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कश्मीर की कश्मकश

कश्मीर की कश्मकश

कहावत पुरानी है कि इतिहास पहले त्रासदी और फिर प्रहसन की तरह खुद को दोहराता है। अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगियों ने कश्मीर में 75 दिन से जारी संकट पर रणनीतिक सूझ-बूझ, जमीनी व्यावहारिकता और दार्शनिक नजरिया न दिखाया होता तो वाकई इतिहास एक प्रहसन की तरह दोहरा रहा होता।

मोदी ने ”सभी पक्षों से बातचीत’’ करने के मामले में तमाम तरह के तात्कालिक फायदों और दबावों, यहां तक कि अंतरराष्टरीय रुझानों को भी नजरअंदाज करके अपने पांव ठोस जमीन पर टिकाए रखा। यह वाकई काबिलेतारीफ है। अलगाववादियों से बात न करने के उनके पक्के विश्वास का फायदा उन्हें अपनी लौह-पुरुष की छवि के इजाफे के रूप में हासिल हुआ। इससे देश का भी मान बढ़ा कि कोई भी कुछ भी करके माफी नहीं पा सकता, जैसा कि अब तक चलता रहा है।

शिवसेना और पैंथर्स पार्टी के अलावा लगभग सभी गैर-भाजपा पार्टियां जोर डाल रही थीं कि केंद्र को कश्मीर मसले के हल के लिए ‘सभी पक्षों’ से बात करनी चाहिए। हालांकि यह साफ-साफ नहीं बताया जा रहा था कि ये सभी पक्ष कौन-कौन हैं। यह तो किसी से छुपा नहीं है कि इन छद्म-सेकलर और घोर जातिवादियों का मतलब हुर्रियत कॉन्फ्रेंस को बातचीत में शामिल करने से था। लेकिन इन ताकतों की कायराना हरकत यह देखिए कि ये खुलकर यह भी नहीं कहते कि हुर्रियत कॉन्फ्रेंस भी एक पक्ष है।

ऐसा लगता है कि मोदी के ”मौन की शक्ति’’ के सिद्घांत और ”न्यूनतम शद्ब्रदों की ताकत’’ की आजमाई नीति  में पक्का भरोसा है। वे अपने विचारों को एक खास शैली में पूरी स्पष्टïता के साथ दो-टुक शद्ब्रदों में अभिव्यक्त करने में माहिर हैं जिससे कोई दुविधा न रह जाए लेकिन हर कोई अंदाजा भी लगाता रह जाए। मोदी ने कहा, ”केंद्र घाटी में हालात सामान्य करने और संविधान के दायरे में विवाद का हल निकालने के लिए हर किसी से और किसी भी से बात करने को तैयार है।’’ यह मास्टरस्ट्रोक था। लेकिन उनका दूरदृर्शी और ताकतवर राजनेता की तरह यह बयान अलगाववादियों के लिए वज्रपात और दुनिया के हर हिस्से में रह रहे राष्ट्रवादियों के लिए उम्मीद की किरण की तरह आया कि ”समूचा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत का अभिन्न अंग है। यहां तक कि पाकिस्तानी कब्जे वाला कश्मीर भी जम्मू-कश्मीर का हिस्सा है।’’ इसे संक्षेप में इस तरह कहा कि ”अगर कश्मीर के बिना पाकिस्तान अधूरा है तो पाकिस्तान और पीओके के बिना भारत भी अधूरा है।’’ यह सुनने को तो करोड़ों भारतीयो के कान दशकों से प्यासे थे। इस दो-टुक रुझान से हुर्रियत को शाही अंदाज में झिड़क दिया गया। अधिकांश हुर्रियत नेता भारत को अपना राष्ट्र नहीं मानते और अपनी राष्ट्रीयता भारतीय नहीं बताते, उनके पास पासपोर्ट नहीं है। उसके बुजुर्ग नेता सैयद अली शाह गिलानी की तरह ही, जो सभी मामलों में पाकिस्तान और भारत दोनों से बेहतर व्यवहार हासिल कर रहे हैं।

केंद्रीय गृह मंत्री अपनी व्यावहारिक समझदारी के लिए जाने जाते हैं और समाज के हर जमात और वर्ग में घुलने-मिलने की उनमें गजब की क्षमता है, चाहे गांववालों के साथ हो या सीआरपीएफ के कैंप में मोटर साइकिल की सवारी। उन्होंने भारतीय संविधान में यकीन करने वाले सभी संगठनों और पार्टियों से बात की और दुनिया को बता दिया कि भाजपा की अगुआई वाली एनडीए सरकार हर मसले पर एकदम गंभीर है और मोदी पराये के फेर में पड़े रहने के आदी नहीं हैं। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेताओं के लिए अपना सिर धुनने के अलावा कुछ बचा ही नहीं। ”इंसानियत, कश्मीरियत और जम्हूरियत’’ की लगातार रट लगाने वाले सैयद अली शाह गिलानी ने माकपा नेता सीताराम येचुरी के लिए अपने शाही बंगले का दरवाजा खोलने से भी इनकार कर दिया, कहां वे एक कप चाय के लिए उनसे पूछते। गैर-भाजपा सांसदों को खाली हाथ लौटना पड़ा।

इससे साबित हो गया कि मोदी का रवैया ही सबसे अच्छा और व्यावहारिक है कि हुर्रियत को नजरअंदाज करो और आम आदमी खासकर नौजवानों से नाता जोड़ो, जिन्हें शिक्षा और रोजगार चाहिए। उन लोगों से नाता जोड़ो, जिनमें ज्यादातर पर्यटकों की आमद पर निर्भर हैं। मोदी ने कहा, ”मैं जन्नत को असली जन्नत बनाने को कृतसंकल्प हूं जहां पर्यटक और उन पर आश्रित (टूर ऑपरेटर) खुशहाल और संपन्न होंगे।’’ इस तरह उन्होंने साफ इशारा किया कि उनके एजेंडे में सबसे ऊपर विकास है। प्रधानमंत्री ने सुरक्षा बलों, सेना और अद्र्घसैनिक बलों का भी मनोबल नहीं गिरने दिया। उन्होंने दो अहम बयानों से उनका मनोबल बढ़ाया। एक यह कि एकता और क्षेत्रीय अखंडता से समझौता नहीं होगा (मतलब यह कि सेना अपनी पूरी ताकत से सीमा की रक्षा करती रहेगी) और दूसरे, लोगों की सुरक्षा सबसे बढ़कर है (मतलब यह कि अद्र्घसैनिक बल किसी भी नाजायज हरकत से निपटने में अपनी ताकत का पूरा इस्तेमाल करेंगे)।

कुल मिलाकर मोदी खासकर और उनकी सरकार ने वही आवाज बार-बार दोहरायी है, जो करोड़ों भारतीयों के दिलोदिमाग से उठती है। अगर भविष्य में बातीचत होती है तो उन्होंने उसकी कसौटी तय कर दी है और न सिर्फ पाकिस्तान को, बल्कि कश्मीर घाटी में उसके टट्टुओं को भी दो-टूक संदेश दे दिया है।

जाहिर है भारत में और दुनिया के दूसरे देशों में रह रहे भारतीय ही नहीं, बल्कि समूची दूनिया सांस रोककर कश्मीर पर मोदी की पहल का इंतजार कर रही है। एक बार फिर कश्मीर विश्व मंच पर वाजिब वजहों से सुर्खियों में है, 1948 की तरह गलत वजहों से नहीं। उस समय पंडित जवाहरलाल नेहरू की गलतियों की वजह से कश्मीर संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर का मसला उठा और वही इस जन्नत की समस्या की जड़ में हैं। मोदी इस गतिरोध को तोडऩे पर कृतसंकल्प हैं और उन्होंने बेहतर और भरोसेमंद भविष्य की ओर पहला कदम बढ़ा दिया है।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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