ब्रेकिंग न्यूज़ 

तलाकशुदा दम्पत्ति के बच्चों का दुर्भाग्य

तलाकशुदा दम्पत्ति के बच्चों का दुर्भाग्य

वैवाहिक सम्बन्धों में जब पति-पत्नी आपस में छोटी-छोटी बातों पर लड़ाई-झगड़ों के कारण तनावयुक्त जीवन बना लेते हैं और एक लम्बी अवधि इस प्रकार के वातावरण में जीने के बाद वे एक-दूसरे से तलाक के लिए तैयार हो जाते हैं। परन्तु भारत की अदालतें वैवाहिक संबंधों को गुड्डे-गुडिय़ा का खेल नहीं मानती। इसलिए बार-बार अदालतों द्वारा ऐेसे निर्णय दिये जाते हैं जिनमें छोटे-मोटे लड़ाई झगड़ों को तलाक के आधार के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता। भारतीय न्याय प्रक्रिया आज के इस आधुनिक दौर में भी परिवारों की सुदृढ़ता को बनाये रखने के लिए हर सम्भव प्रयास कर रही है। आधुनिक समाज का यह एक कड़वा सत्य है कि आजकल के युवक-युवतियां बहुत जल्दी गुस्से, तनाव और अवसाद के शिकार हो जाते हैं। उनकी ऐसी मानसिकता के मूल में स्वाभाविक रूप से दिमाग का व्यापारीकरण अर्थात् धन कमाने की दौड़ और होड़, शराब आदि व्यसन, पति-पत्नी को छोड़कर पर-स्त्री-पुरुष संबंधों में लिप्त होना आदि कुछ ऐसे कारण हैं जो उनकी बुद्धि को अपने परिवार में एकाग्र नहीं होने देते। वैवाहिक संबंधों में तनाव के बीज बोने में दहेज और वैवाहिक लेन-देन की भी पूरी भूमिका है।

दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री प्रदीप नन्द्राजोग तथा श्रीमती प्रतिभा रानी की खण्डपीठ ने राजदीप कौर बनाम गुरमीत सिंह नामक निर्णय के माध्यम से एकबार फिर भारतीय समाज को यह स्पष्ट संदेश देने का प्रयास किया है कि निर्दयता के आधार पर पारिवारिक सम्बन्धों को समाप्त करना तभी सम्भव है जब उस निर्दयता में पति या पत्नी के कुछ ऐसे दुष्कर्म शामिल हों जिनसे दूसरे पक्ष के जीवन, शारीरिक अंगों, शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य आदि को खतरा पैदा होता हो। निर्दयता की अवधारणा समय, स्थान और व्यक्तियों पर अलग-अलग प्रकार से निर्धारित होती है। निर्दयता का अभिप्राय प्रेम और सद्भावना की समाप्ति के रूप में देखा जाता है। पति-पत्नी में एक-दूसरे के प्रति निर्दयता तभी महसूस की जा सकती है जब पारिवारिक सम्बन्धों की भावनाएं पूरी तरह से समाप्त हो चुकी हों और एक दूसरे के साथ इकट्ठे रहने का विचार पूरी तरह से लुप्त हो चुका हो। यह ऐसी अवस्था होती है जिसमें दो पक्षों को एक साथ रहने के लिए बाध्य करना ही अपने आपमें एक निर्दयता बन जायेगी। ऐसी अवस्थाओं में निर्दयता को आधार मानकर वैवाहिक संबंधों को समाप्त किया जा सकता है। इस न्यायिक विश्लेषण के बाद प्रत्येक मुकदमें के तथ्य ही यह निर्धारित कर सकते हैं कि पति या पत्नी में से किसी एक पक्ष पर निर्दयता का आरोप पारिवारिक सम्बन्ध को समाप्त करने लायक है या नहीं।

दिल्ली की राजदीप कौर एक बड़े अस्पताल में नर्स की नौकरी करती थी और गुरमीत सिंह टेलीफोन विभाग में काम करता था। नवम्बर, 2006 में दोनों का विवाह सिख रीति-रिवाज के साथ एक गुरुद्वारे में सम्पन्न हुआ। सितम्बर, 2007 में इस दम्पत्ति का एक पुत्र पैदा हुआ। अप्रैल, 2008 में राजदीप अपने पुत्र को लेकर अपने मायके चली गई। इस प्रकार इस संक्षिप्त लगभग दो वर्ष के वैवाहिक जीवन को ग्रहण लग गया। गुरमीत सिंह ने हिन्दू विवाह अधिनियम में वर्णित तलाक के विभिन्न आधारों में निर्दयता और वैवाहिक जीवन के परित्याग को आधार बनाकर राजदीप कौर के विरुद्ध तलाक का मुकदमा प्रस्तुत किया।

तलाक के लगभग सभी मुकदमों में जब याचिकाकर्ता पक्ष वकील साहब के सम्पर्क में आता है तो वकील साहब उसकी सारी सच्ची कहानी को चटपटा बनाने के लिए कई प्रकार के झूठे मसाले भी डाल देते हैं। वकील साहब का तर्क याचिकाकर्ता को स्वीकार करना पड़ता है, क्योंकि उसे झूठे आरोपी तथ्यों के बारे में यह कहा जाता है कि इनके बिना तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार नहीं होगी। मजबूरी में याचिकाकर्ता अपनी शिकायतों, याचिकाओं या पुलिस रिपोर्ट में कुछ सच्चे तथ्यों के साथ कई झूठे तथ्य भी जोड़ देता है। इस प्रकार शुरू होता है एक अन्याय युद्ध जिसमें एक पक्ष द्वारा झूठे आरोपों के उत्तर में दूसरा पक्ष भी उसी प्रकार कई अन्य झूठे आरोप वकालत की सलाह के वशीभूत उगलने लगता है। परन्तु पक्षकार और वकील साहेबान भी यह भूल जाते हैं कि अन्तत: ‘सत्यमेव जयते’ अर्थात् सत्य की ही सदैव विजय होती है। कोई भी न्यायाधीश केवल पक्षकारों के लिखे-लिखाये तथ्यों पर निर्णय नहीं देता अपितु प्रत्येक तथ्य के साथ जुड़े और निश्चित प्रमाण अदालतों में प्रस्तुत करने होते हैं। अक्सर झूठे तथ्यों को प्रमाणित करना असम्भव सा ही होता है। इसलिए न्यायाधीश भी याचिका तथा उसके उत्तर-प्रतिउत्तर के समर्थन में प्रस्तुत प्रमाणों का जब आंकलन करता है तो वह सच्चाई को काफी हद तक समझने लगता है।

गुरमीत सिंह ने अपनी तलाक याचिका में राजदीप कौर पर निर्दयता और गृहत्याग के सम्बन्ध में अनेकों प्रकार के आरोप लगाये और उत्तर में राजदीप ने भी गुरमीत सिंह पर आरोपों की झड़ी लगा दी। दोनों ने अपने-अपने प्रस्तुत तथ्यों के आधार पर अपने वक्तव्य ट्रायल अदालत के समक्ष प्रस्तुत किये। ट्रायल अदालत ने गुरमीत की याचिका को स्वीकार करके तलाक का आदेश दे दिया।

उच्च न्यायालय की खण्डपीठ ने अपील पर दिये अपने निर्णय में इस सारे पारिवारिक विवाद का विश्लेषण करते हुए कहा कि वास्तविक समस्या एक तरफ गुरमीत का मानसिक रोगों से ग्रस्त रहने, उनका उपचार न करने और शराब की आदत के कारण अक्सर गुस्से में रहने से सम्बन्धित थी। दूसरी तरफ एक नौकरी करने वाली नव-विवाहित महिला जिस प्रकार अपने मायके की कुछ समस्याओं के साथ-साथ जब ससुराल की यातनाएं भी झेलती है तो उसमें कुछ न कुछ अस्वाभाविक व्यवहार उत्पन्न हो ही जाता है। वास्तव में राजदीप ने अपने पति के साथ शरीर और आत्मा तक की साझेदारी की थी परन्तु गुरमीत के व्यवहार के कारण वह प्रताडि़त महसूस करने लगी। गुरमीत सिंह के द्वारा राजदीप पर लगाये गये कुछ आरोप तो बिल्कुल ही निराधार और झूठे लगते हैं। उच्च न्यायालय के निर्णय में यह कहा गया कि इस सारे मामले में राजदीप कौर का व्यवहार निर्दयता की श्रेणी में नहीं आता। वास्तव में यह समस्या गुरमीत सिंह के अवसाद ग्रस्त व्यवहार के कारण थी। इस विश्लेषण के बाद उच्च न्यायालय ने राजदीप कौर की अपील याचिका को स्वीकार करते हुए ट्रायल अदालत के तलाक निर्णय को रद्द कर दिया।

                (लेखक सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं)

विमल वधावन

александр лобановский биографияотзовик

Leave a Reply

Your email address will not be published.