकसद पूरे समाज पर अपना धार्मिक प्रभुत्व साबित करना है। सूफी कश्मीर में बड़ी तादाद में होने के बावजूद राजनीतिक और आर्थिक तौर पर बहुत ताकतवर नहीं हैं इसलिए वहाबियों का मुकाबला नहीं कर पाते। वहाबियों का बड़ता वर्चस्व अलगाववादी आंदोलन को ताकत दे रहा है।

एक ब्लाग लेखक अब्दुल्ला कहते है – इस समय पूरी दुनिया इस्लामी आतंकवाद से त्रस्त है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या पूरा इस्लामी समुदाय आतंक का पोषक है? क्या इस्लामी दुनिया का बड़ा हिस्सा आतंकवाद का समर्थक है? अगर ऐसा नहीं है तो इस्लामी दुनिया से आतंकवाद के खिलाफ आवाज क्यों नहीं उठती? पूरी दुनिया को साफ-साफ क्यों नहीं बताया जाता कि इस्लामी समुदाय का बहुसंख्यक हिस्सा आतंकवाद का समर्थन करनेवाले बहावी, देवबंदी, अहले हदीस की विचारधारा को नहीं मानता?

सतीश पेडणेकर

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