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गरीब विरोधी हैं सरकारी नीतियां: गोविंदाचार्य

गरीब विरोधी हैं सरकारी नीतियां: गोविंदाचार्य

भ्रष्टाचार और भूमि अधिग्रहण कानून की खामियों की वजह से जनता को होने वाली परेशानियों के संबंध में केन्द्र सरकार की भूमिका को लेकर संघ के प्रचारक रहे सामाजिक कार्यकत्र्ता एवं चिंतक और वत्र्तमान में अण्णा हजारे के सहयोगी के.एन. गोविंदाचार्य से उदय इंडिया के वरिष्ठ संवाददाता सुधीर गहलोत ने लंबी बातचीत की। प्रस्तुत है कुछ प्रमुख अंश:

अण्णा हजारे के आंदोलन में आप भी सहयोगी हैं। केन्द्र को घेरने की कौन-कौन सी वजह है?
मैं नियत पर शक नहीं करता हूं, नीतियों और प्राथमिकताओं के बारे में सवाल मेरे मन में जरूर आता है।  कालाधन को लेते हैं। इसके दो पहलू हैं। एक, नया कालाधन उपजे न और दूसरा जो कालाधन है विदेशों में वह वापस आए। भूमि अधिग्रहण कानून को सरकार अध्यादेश के माध्यम से ला रही है। अध्यादेश तो पहला यह होना चाहिए था कि विदेशी बैंकों में जमा भारतीय गणराज्य की संपत्ति को लाया जाए। जिन्होंने भी वैध तरीके या कारणों से विदेशों में अपना पैसा जमा किया है, वे अपना दस्तावेज दिखाकर उस पैसे को छुड़ा लें। जो पैसे नहीं छुड़ा गए, वो सारे पैसे सरकार के हैं।

लेकिन सरकार तो कह रही है कि हमने कार्रवाईयां शुरू कर दी हैं …
सरकार ने क्या कार्रवाईयां शुरू कर दीं हैं, पहले ये तो बताए। अभी तक तीन बार वित्तमंत्री ने कालाधन के बारे में बयान दिया है और नाम भी बताया है। लेकिन नाम भी तब बताया,जब दूसरे गैर-सरकारी सूत्रों ने उसे उजागर कर दिया। उसके बाद सरकार चलाने वाले को शर्म आई और उसके बाद अपनी झेंप मिटाने के लिए नामों का खुलासा किया। सरकार ने ऐक्शन क्या-क्या लिया है पहले ये तो बताए और सोर्सेज के बारे में उन्होंने क्या-क्या किया है, यह भी बताए। नया कालाधन नहीं पैदा हो उसके बारे में क्या-क्या प्लान किया है, उसके बारे में भी तो सरकार बताए। एक तरफ से नाली साफ करते जाओ और दूसरी तरफ से उसमें पानी आता जाए, ऐसा नहीं होना चाहिए। अब तो सरकार के नौ महीने हो चुके हैं।

सरकार द्वारा प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण कानून में किस तरह का दोष देखते हैं आप?
तीन छोटी-छोटी, लेकिन बहुत ही महत्वपूर्ण बातें हैं। पहला, अब भूमि अधिग्रहण में पंचायत की सहमति जरूरी नहीं है। पहले तो ऐसा नहीं था। दूसरा, मुआवजा अग्रिम देंगे कि बाद में देंगे, इसमें कोई स्पष्टता नहीं है। तीसरा, मुआवजा बाजार मूल्य पर देंगे या सर्किट रेट पर देंगे, स्पष्ट नहीं है। चौथा, जो सबसे अधिक खतरनाक है, वह है जनहित की परिभाषा का अस्पष्ट होना। अगर जनहित की परिभाषा को अस्पष्ट रखेंगे तो कोई भी कलेक्टर कितनी भी जमीन को जनहित में घोषित कर देगा। कलेक्टर का फरमान  जनहित की परिभाषित नहीं होनी चाहिए। स्पेशल इकॉनॉमिक जोन (एसईजेड) के अनुभव से सीखना चाहिए। चीन में कुल मिलाकर आठ एसईजेड बना। मुरासोली मारन के चीन दौरा के बाद भारत ने उसका नकल कर 650 एसईजेड बना दिया। किसको कितनी जमीन की जरूरत थी, कोई पूछताछ नहीं हुई। जिसने जितना मांगा, उसे देंगे कह दिया। आईटी सेक्टर को जमीन की क्या जरूरत थी? आईटी सेक्टर तो स्वयं ही एक सफल उद्योग रहा है भारत में। उसे अतिरिक्त सहायता की क्या जरूरत थी? लेकिन यह काम भी सरकार ने किया। सरकार को कामकाज का ध्यान रखते हुए ही भूमि अधिग्रहण कानून को बनाना चाहिए। बोलने और लागू करने में क्या अंतर आता है, इन सबको तौलकर देखना चाहिए। इसलिए इन सभी कारणों से भूमि अधिग्रहण कानून को निरस्त किया जाना चाहिए।

मोदी सरकार की लॉ कमीशन ने प्रस्ताव रखा है कि जायज कामों के लिए दिए जाने वाले रिश्वत को जायज माना जाना चाहिए। क्या कहेंगे?
डिफेंस और कई क्षेत्रों में लॉबिस्ट होते हैं। वे ग्राहक के बीच बिचौलिए का काम करते हैं। सुरक्षा का क्षेत्र वैसा ही है।

0;न बन जाने के बाद दूरगामी प्रभाव क्या होंगे?
लॉ कमीशन ने ही कहा है कि अमेरिका में 10 लाख की आबादी पर 113 जज हैं। भारत में सिर्फ 12 जज हैं। भारत में 3 करोड़ केस लंबित हैं। इसलिए वित्त मंत्रालय को पिछली बार लॉ कमीशन और चीफ जस्टिस ने कहा कि 6 हजार करोड़ रूपए हमें दे दो तो हम जिला और नीचे के स्तर पर जजों की बहाली कर सकें, लेकिन किसी के कान पर जूं नहीं रेंगी। पिछली सरकार तो एयर इंडिया को उबारने के लिए 33 हजार करोड़ रूपए देने को तैयार थी। वो तो हल्ला-हंगामा की वजह से उसे इंस्टॉलमेंट पर लाया गया। इसलिए मैं कहता हूं कि पहले गरीबपरस्त नीतियां तो बने। आज अमीरपरस्त नीतियां बन रहीं हैं। ये अच्छी बात नहीं है।

किसानों के हित में सरकार के कामकाज को  आप किस तरह देखते हैं?
पिछले 10 वर्षों में, यूपीए-एनडीए को छोडि़ए, कृषि की जमीन 12.50 करोड़ हेक्टेयर होती थी। आज 1 करोड़ 80 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि ही घट गई है। इस दौरान 2.5 लाख किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। प्रतिवर्ष एक करोड़ किसान कृषि से अलग हो रहे हैं। यह भयावह समस्या है। इस समस्या की सघनता को देखकर कई कदम उठाने चाहिए थे। होना यह चाहिए था कि कृषि भूमि का किसी भी हालत में अधिग्रहण नहीं होना चाहिए था। कृषि में लागत को कम कैसे की जाए, इसकी कोशिश होनी चाहिए थी। जो समर्थन मूल्य की बात कही गई है, उसे लागू करना चाहिए था। सिर्फ चुनाव में धोखा दिया जाता है, ऐसा मैं कहूंगा तो आपत्ति नहीं होगी, क्योंकि वादे करते हैं और बाद में कहते हैं कि वो तो सिर्फ चुनावी वादा था। चुनाव के वादों के प्रति इतनी बेईमानी उचित नहीं है। इसे कठघरे में खड़ा करना चाहिए लोगों को।

किसानों को कर्जदार बनाने में उर्वरक और डीजल का बहुत बड़ा योगदान है। किस तरह की नीतियां होनी चाहिए किसानों के प्रति?
किसानों को उनकी फसल का उचित दाम मिल जाए, यही बहुत है। बाकी वो सारी चिंता खुद कर लेगा। उन्हें किसी अनुदान की जरूरत नहीं है। मूल्य निर्धारित करने वाले आयोग में खेती करने वाले किसानों को हिस्सा बनाया जाए, तब मूल्य तय हो। सरकारी महकमे वाले लोग कृषि का मूल्य तय करता है, जो अन्याय है। किसान अपनी लागत 1700 रूपए प्रति क्विंटल बता रहा है, लेकिन उसे मिल रहा है 1500 रूपए प्रति क्विंटल। चुनावी घोषणा में कहा जाता है हम 2200 रूपए प्रति क्विंटल देंगे, लेकिन अब क्या हो गया! यह तो पूरी तरह अन्याय, अमानवीयता और संवेदनहीनता का परिचायक है। इस मामले में यूपीए-एनडीए सब बराबर है।

दिल्ली के वत्र्तमान मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की उपज हैं। किस तरह की उम्मीद की जानी चाहिए उनसे?

मैं आरोप कभी नहीं लगाउंगा। केन्द्र में एनडीए की सरकार हो या दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार, मैं नियत पर शक नहीं करता। मैं नीतियों एवं प्राथमिकताओं की बात करता हूं। मुझे प्रधानमंत्री का वो बयान बहुत नागवार लगा, जिसमें उन्होंने कहा कि जो राज्य खुद ही बिजली पैदा नहीं करता, वह आधे दाम पर बिजली देने की बात करता है। कटाक्ष था। चुनाव हो चुका है। जनादेश हो चुका है। जनता ने कह दिया कि केन्द्र में नरेन्द्र मोदी और प्रदेश में अरविंद केजरीवाल। अब दोनों हल में बैल की जोड़ी की तरह काम करें। सींग तानने का समय नहीं है अब।

इस आंदोलन के राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव को कैसे देखते हैं आप?
हमारा मानना है कि जनजागरण, जनसंघर्ष और जनदबाव यही तरीका है राजशक्ति पर समाजशक्ति का अंकुश लगाने का। मैं तो कुछ पाने की होड़ में नहीं हूं। इस आंदोलन में अण्णा हैं, पी.वी. राजगोपाल हैं और भी बहुत लोग हैं। जिले-जिले का हर सक्रिय व्यक्ति इस आंदोलन से जुड़ेगा। जनजीवन, जल, जंगल और जमीन का मामला हो या शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय, लोकतांत्रिक प्रक्रिया का, इसके परिमार्जन का तरीका जो सोचेगा वो इस आंदोलन से जुड़ेगा, ऐसा मेरा विश्वास है।

पिछले आंदोलन में पद, प्रतिष्ठा और राजनीतिक महत्वकांक्षा वाले लोग भी जुड़े। इस बार कैसे लोगों को मंच मिलेगा?
पिछले आंदोलन से देश में जो उभार आया था, उस उभार के साथ सरकार ने बहुत सारी चालबाजियां की थी। उससे वह आंदोलन एक तरह से बिखर गया। उस आंदोलन की राजनीतिक शाखा बन गई, जिसके कारण साख पर आंच आई। पद, प्रतिष्ठा और राजनीतिक महत्वकांक्षा वाले लोग उसमें जुड़ गए थे। इस आंदोलन की सबसे बड़ी चुनौती इसकी साख को बनाए रखने की है। हमारी कोशिश रहेगी कि मुद्दों और मूल्यों पर हम चलें, विचारधारा और झंडा-बैनर के आधार पर नहीं। प्रतिस्पर्धा और सत्ता की आंतरिक गुटबाजी की राजनीति से हम बचें। मुझे याद है जयप्रकाश नारायण का समय। जयप्रकाश जैसे हम संघ के लोगों को आंदोलन में लिए हुए थे, वैसे ही सीपीआई-एमएल के लोगों को भी साथ लेना चाहते थे। उसके लिए उन्होंने सत्य नारायण सिंह से भी बात की थी। सत्य नारायण सिंह ने वैचारकि कठमुल्लापन का परिचय देते हुए कहा कि संघ वाले लोग रहेंगे तो हम साथ नहीं आएंगे। जेपी ने कहा था कि देखिए, संघ वाले हैं तो आप भी आईए। नेतृत्व तो हमारा है। हम जो कहेंगे वो लागू होगा। जो लागू नहीं करेगा वो खुद ही पिछड़ जाएगा। मैंने ही जेपी को उन्हें साथ लेने की सलाह दी थी, क्योंकि इससे आंदोलन की गरीबपरस्त छवि बनती और समाज के वो सारे हिस्से जो नहीं जुड़े थे, वे जुड़ते।

अण्णा के पिछले आंदोलन में संघ का समर्थन था। क्या दुबारा भी समर्थन लेंगे?
हमारा मानना है कि संघ के स्वयंसेवक सामाजिक दृष्टि से संवेदनशील होते हैं। वह नाम, यश, पद, प्रतिष्ठा आदि से परे होता है। जैसे जहां रामकथा होगी वहां हनुमानजी आ आएंगे, वैसी ही बात संघ के साथ भी है। जहां सही मुद्दों और मूल्यों पर काम होगा, चाहे रचनात्मक हो या आंदोलनात्मक, वहां संघ साथ आ जाएगा। संघ के स्वयंसेवक ऐसे ढले हुए हैं कि ऐसे कामों में खुद लग जाते हैं।

एक ही मंच के दो व्यक्तियों – किरण बेदी और अरविंद केजरीवाल ने अलग-अलग रास्ते अपनाए। अगर भ्रष्टाचार मिटाना ही मुद्दा होता तो बेदी-केजरीवाल को साथ खड़ा होना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, क्या वजह रही है?
सच कहें तो मुझे यह बात अच्छी नहीं लगी। किरण बेदी पहले ही राजनीति में आ जातीं तो अच्छी बात होती। ऐन वक्त पर, वह भी मुख्यमंत्री पद की प्रत्याशी के रूप में आना मुझे अच्छा नहीं लगा। किरण बेदी में भी बहुत सारी संभावनाएं हैं। उनमें ईमानदारी, योगदान, पहल, साहस सहित कई अन्य बड़े-बड़े गुण हैं। अरविंद केजरीवाल में भी गुण हैं। दोनों 36 की जगह 63 की स्थिति में रहते तो बहुत अच्छा रहता।

संघ के ‘हिंदू राष्ट्र’ के विचार के बारे में आप क्या कहेंगे?
उनका कहना है कि इस देश की तासीर है हिंदुत्व। हिंदुत्व का मतलब है पांच बात। हजारों वर्षों की सभ्यता उन पांच बातों पर जिंदा रही है और आगे भी जिंदा रहेगी। पहला है, सभी उपासना पद्धति के प्रति श्रद्धा। दूसरा, एक ही सत्य सभी जड़-चेतन में है इसलिए सब बराबर हैं। इसलिए सबमें दिव्यत्व है। तीसरा, मनुष्य प्रकृति का विजेता नहीं उसका हिस्सा है। इसलिए जल, जमीन, जंगल और जानवर के साथ मनुष्य का अनुकूल जीवन-शैली बीताना ही हिंदुत्व है। चौथा, नारी को समाज में विशेष स्थान देना। अंतिम है, खाओ-पीओ मौज करो से भी परे जिंदगी का कुछ मकसद है। इसका एहसास ही हिंदुत्व है। क्या यह किसी संप्रदाय के खांचे में आएगा, क्या यह किसी जाति के खांचे में आएगा, नहीं। यह सभी मनुष्य पर लागू होता है। यह सर्वकल्याणकारी सिद्धांत ही हिंदुत्व है, इसलिए सहस्त्राब्दियों से हम सबकी इज्जत करते हैं तो यह संविधान की धारा 25 के कारण नहीं, यह हमारी विरासत के प्रतिफलन के कारण है। इसलिए यह हमारे संविधान में भी समाहित किया गया।mfx brokerполигон

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