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फिर फन उठाता अल कायदा

फिर फन उठाता अल कायदा

नौ सितंबर 2001 को न्यूयार्क के वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर हुए आतंकी हमले ने सारी दुनिया को दहला दिया था। महाबली अमेरिका पर आतंकी हमले को अंजाम देनेवाले अल कायदा के नेता ओसामा बिन लादेन से सारी दुनिया खौफ खाने लगी थी। इस घटना को हाल ही में पंद्रह साल पूरे हो गए लेकिन उसके बाद अल कायदा 11 सितंबर जैसे किसी थर्रा देनेवाली किसी वारदात को अंजाम नहीं दे पाया और उसके बाद पैदा हुआ खूंखार आतंकी संगठन आईएसआईएस जो आतंक की दुनिया पर इस कदर छा गया कि लोगों को लग रहा है कि वह अल कायदा को निगल गया। अल कायदा अब इतिहास की वस्तु बन गया है। कभी-कभी अल कायदा के नेताओं जवाहिरी आदि के  बयानों के अलावा अल कायदा का  कोई अस्तित्व ही नजर नहीं आता। आखिर हकीकत क्या है?

हकीकत यह है कि 11 सितंबर का दुस्साहस अल कायदा को बहुत भारी पड़ा। उसके बाद अमेरिका ने अगले छह माह में संगठन के अफगानिस्तान स्थित बुनियादी ढांचे को खत्म कर दिया। उसका नेतृत्व या तो मारा गया या गिरफ्तार हो गया। ओसामा बिन लादेन को भी छुप कर ही अपने आखिरी दिन गुजारने पड़े। आखिरकार वह भी पाकिस्तान में मारा गया। इसके बाद संगठन की बागडोर ओसामा के सबसे विश्वस्त सहयोगी और नंबर-2 अयमान अल जवाहिरी के हाथों में आई। उसे जिहादी आंदोलन का लंबा अनुभव था मगर उसमें ओसामा बिन लादेन जैसी नेतृत्व की क्षमता और दुस्साहस नहीं था। इसलिए लोगों को लगने लगा कि अल कायदा अब ऐसा शेर है जो दहाड़ता तो है मगर नख दंत विहीन है। तभी तो अल कायदा की आतंकी गतिविधियां ठंडी पड़ी हुई हैं। दूसरी तरफ अल कायदा की ईराक ईकाई ने आईएसआईएस बनाया और उसका दबदबा कहीं ज्यादा है। उसने कई मामलो में अल कायदा को पीछे छोड़ दिया। यह गुरू गुड़ रहे चेले शक्कर हो गए की नायाब मिसाल है। अल कायदा लंबे समय तक सोचती रही मगर कभी हिम्मत नहीं कर पाई कि उसके पास स्वतंत्र देश हो और खिलाफत बन जाए लेकिन आईएसआईएस ने इराक और सीरिया में  यह कर दिखाया। आज दुनिया की दो महाशक्तियां रूस, अमेरिका और 80 देश का गठबंधन उसके खिलाफ युद्ध लड़ रहा है मगर आईएसआईएस दो साल से ड़टा हुआ है। उस पर बरसने वाले हजारो बम और मिसाइलें उसे कम से कम अभी तक घुटने टेकने के लिए मजबूर नहीं कर पाए। आतंक के बाजार में उसकी साख इतनी जबरदस्त है कि अल कायदा के कई सहयोगी संगठन पाला बदल  कर आईएसआईएस के साथ चले गए।

लेकिन ग्लोबल जिहाद के कई जानकार मानते हैं कि अभी आईएसआईएस भले ही आगे निकल गया हो मगर यह खरगोश और कछुएवाली कहानी है। अल कायदा लंबी पारी खेलनेवाला संगठन है। उसका मुकाबला आईएसआईएस नहीं कर पाएगा। यह इससे ही स्पष्ट है कि 80 देशों के गठबंधन के खिलाफ युद्ध में आईएसआईएस की उलटी गिनती शुरू हो गई है। उसे अपनी 30 प्रतिशत जमीन खोनी पड़ी है। इससे  एक तरह से स्पष्ट है कि देर-सबेर उसकी हार तय है उसमें वक्त भले ही ज्यादा लगे। इसके बाद अल कायदा के दिन फिरेंगे क्योंकि आईएसआईस के अलावा वही एकमात्र ऐसा आतंकी संगठन है जिसका ग्लोबल आधार है।

15-10-2016

इसके अलावा अल कायदा ने अपनी पिछली गलतियों से सबक सीखा है और उस पर अमल करने की कोशिश की है। हाल ही में उन्होंने अपनी ईकाइयों को निर्देश दिए हैं कि वे मॉल और मस्जिदों में आतंकी कार्यवाईयां न करें, न ही शियाओं के खिलाफ हिंसक कार्रवाई करें। इस तरह अयमान अल जवाहिरी न केवल संगठन को बचाने में कामयाब रहे हैं वरन उन्होंने उसका क्षेत्रों में विस्तार करने में भी सफलता पाई है।

लीबिया, माली और सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक में वह प्रमुख आतंकवादी संगठन के तौर पर उभरा है। यमन में तो बहुत बड़े इलाके पर उसका कब्जा है।

अल कायदा में इस वर्ष सबसे बड़ा बदलाव यह आया है कि अल कायदा को उसका आतंक का शहजादा मिल गया है। बिन लादेन ने अपने पुत्र हमजा को अपने राजनीतिक वारिस के तौर पर तैयार किया था। अल कायदा चीफ ओसामा बिन लादेन को अमेरिकी कमांडोज ने 2011 में पाकिस्तान के एबटाबाद में मार गिराया था।

ओसामा के ठिकाने से मिले दस्तावेजों से पता चला था कि उसके सहयोगी हमजा के साथ मिलकर संगठन को फिर से खड़ा करने की कोशिश कर रहे थे। उनके मुताबिक हमजा  9/11 हमले से पहले अफगानिस्तान में पिता की तरफ से लड़ रहा था। हमजा पिता से मिलने पाकिस्तान भी जाता था। अल कायदा के नए चीफ अल-जवाहिरी ने पिछले साल अगस्त में दुनिया को हमजा से रूबरू कराया था।

पिछले दिनों हमजा बिन लादेन का 21 मिनट का यह भाषण ‘वी आर ऑल ओसामा’ शीर्षक से सामने आया है। इसमें हमजा ने कहा है- ‘हम तुम पर (अमेरिका) हमले करना जारी रखेंगे।’ दरअसल जिस तरह से हमजा को संगठन में महत्व दिया जा रहा है उससे स्पष्ट है कि देरसबेर उसके ही हाथों में संगठन की कमान होगी। अल कायदा को उम्मीद है कि उसका नेतृत्व संगठन में नई जान फूंकेगा। हमजा का अल कायदा में उभरना इस बात का संकेत है कि वंशवाद राजनीति में ही नहीं अपितु आतंक की दुनिया में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

सतीश पेडणेकर 

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