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राजस्थान में जाट मुख्यमंत्री की मुहिम

राजस्थान में जाट मुख्यमंत्री की मुहिम

दो बार मुख्यमंत्री और तीन पारी में प्रदेश अध्यक्ष रहे अशोक गहलोत एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट के बीच नेतृत्व की रस्साकसी तथा राजस्थान के भावी मुख्यमंत्री पद की लालसा के संघर्ष में कांग्रेस की जातीय राजनीति में जाट को अगला मुख्यमंत्री बनाने की मुहिम में नए राजनीतिक समीकरणों का ताना-बाना बुना जाने लगा है।

पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार तथा भारतीय जनता पार्टी को मिली ऐतिहासिक जीत के पश्चात कांग्रेस हाईकमान ने अजमेर से सांसद रहे सचिन पायलट को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मनोनीत कर युवा नेतृत्व को मौका देने की पहल की थी। इसी तरह विधानसभा में जाट समुदाय के अपेक्षाकृत युवा नेता रामेश्वर डूडी को प्रतिपक्ष का नेता बनावाया गया। पूर्व केन्द्रीय मंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे डा. सी. पी. जोशी को पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव बनाकर प्रदेश की राजनीति से परे रखने की कोशिश की गई। लेकिन प्रदेश कांग्रेस में गुटबाजी तथा नेतृत्व की लड़ाई को हवा दी जाती रही।

इधर भाजपा के बागी और निर्दलीय विधायक हनुमान बेनीवाल ने नागौर जिले के खींवसर में आयोजित एक सम्मेलन में प्रदेश में अगला मुख्यमंत्री जाट समुदाय से बनाने का आव्हान करके जातीय नेतृत्व की राजनीति में नई हलचल का प्रयास किया है। राजस्थान विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे हनुमान बेनीवाल ने भाजपा का पल्ला पकड़ कर अपना चुनावी सफर आरम्भ किया था लेकिन प्रदेश नेतृत्व से खफा होकर उन्होनें अपनी अलग राह चुन ली है। इसी सम्मेलन में हनुमान ने यह मंशा भी जता दी थी कि यदि कांग्रेस किसी जाट नेता को मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा कर दे तो वह भी कांग्रेस का झंडा थामने को तैयार है। उन्होंने यह भी भरोसा जताया है कि प्रदेश में तीसरे मोर्चे की मदद से नई सरकार बनेगी जो चहुंंमुखी विकास को नये आयाम देगी।

गौरतलब है कि भाजपा के एक अन्य बागी नेता डा. किरोड़ी लाल मीणा ने भी पिछले विधानसभा चुनाव में राजपा के बैनर पर कम से कम चालीस विधायक चुनवाकर सरकार के गठन की चाबी अपने पास होने का मानस बनाया था लेकिन मीणा दम्पत्ति सहित इस पार्टी के कुल चार विधायक चुने गए। दो सौ सदस्यीय विधानसभा में भाजपा ने 161 सीट जीतकर कीर्तिमान बनाया और कांग्रेस महज 21 विधायकों से प्रतिपक्ष के नेता की हैसियत बचाने में सफल रही। डा. किरोड़ी और हनुमान बेनीवाल मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे के मुखर विरोधी है। भाजपा का नेतृत्व बदलने पर मीणा पुन: पार्टी का दामन थामने की मंशा जता चुके है।

प्रदेश मे तीसरे मोर्चे के गठन की संभावना को भाजपा तथा कांग्रेस ने कभी मूर्त रूप देने का प्रयास सफल नहीं होने दिया है। तीसरे मोर्चे के पैरोकार रहे वामपंथी दल (माकर्सवादी) तो पहली बार विधानसभा में प्रवेश नहीं पा सके। बहुजन समाज पार्टी ने जरूर पूर्वी राजस्थान के बलबूते राज्य में दस्तक देने के प्रयास किये। तेरहवीं विधानसभा के लिये इस पार्टी के छ: विधायक चुने गये थे। लेकिन कांग्रेस के कद्दावर नेता अशोक गहलोत ने बसपा के सभी छ: विधायकों को शामिल कर दूसरी बार मुख्यमंत्री पद पाने में सफलता हासिल कर ली। नेतृत्व विहीन बसपा ने भगवान सिंह की जगह सुमरथ सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। धर्मवीर अशोक को पुन: प्रदेश प्रभारी बनाया गया है और उनका दावा है कि पिछली बार निर्वाचित छ: विधायकों में से चार ने उनसे सम्पर्क किया है। इस घटनाक्रम से कांग्रेस में हलचल तेज हो गई है। बसपा का नया नेतृत्व पार्टी हाईकमान की आशाओं पर कितना खरा उतरता है, यह तो आने वाला वक्त बताएगा। बहरहाल बसपा के संगठनात्मक ढांचे में बदलाव तथा इसकी गतिविधियों से तीसरे मोर्चे की संभावना को फिलहाल नकारा नहीं जा सकता।

15-10-2016

कांग्रेस हाईकमान की पहल से पुन: राजनीति में सक्रिय हुये प्रदेश प्रभारी और राष्ट्रीय महासचिव गुरूदास कामत ने प्रदेश कांग्र्रेस के वरिष्ठ नेताओं की आपसी गुटबाजी समाप्त कराने के मकसद से डिनर डिप्लोमेसी का सहारा लेने की पहल की ताकि पार्टी के वरिष्ठ नेता आपस में मिल-जुलकर बैठे ताकि उनका मतभेद कम हो और पार्टी कार्यकताओं के बीच अच्छा संदेश जाये। इसकी शुरूआत पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने की। इधर पार्टी के बड़े नेताओं का जन्मदिन शक्ति परीक्षण का सबब बन गया। प्रतिपक्ष के नेता रामेश्वर डूडी का जन्मदिन मना तो प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट का 39वां जन्मदिन भी धूमधाम से मनाया गया। रक्तदान, फल वितरण सहित जगह-जगह अन्य आयोजन हुये। कांग्रेस नेतृत्व को यही डर सता रहा है कि जन्मदिन मनाने की यह बीमारी संभाग या जिला स्तर पर अपने पैर नहीं फैला लें। ऐसा हुआ तो आपसी गुटबाजी और गहरा जाएगी। प्रदेश कांग्रेस की जम्बो कार्यकारिणी में प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट ने सभी वर्गो को खुश रखने का प्रयास किया लेकिन उन पर अपने जातीय गुर्जर वर्ग को तरजीह देने का आरोप तो लगाया ही जाता है। प्रदेश महिला युवक कांग्रेस अध्यक्ष महासचिव भी उनके समुदाय के है। इधर जयपुर देहात जिला कांग्रेस की कार्यकारिणी की घोषणा में सदस्यों तथा पदाधिकारियों के नाम के आगे जातीय सम्बोधन लिखे जाने पर यह राजनीतिक मुद्दा बन गया है। प्रदेश नेतृत्व और सम्भावित मुख्यमंत्री पद के लिये प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट का नाम उछलवाने की राजनीतिक उठापटक की सतही पर्त भले ही शुष्क दिखाई देती हो पर अंदर से लावा गर्म है। प्रतिपक्ष के नेता का नाम भी इसमें जोडऩे से सरगर्मी बढ़ी है और निर्दलीय विधायक हनुमान बेनीवाल के जाट मुख्यमंत्री के फलसफे से मुद्दे को हवा मिली है। उधर प्रदेश कांग्रेस सचिव सुशील आसोपा ने अपने पद से त्यागपत्र दिया है और यह समझा जाता है कि उन्हें आई.टी. प्रभारी नहीं बनाने से वह रूष्ट है। गौरतलब है कि इंजीनियरिंग की नौकरी से राजनीति में आये आसोपा ने कांग्रेस के नेतृत्व से जुड़े मुद्दे पर अशोक गहलोत जैसे कद्दावर नेता को सोशल मीडिया के जरिये नसीहत देने की जुर्रत की थी। बहरहाल कांग्रेस में जातीय नेतृत्व की राजनीति से जुड़ा मुद्दा भविष्य में क्या गुल खिलाएगा अभी कुछ कहना मुश्किल है। लेकिन जाट समुदाय का यह मानना है कि पहली बार मुख्यमंत्री बने अशोक गहलोत ने  प्रतिपक्ष के नेता और जाट समुदाय के कद्दावर नेता परसराम मदेरणा का हक छीना था। बाद में मदेरणा जी विधानसभा अध्यक्ष बनाये गये थे। उनके पुत्र महिपाल मदेरणा गहलोत के दूसरे कार्यकाल में मंत्री बने लेकिन ए. एन. एम. हत्याकांड के आरोप में अभी वह जेल में है। खांटी जाट नेता स्व. नाथूराम मिर्घा, कुम्भाराम आर्य तथा रामनिवास मिर्घा की संतति भी कांग्रेस राजनीति में आगे नहीं बढ़ सकी। अब रामेश्वर डूडी प्रतिपक्ष के नेता के रूप में सामने आये है जो जाट समुदाय से है।

शेखावाटी में वर्षों से कांग्रेस से जुड़ी रही जाट नेत्री सुमित्रा सिंह ने भाजपा का पल्ला पकड़ा और श्रीमती वसुंधरा राजे के पहले मुख्यमंत्री काल में विधानसभा अध्यक्ष बनाई गई। राजस्थान में तब राज्यपाल के पद पर श्रीमती प्रतिभा पाटिल आसीन थी जो बाद में राष्ट्रपति निर्वाचित हुई। पिछले चुनाव में सुमित्रा सिंह न केवल पराजित हुई बल्कि अपनी जमानत तक नहीं बचा सकी। भाजपा में तरजीह नहीं मिलने से वह शराबबंदी सशक्त लोकायुक्त की नियुक्ति से जुड़े सामाजिक सरोकारों में सक्रिय हुई है। इसी सिलसिले में उन्होंने झुंझुनू में रैली आयोजित कर शक्ति प्रदर्शन किया है। निर्दलीय विधायक हनुमान बेनीवाल भी उनसे जुड़े है ताकि जाट समुदाय का राजनैतिक नेतृत्व सशक्त हो सके। यह जातीय समीकरण राजस्थान की राजनीति में क्या गुल खिालएगा। यह देखना होगा।

जयपुर से गुलाब बत्रा

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