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सुजैट जॉर्डन : साहस का अंत

सुजैट जॉर्डन : साहस का अंत

 सुजैट की मृत्यु से एक साहसी महिला के न रहने का दुख होता है।  विडंबना यह कि इस देश में अब भी महिलाओं के साथ निरंतर बलात्कार हो रहे हैं और व्यवस्था इस सबसे नितांत उदासीन है। जब हो-हल्ला होता है तब कुछ सक्रियता दिखती है, फिर वही असंवेदनशीलता। आखिर यह कैसा समाज है, कैसा तंत्र है ?

कोलकाता में दो साल पहले सामूहिक बलात्कार का शिकार हुई सुजैट जॉर्डन का निधन हो गया। कुछ दिनों से उनकी तबियत खराब थी। उनके कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया था। सुजैट फरवरी 2012 में बलात्कार का शिकार हुई थीं। उस रात सुजैट जॉर्डन अपनी कुछ दोस्तों के साथ कोलकाता के एक फाइव स्टार होटल के एक नाईट क्लब में गई थीं। उसके साथ चलती कार में बलात्कार किया गया था। उसे एक कार से नीचे फेंक दिया गया था। वो घायल थी, उसकी हालत खराब थी। उसके कपड़े फटे हुए थे। उस त्रासदी को याद कर सुजैट ने कहा  था,  ”मैं दर्द से बुरी तरह से कराह रही थी। ऐसी बेहोशी सी हालत थी कि मंै अपना शरीर हिला ही नहीं पा रही थी। जब मैं इस घटना का एफआईआर दर्ज करवाने गयी तो पुलिस स्टेशन में सिर्फ पुरुष कर्मचारी ही थे। वो मेरे ऊपर हंस रहे थे। उन्होंने मेरे साथ घटी घटना को गंभीरता से नहीं लिया। एक पुलिस वाला उस पर व्यंग्य  कर रहा था, सुजैट के बियर पीने और डिस्को जाने को लेकर। तब  सुजैट का दिल दहल जाता था, जब वो उसके साथ हुए मेडिकल टेस्ट्स के बारे सोचती थी। बिना कपड़ों के खड़ा रहना, जख्मों का छुआ जाना, तरह-तरह के टेस्ट झेलना और स्वेब टेस्टिंग। जानने वाले और अजनबी सभी के एक जैसे विचार थे मुझे लेकर। नेताओं ने तो मुझे पेशेवर बोल डाला। मुझे ये तक कहा गया कि ये घटना फिक्स थी जो कि गलतीवश गलत दिशा में चली गयी।’‘  यहां तक कि बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ये तक कह डाला कि ये एक झूठी, मनगढंत घटना है। मंत्रियों ने कार्यवाही करने के बजाय जॉर्डन के चरित्र पर ऊंगली उठाना शुरू कर दिया। उनके हिसाब से जॉर्डन कैसी मां है जो आधी रात को घर से बाहर थी। सुजैन ने कहा था, ”मेरी बेटी जब सुबह स्कूल के लिए निकलती थी तो कुछ लोग उसे घूरते हुए भद्दे कमेंट करते थे।  आखिरकार एक दिन मैंने ये फैसला किया की बहुत हो गया। मेरे साथ बुरा हुआ, बहुत बुरा हुआ मगर मै अभी जिंदा हूं और लडऩा चाहती हूं। मै जैसी हूं वैसे ही लड़ूंगी, न कि किसी धुंधली परछाई में रहकर।’‘ उन्होंने बलात्कार के खिलाफ आवाज उठाने और अन्य पीडि़तों को हिम्मत दिलाने की कोशिशों के तहत अपनी नाम और पहचान जाहिर की। इस घटना के बाद जॉर्डन की फॅमिली ही उसका कवच बनी रही। उसकी छोटी-सी बेटी ने ही उनका साहस बंधाया कि ये मत सोचो की दुनिया क्या कह रही है। उनकी 76 वर्ष की दादी ने उनको प्रोत्साहन दिया कि वो पुलिस में शिकायत करे। एक एनजीओ ने स्वयं उनका साथ दिया। सुजैट का अपनी पहचान को सबके सामने लाने का निर्णय ट्रायल में तेजी लाने जैसा था। एक वकील ने कहा था कि वह न्यायलय की पवित्रता को भंग कर रही हैं। सुजैट ने पूछा था, ”जब कोर्ट के दरवाजे खुलते हैं, जब दोषी की पूरी फॅमिली बाहर होती है और वो लोग मेरी फोटो अपने मोबाइल से खींचते हैं तब मेरी पवित्रता भंग नहीं होती?’‘ सितम्बर, 2014 में सुजैट के साथ एक और चौंकाने वाली घटना घटी, जब कोलकाता के एक मशहूर रेस्टोरेंट में घुसने से उन्हें इस वजह से रोक दिया गया क्योंकि मैनेजर ने उन्हें पहचान लिया था कि वह पार्क स्ट्रीट केस वाली पीडि़ता हैं। दूसरी तरफ रेस्टोरेंट के मैनेजर दीपेन बनर्जी का कहना ये था कि उसने जॉर्डन को इस वजह से मना किया क्योंकि उसके रेस्टोरेंट में आने से रेस्टोरेंट में हलचल मच सकती थी। मैनेजर ने तुरंत कहानी गढ़ी कि सुजैट पहले भी अलग-अलग लोगों के साथ वहां जा चुकी थी और काफी हंगामा कर चुकी थी और उसके पास इसकी वीडियो फुटेज भी है। लेकिन जॉर्डन का कहना था कि मैनेजर की बातें झूठ हैं, वो पहले सिर्फ एक बार ही इस रेस्टोरेंट में आई है। ऐसी स्थिति में लोगों का रुख यही होता है। सुजैट के केस की तुलना निर्भया के केस के साथ उलटी तरह से की गयी, बैड विक्टिम बनाम गुड विक्टिम। सुजैट यौन प्रताडऩा के सर्वाइवरों की मदद के लिए चलाई जा रही हेल्पलाइन में काउंसलर का काम कर रही थीं। मेडिटेशन और काउंसलिंग की मदद से सुजैट एक साल पहले हुए रेप के बाद धीरे-धीरे सामान्य जिंदगी की ओर लौट रही थी। सुजैट अब जिंदगी को साधारण रूप से जीने की कोशिश कर रही थी। वो जिन्दगी की छोटी-छोटी खुशियों से फिर के काफी कुछ सीख रही थीं। परिवार के लिए खाना बनाना, अपनी प्यारी-सी बिल्ली के साथ खेलना और अपने पौधों की देखभाल करना उन्हें अच्छा लगता था। सुजैट कहतीं, ”मुझे डिस्को अच्छे लगते हैं। मुझे डांस अच्छा लगता है, मगर मंै उस दिन के बाद से कभी भी वहां वापस नहीं गई। मेरा मन करता है कि मंै पार्टी में जाऊं। वैसे ही ड्रेसअप होने का मन करता है, मगर बहुत डर लगता है।’‘ जहां रेप की शिकार महिलाएं गुमनामी

की जिंदगी जीने को मजबूर हो जाती हैं, जहां रेप करने वाला व्यक्ति अपनी करतूत का निर्लज्जता से बखान करता फिरता है, वैसे देश में सुजैट ने अंधेरे में रहने से इंकार किया। उन्होंने सिखाया कि जिन महिलाओं के साथ रेप हुआ है, उन्हें हम ‘विक्टिम’ नहीं ‘सर्वाइवर’ पुकारें। उन्होंने आमिर खान के शो ‘सत्यमेव जयते’ में अपनी आपबीती साझा की थी। सुजैट की मृत्यु से एक साहसी महिला के न रहने का दुख होता है। विडंबना यह कि इस देश में अब भी महिलाओं के साथ निरंतर बलात्कार हो रहे हैं और व्यवस्था इस सबसे नितांत उदासीन है। जब हो-हल्ला होता है, तब कुछ सक्रियता दिखती है फिर वही असंवेदनशीलता। आखिर यह कैसा समाज है, कैसा तंत्र है?

शैलेन्द्र चौहान

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