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राजनेताओं के बहके बयान

राजनेताओं के बहके बयान

हम प्रतिवर्ष 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का आडंबर करते हैं। इस एक दिन महिला सशक्तिकरण पर होने वाली लफ्फाजी साल के बाकी दिनों में पस्त हो जाती है। उडविन ने भारत में महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों को दिखाने के लिए इस डॉक्युमेंट्री को प्रसारित करने का समय अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को ठीक ही चुना।

जीवन के बजाय अपनी मौत से निर्भया ने जनता की बड़े पैमाने पर सहानुभूति और रूचि हासिल की। यह निर्भया केस में गहन रूचि ही है कि ब्रिटीश फिल्ममेकर लेस्ली उडविन ने उस पर ‘इंडियाज डॉटर’ नाम से एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बना डाली। निर्भया दिल्ली में रहने वाली मेडिकल की छात्रा थी, जिसका 16 दिसंबर 2012 को सामूहिक बलात्कार हुआ था और ईलाज के दौरान मौत हो गई थी। डॉक्यूमेंट्री पर प्रतिबंध अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध है, इसलिए मैं इस प्रतिबंध के पक्ष में नहीं हूं। उडविन डीएनए में कहती हैं, ”मेरा मानना है कि अंतत: प्रतिबंध बहुत लंबा नहीं रहेगा, क्योंकि देश का न्यायालय सरकार की कठपुतली नहीं है और सभ्य मूल्यों की वापसी होगी। यह देखना आसान है कि जो मंत्री स्वयं को धर्म के संरक्षक के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं और डॉक्यूमेंट्री पर प्रतिबंध लगाने की लगातार कोशिश कर रहे हैं, वह दरअसल राजनीतिक लाभ लेने और मीडिया में सुर्खी बनने का प्रयास कर रहे हैं।’’

71;हमंत्री राजनाथ सिंह ने संसद के दोनों सदनों में दिए अपने बयान में कहा था कि जेल में डॉक्युमेंट्री को फिल्माने के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र 2013 में गृहमंत्रालय द्वारा दिया गया था। गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव सुरेश कुमार डॉक्युमेंट्री निर्माताओं को यह कहते हुए पत्र दिया था कि उच्च सुरक्षा वाले उस जेल में डॉक्युमेंट्री को फिल्माने में सरकार को कोई ऐतराज नहीं है। डॉक्युमेंट्री को फिल्माने के लिए एक बार अनुमति देने के बाद उस पर प्रतिबंध लगाना हमारे राजनेताओं के दोहरे मापदंड को प्रदर्शित करता है।

निर्भया कांड के बाद गठित की गई वर्मा समिति ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए 10 महत्वपूर्ण सिफारिशें की थीं। लेकिन क्या इससे बलात्कार कम हुए? नहीं, ऐसा नहीं हुआ। निर्भया कांड के बाद मुंबई में शीतल मिल सामूहिक बलात्कार कांड हुआ। हम समिति-दर-समिति गठित कर रहे हैं, एक कानून के बाद दूसरा कानून ला रहे हैं, लेकिन इससे महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा नहीं रूक रही है। हम प्रतिवर्ष 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का आडंबर करते हैं। इस एक दिन महिला सशक्तिकरण पर होने वाली लफ्फाजी साल के बाकी दिनों में पस्त हो जाती है। उडविन ने भारत में महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों को दिखाने के लिए इस डॉक्युमेंट्री को प्रसारित करने का समय अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को ठीक ही चुना। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। यहां तक कि कोलकाता में 71 वर्षीय नन के साथ हुए दुष्कर्म की घटना भयावह है। समाज के वॉचडॉग के रूप में मीडिया गलत या सही, पुण्य या पाप, जो भी देखता है उसे उजागर करता है और डॉक्युमेंट्री पर प्रतिबंध लगाना मीडिया के अधिकार का उल्लंघन है। जीवन में हमेशा उज्ज्वल पक्ष ही नहीं होते, कुछ काले पक्ष भी सामने आते हैं और समाज के स्याह पक्ष को दिखाना ही यथार्थवाद है और मीडिया को इसे बिना किसी डर के करना चाहिए।

04-04-2015

वास्तविकता यह है कि हमारी महिला पुलिसकर्मियों के लिए थाने में अलग टॉयलेट तक नहीं है। अपने काम के लिए ट्रेन में यात्रा करने वाली महिलाएं नशेडिय़ों और असमाजिक तत्वों की हिंसा की शिकार बनती हैं, क्योंकि इन जगहों पर पुलिस गश्त की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। लेकिन वीवीआईपी के लिए पुलिस कुछ भी करने को तैयार रहती है। उबेर बलात्कार कांड के बाद महिलाओं के लिए कैब और ऑटोरिक्शा में अकेले यात्रा करना असुरक्षित बन गया है। डॉक्युमेंट्री पर प्रतिबंध लगाने के बजाय राजनेताओं को महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े गंभीर मुद्दों के समाधान का प्रयास करना चाहिए। लेकिन,ऐसा नहीं हो रहा है। मुझे लगता है कि महिला सुरक्षा से संबंधित मुद्दों का समाधान खोजने के बजाय डॉक्युमेंट्री पर प्रतिबंध लगाना ज्यादा आसान है। जहां तक अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में भारत की छवि खराब होने की बात है, इससे मैं सहमत नहीं हूं। टाईम्स ऑफ इंडिया में शोभा डे के अनुसार, ”ऐसी शर्मनाक घटनाओं के लिए हर देश का अपना कोटा है।’’ महिलाओं के खिलाफ हिंसा एक वैश्विक घटना बन चुकी है। पिछले दिनों सिडनी में पैदल घर लौट रही आई प्रोफेशनल एक भारतीय महिला की हत्या कर दी गई। डॉक्युमेंट्री की प्रोड्युसर खुद की बलात्कार पीडि़ता है। उनका उद्देश्य बलात्कारी कीविकृत मानसिकता को लोगों के सामने लाना है, न कि उसे ग्लैमराईज करना, जैसा इस मामले में प्रचारित किया जा रहा है। प्रतिबंध से लोग इस फिल्म को देखने के लिए और भी ज्यादा उत्सुक होंगे। डॉक्युमेंट्री पर प्रतिबंध के बजाय मुलायम सिंह यादव जैसे विकृत मानसिकता वाले व्यक्ति पर प्रतिबंध लगाने की जरूरत है, जो कहते हैं कि ”लड़के लड़के हैं। एक छोटी-सी गलती के लिए उन्हें फांसी पर नहीं चढ़ाया जा सकता।’’

गीतकार जावेद अख्तर के अनुसार, जिन्हें भी निर्भया वाली डॉक्युमेंट्री आपत्तिजनक लगती है, उन्हें अपनी मानसिकता बदलने की जरूरत है। मानसिकता बदलना सबसे जटिल मुद्दा है। लेकिन महिलाओं के खिलाफ हिंसा रोकने के लिए जागरूकता फैलाने की जरूरत है। हालांकि हमारे देश के लिंगभेदी और असंवेदनशील अधिकांश लोगों की मानसिकता बदलने की बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं है।

राज्यसभा में जब बीमा विधेयक पर चर्चा हो रही थी, जनता दल (यूनाईटेड) के वरिष्ठ नेता शरद यादव ने चर्चा के विषय को मोड़ते हुए दक्षिण भारतीय महिलाओं की शारीरिक बनावट और रंगत को लेकर आपत्तिजनक बात कहनी शुरू कर दी। स्थिति बुरी तब और हो गई जब भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता रविशंकर प्रसाद शरद यादव के बयान पर निर्लज्जतापूर्वक हंसना शुरू कर दिया। बेशर्मी की हद पार करते हुए शरद यादव ने अपने अश्लील बयान पर माफी तक मांगने से इंकार कर दिया। निर्भया के बलात्कारी मुकेश की मानसिकता को छिपाने की जरूरत नहीं है, बल्कि इस तरह की मानसिकता वाले लोगों की सोच को समाज के सामने लाने की जरूरत है। महिलाओं की शारीरिक बनावट का अंग-विक्षेपन के लिए शरद यादव को सर्वश्रेष्ठ सांसद का पुरस्कार देना चाहिए। यही हमारा भारत है। ’इंडियाज डॉटर’ पर प्रतिबंध लगाने के बजाय मानसिक विकृति के शिकार हमारे राजनेताओं पर प्रतिबंध लगाने की आवश्यकता है।

इंदिरा सत्यनारायण

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