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नन्दकिशोर शर्मा ‘नन्दूजी’ श्री श्याम भक्ति का अनूठा सूरज

नन्दकिशोर शर्मा ‘नन्दूजी’  श्री श्याम भक्ति का अनूठा सूरज

भारतीय परम्परा एवं संस्कृति में भजनों एवं भक्ति-संगीत की महत्वपूर्ण भूमिका है। भजन और भक्ति संगीत मन को ही नहीं हमारी आत्मा को छू कर हमारे जीवन को पवित्रता और कल्याण की ओर अग्रसर करते है। भजन हमारे जीवन को विकारी संसार से विमुक्त कर दिव्यता की ओर ले जाने का सशक्त माध्यम है। आधुनिक समय में अनेक देवी-देवता के भक्ति-संगीत की अलौकिकता एवं दिव्यता ने जन-जन के कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया है। लेकिन इनमें श्री श्याम प्रभु के भक्ति-संगीत ने एक अलग ही आध्यात्मिक फिजा प्रस्तुत की है और उसे शिखर देने मे श्री नन्दकिशोर शर्मा ‘नन्दूजी’ का अविस्मरणीय एवं अनूठा योगदान हैं।

सूरज की एक किरण को देखकर सूरज बनने का सपना संजोने वाला महान होता है। वह और अधिक महान होता है, जो सूरज बनने का सपना देखकर परिपूर्ण सूरज बन जाता है। शताब्दियों के बाद कोई-कोई व्यक्ति ऐसा होता है जो अपनी रोशनी से समूची मानवता को उद्भासित कर देता है। आध्यात्मिक तेज एवं लोकहितकारी प्रवृत्तियों के सोपानों पर आरूढ़ नन्दूजी के जीवन का गुंफन अनेक तत्वों से हुआ। वे ज्ञानी हैं, साधक हैं, योगी हैं, भजन सम्राट हैं और सिद्ध पुरुष हैं। कुछ व्यक्ति प्रतिदिन योग की साधना करते हैं। सिद्धि-तत्व तक पहुंचने का प्रयास करते हैं। कुछ व्यक्ति जन्म से योग-सिद्धि लेकर आते हैं और योग-सिद्धि पुरुष बन जाते हैं। नन्दूजी का अवतार दूसरी श्रेणी का है। उनमें सहिष्णुता, विनम्रता, कृतज्ञता, भक्ति आदि सर्वोत्तम गुण सहज विकसित हैं। श्री श्याम भक्ति ने उन्हें सिद्ध बना दिया है। उन्होंने वचन-सिद्धि की साधना नहीं की पर बहुत बार अनेक लोगों ने अनुभव किया कि उनमें वचन-सिद्ध की विलक्षण शक्ति है। हजारों-हजारों व्यक्ति उनके एक वचन को पाकर निहाल हो जाते हैं। सिद्धि के बिना ऐसा संभव नहीं है।

राजस्थान के नवलगढ़ शहर में दिनांक 21 नवंबर 1949 को जन्में नन्दजी श्री श्याम प्रभु की भक्ति में लीन हो उनके चरणों में अपना जीवन समर्पित कर दिया। उनकी सम्पूर्ण शिक्षा-दीक्षा बिहार के दरभंगा में सम्पन्न हुई। वे विज्ञान के छात्र रहे हैं। उन्होंने ‘श्री देवराहा बाबा’ और ‘श्री चैतन्य हरिजी’ को गुरुरूप में पाकर भक्तिमार्ग अपना लिया और प्रभु भक्ति में लीन हो गये। भक्तिमार्ग अपनाने के बाद आराध्य शिवरूप श्री श्याम की छवि को अपने मनमंदिर में बसा कर सैकड़ों भजनों की रचना की। साथ ही अपने श्रीमुख से इन अमृतरूपी भजनगंगा को गाकर जन-जन तक प्रवाहित किया, वहीं दूसरी तरफ अपने द्वारा रचित भजनों की माला का प्रकाशन ‘दया बाबा की’’ पुस्तक के रूप में किया, जिसके अनेकों संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। आपके भजनों के अनेक एलबम तैयार होकर जन-जन को प्रतिदिन भक्ति में सराबोर करते हैं। आपने श्री श्याम बाबा के अलावा बालाजी महाराज, अम्बे माता, आदि सभी हिन्दू देवी-देवताओं पर भजन लिखे और गाये है। आपके सान्निध्य एवं स्वरों में ‘नानी बाई का मायरा’ की प्रस्तुति देख-सुनकर भक्तजन भावविह्वल हो जाते है। ‘अम्बे हम तेरी संतान हैं क्या मांगू मैं क्या मांगू’, ‘कीर्तन की है रात’, ‘भरदे भरदे श्याम झोली भरदे’, ‘आपके चरणों में उमर कट जाए सारी’, ‘इतनी कृपा सांवरे बनाए रखना’, ‘ऐ बाबा तेरा शुक्रिया’, ‘ले गया दिल मुरलीवाला’ और ‘मेरी श्याम ने पकड़ी बांह’ समेत सैकडों भजन घर-घर में पूरे आदर एवं श्रद्धा के साथ सुने जाते हैं, गाये जाते हैं। हर दिन देश के किसी-न-किसी हिस्से में स्वयं नन्दूजी श्री श्याम दरबार सजाते हैं और अनेकों जगह उनके भक्त श्री श्याम भक्ति में उनके लिखे-गाये भजनों से अपने जीवन को धन्य करते हैं।

‘नन्दूजी’ महाराज के जीवन का हर क्षण श्री श्याम बाबा को ही समर्पित है। श्री श्याम बाबा की अनुकंपा एवं प्रेरणा से हजारों किलोमीटर की यात्रा कर भारत एवं नेपाल के सैकड़ों शहरों में बाबा का गुणगान किया। श्री श्याम बाबा की यह यात्रा 352 दिनों तक लगातार चली, जिसमें लाखों भक्तों ने अपनी सहभागिता निभाई। नन्दूजी के सानिध्य और मार्गदर्शन में 437 श्याम प्रेमियों के एक समूह ने 2010 में सिंगापुर, थाईलैंड, मलेशिया में यात्राएं करते हुए विदेशी धरती पर बाबा का परचम फहराया। 2015 में चीन की यात्रा की और वहां अलग-अलग जगह पर बाबा की जोत जलाई और श्याम बाबा के संकीर्तन किये।

नन्दू भैयाजी का मानना है कि श्री श्याम का भजन विधाता के लिखे विधान को भी पलट देता है। जिसकी जिह्वा के अग्रभाग पर सदैव श्री श्याम का नाम होता है, उसे जीवन में सब कुछ मिल जाता है। प्रभु का नाम ऐसे जपें जैसे ध्रुव, सुदामा एवं शुकदेवजी ने जप किया। श्री श्याम बाबा की भक्ति अध्यात्म की रहस्यमय पिटारी है। यह वह संगीत-संसार है जिसे बार-बार सुनने से मानव जीवन सार्थक हो जाता है। मन के क्लेश तब तक नहीं मिटते जब तक हम भगवान की भक्ति में नहीं डूबते। अपने असली स्वरूप को परखने के लिए श्री श्याम भक्ति एक कसौटी है। हमें परमात्मा नहीं अपितु आनंद की खोज करनी है।

परमात्मा नहीं खोया है, हमारा आनंद हमसे छिन गया है। इस आनन्द को पाने के लिये श्री श्याम भक्ति और उनकी साधना में गोता लगाना जरूरी है।

श्री नन्दू भैयाजी का मानना है कि साधना में अगाध क्षमता है, क्योंकि वह एकाक्षी है। साधना के एकाक्षी होने का प्रमाण कृष्ण का बांसुरी की रागात्मकता में मिलता है। दिन हो या अंधेरी रात, बांसुरी के स्वरों में सभी रागमय हो जाते हैं। तब अन्य विचार तिरोहित हो जाते हैं और स्वर के राग-केन्द्रों में जीवन की गति समाहित कर देते हैं। सूफी चिंतक और साधक भी ऐसे ही जीवंत पुरुष होते हैं। उनके जहां-जहां हस्ताक्षर पहुंचते हैं, वहां जड़ भी जीवित होकर जीवन की सांस लेने लगते हैं। अमिट हस्ताक्षर ही तो साक्षात् ब्रह्म हैं, जिसे वे मिल जाएं, अभिलाषाएं शेष नहीं रहतीं।

15-10-2016

नन्दूजी का व्यक्तित्व इतना विशाल एवं व्यापक था कि हम उन्हें केवल भजन सम्राट की सीमा में नहीं बांध सकते, क्योंकि उच्च कोटि के साधक है, समाज-सुधारक हैं, धर्म-प्रचारक है। उनकी साधना व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं है। उन्होंने अध्यात्म और साधना को सार्वजनिक जीवन में प्रतिष्ठित करने का महनीय कार्य किया। वे पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक पूरी दुनिया में जीवन-पर्यंत श्री श्याम बाबा के मिशन को लेकर मनुष्य को मनुष्य बनाने की ललक के साथ गतिशील हैं। वे मानव मात्र की मंगल भावना एवं कल्याण से ओतप्रोत होकर ही बाबा के भजनों की मंदाकिनी प्रवाहित करते हैं। वे अपनी दिव्यवाणी और लोकरुचि वाली अभिव्यक्ति के लिए प्रभु प्रेमियों में आदर से सुने जाते हैं। जीवन के हर क्षेत्र, हर विषय एवं हर समस्या पर नन्दूजी का विश्लेषण अद्भुत और अनुकरणीय है। वे जीवन की समस्याओं का हल श्री श्याम दरबार के माध्यम से सहजता से देते हैं। भक्ति, परमात्मा प्राप्ति और ज्ञानार्जन के विषय में उनके दिए सूत्र अद्वितीय हैं।

पिछले तीन दशकों से नि:शुल्क भजन गायन कर रहे नंदूजी आज के अधिकतर साधु-संन्यासियों, धर्मगुरुओं की तरह हाईटेक नहीं हैं। बल्कि सादगी, सरलता एवं विनम्रता की वे ऐसी मिसाल है जो भौतिकता से लिप्त आज के साधु समाज के लिये प्रेरणा का काम करती है। वे युवाओं को देश की सबसे बड़ी ताकत मानते हैं। वे बालिकाओं के कल्याण के लिये तत्पर है। गौ-माता के उत्थान के लिये वे निरन्तर प्रयत्नशील रहते हैं। मनुष्य के जीवन में फैले हुए तमस को नन्दूजी जैसा आलोकधर्मी व्यक्तित्व ही दूर कर सकता है। श्री श्याम भक्ति एवं अध्यात्म का आलोक बिखेरने वाला उनका यह विराट व्यक्ति आज जन-जन के आकर्षण का केन्द्र बन गया है।

 ललित गर्ग

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