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हम सब एक हैं! क्यों भाई चाचा हां भतीजा

हम सब एक हैं!  क्यों भाई चाचा हां भतीजा

ऐन चुनाव के मौके पर उत्तर प्रदेश के सत्तारूढ़ दल में जो महाभारत शुरू हुआ, एक सप्ताह के भीतर उसका अंत भी हो गया। इससे समाजवादी पार्टी के शुभचिंतकों ने जहां राहत की सांस ली, विरोधियों को थोड़ी हैरानी भी हुई। कुछ लोगों को ऐसा भी लग रहा है कि यह सतह के ऊपर की शांति है, भीतर उफान ठाठें मार रहा है। जल्दी ही वह ज्वार-भाटे की शक्ल में दिखेगा और फिर बहुत कुछ तबाह कर देगा। लखनऊ के एक राजनीतिक कार्यकर्ता राकेश यादव की टिप्पणी महत्वपूर्ण लगती है- तूफान प्राकृतिक हो या मानव जनित, एक हद व उसका आना ठीक रहता हैं। जब वह सीमाएं तोड़ देता है तो वह स्थिति चिन्ताजनक हो जाती है, कभी-कभी असह्य भी हो जाती है। उस स्थिति की असहजता, गंभीरता और दुष्परिणामों का अन्दाजा समाजवादी कुनबे के बुजुर्ग नायक मुलायम सिंह को तो था ही, अन्य दोनों धु्रवों शिवपाल सिंह यादव और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को भी लग गया। अत: युद्ध विराम हुआ और सरकार व पार्टी ने राहत की सांस ली।

‘किसी भी युद्ध में कुछ न कुछ तो ढहता ही है, नुकसान होता ही है। कुछ के मोहभंग होते हैं। कुछ हितैषियों की पहचान होती है, कुछ स्वार्थी भी बेनकाब होते हैं। इसलिए ऐसे युद्ध भी जरूरी होते हैं। इसलिए ऐसे युद्ध भी जरूरी होते हैं। चाहे वे पारिवारिक हों या राजनीतिक’। ‘कहते हैं प्रो. सोहन राम जो काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में सामाजिक विज्ञान विभाग के आचार्य एवं अध्यक्ष हैं। डा. सोहन कहते हैं कि नयी राजनीतिक या सामाजिक शक्तियां तभी एक्सपोज होती हैं जब स्थितियां असामान्य हों। इसलिए असहज मामलों को सहज ढंग से लेते हुए उनकी काट ढूढ़ी जानी चाहिए। नेता जी मुलायम सिंह यादव अनुभवी हैं, इसलिए उन्होंने पुत्र अखिलेश को समझाया और अखिलेश ने भी यथार्थ को समझा। अत: कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश का राजनीतिक संकट फिलहाल खत्म हो गया है। समाजवादी पार्टी और सरकार ने राहत की सांस ली। लेकिन क्या यह युद्ध विराम की स्थिति है या नये युद्ध के लिए सेनाएं अपनी रणनीति बनाने में जुट गयी हैं। अलीगढ़ के पुराने समाजवादी और सामाजिक कार्यकर्ता बांकेलाल शर्मा कहते हैं: ”न तो यह पुश्तैनी लड़ाई है और नहीं धार्मिक-पौराणिक प्रतीकों की रक्षा का मामला। इसे आप सत्ता संघर्ष का नाम देना चाहें तो दे सकते हैं। अगर इसे सत्ता संघर्ष के तौर पर भी देखेंगे तो आग में घी डालने वालों की पहचान हो जाने पर मामला खत्म हो जायेगा। और यह काम मुश्किल नहीं हैं, पहचान हो रही है। कुछ को तो एहसास भी हो गया है। इसलिए मामला ज्यादा दूर तक नहीं जायेगा। स्वार्थी कभी बलिदान नहीं देते, बलिदान का नाटक करते हैं।’’

शर्मा जी की बात एक हद तक सच भी लगती है। क्योंकि आज सभी पार्टियों में दिखावे के लिए छाती पीटने वाले, मिट्टी का तेल या पेट्रोल लेकर जल-मरने का नाटक करने वाले तमाम कार्यकर्ता मिल जायेंगे। ‘न उन्हें समाजवाद से लेना-देना है, न कांग्रेस से, न ही भाजपा से। न वे सपाई हैं, न बसपाई। इसलिए उनसे कोई बलिदानी होने की अपेक्षा न करे। वे न तो भगत सिंह हैं, न आजाद या बिस्मिल। सभी दलों में ऐसे स्वार्थी तत्व भर गये हैं जो नेता के पीछे-पीछे घूमते और नारे लगाते हैं। इनकी पहचान की जानी चाहिए।’ जौनपुर के पुराने कांग्रेसी और स्वतंत्रता सेनानी रहे सिरहू राम की प्रतिक्रिया इस मामले में महत्वपूर्ण है।


मुलायम फिर पास हुए अग्नि परीक्षा


 

15-10-2016

उत्तर प्रदेश के सत्ताधारी दल और राजनीति में आया तूफान एक बड़ा बवंडर जरूर साबित हुआ लेकिन वह बिना कुछ खास तहस-नहस किए ठंडा पड़ गया। इसलिए जो नजर लगाये थे कि चुनाव से ठीक पहले यूपी का समाजवादी कुनबा बिखर जायेगा और सूबे में दोबारा सत्तारूढ़ होने का अखिलेश यादव का सपना धरा रह जाएगा, उन्हें निराश होना पड़ा। इसी के साथ एक बार फिर यह साबित हो गया कि नेता जी मुलायम सिंह यादव यू ही ‘नेताजी’ नहीं कहलाते। वे अपने विरोधियों से निपटने में तो माहिर हैं ही, पारिवारिक मोर्चे पर भी किसी असहज स्थिति को चुटकी बजाकर काबू में कर लेना उनके लिए कतई मुश्किल नहीं है। इसी के साथ एक बात और फिर सच साबित हुई कि शिवपाल सिंह यादव मुलायम सिंह के हनुमान हैं और इसके लिए उन्हें अलग से किसी ‘परीक्षा’ की जरूरत नहीं है।

‘मुलायम सिंह यादव इटावा के एक किसान परिवार में जन्मे और एक सामान्य से अध्यापक के रूप में उन्होने अपने कैरियर की शुरूआत की’। कालांतर में वे लोहिया जी के सम्पर्क में आये और बाकायदा समाजवादी राजनीति के दर्शन और व्यावहारिक पक्ष को जाना-समझा। वे गरीब किसान के बेटे रहे और धुर ग्रामीण बल्कि जातीय और आर्थिक विषमता के गढ़ चम्बल घाटी के अंचल से आते थे। इसलिए झंझावातों को झेलने के आदती रहे हैं। विषम स्थितियों को सामने देख घबराने की उनकी आदत नहीं है। इसीलिए वे व्यक्तिगत जीवन और राजनीतिक जीवन में भी कभी घबराते नहीं। चाहे जितनी भी विषम परिस्थितियां हों, जितने भी विषम झंझावात हों, वे सहज ढंग से उनसे उबर लेते हैं।’ कहते हैं बुजुर्ग समाजवादी और पुराने लोहियाइस्ट राममूर्ति यादव (जौनपुर)।

फिलहाल राममूर्ति यादव की बातों को अनेक बार चरितार्थ होते देखा भी गया है। खासकर मुलायम सिंह के राजनीतिक जीवन में कई बार ऐसे अवसर आये जब लगा कि इस बार ये जड़ से उखड़ जायेंगे। लेकिन यह उनका कौशल ही है जो हर बार उन्हें पूरी तरह बचा लेता है। 1997 में मुलायम सिंह यादव जनता पार्टी की सरकार में कैबिनेट मंत्री बने। रामनरेश यादव मंत्रि मण्डल में सहकारिता मंत्री के रूप में काम करते हुए मुलायम सिंह की व्यक्तिगत छवि में इतना निखार आया कि ये चौधरी चरण सिंह के अति करीबियों में आ गये। चौधरी साहब इन्हें इतना मानने लगे कि आगे चलकर चौधरी की राजनीतिक विरासत की दावेदारी का सवाल खड़ा हो गया। चरण सिंह के अंतिम समय में जब अजित सिंह मुलायम को प्रतिद्वंदी मानकर राजनीतिक दांव चलाने लगे तब बड़े ही सलीके से नेता जी ने उन्हें जवाब दिया। कुछ लोगों को लगता था कि चूंकि अजित सिंह चरण सिंह के एक मात्र पुत्र हैं और खानदानी विरासत के साथ ही उनकी राजनीतिक विरासत के हकदार हैं, उन्हें तब भारी झटका लगा जब मुलायम सिंह ने अपने धैर्य, लगन और ईमानदार मेहनत के बल पर पूरे प्रदेश में अपना सिक्का जमा लिया और खुद को चरण सिंह का राजनीतिक उत्तराधिकारी साबित किया। दूसरी ओर अजीत सिंह चौधरी साहब के पुत्र होते हुए भी बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान तक फैले पिता के साम्राज्य (राजनीतिक साम्राज्य) को सहेज न सके और आज वे सिर्फ बागपत में ही सिमट गये हैं।

रामजन्म भूमि आंदोलन मुलायम सिंह की अग्निपरीक्षा था। बाबरी मस्जिद की रक्षा में कारसेवकों पर गोली चलवाना बहुत कठोर निर्णय था। नेता जी की सियासत दांव पर लगी थी। लेकिन तब भी अपनी विवेक बुद्धि, राजनीतिक कौशल का इस्तेमाल करते हुए उन्होने निर्णय लिया। सत्ता भले ही चली गयी लेकिन उनके निर्णय के चलते देश के इतिहास में उनकी राजनीतिक सूझ-बूझ का सिक्का जम गया। 1993 में बसपा से गठबंधन की सरकार बनी लेकिन 1995 में गेस्ट हाउस कांड के बाद सरकार गिर गयी। 2003 में एक बार फिर मुलायम सिंह सत्ता में आये और 2007 तक उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में सूबे का नेतृत्व किया। 1993 में बसपा के गठबंधन वाली सरकार दोनों दलों के नेतृत्व में मतभेदों के चलते 1995 में गिर जरूर गयी लेकिन यदि मतभेदों पर काबू पा लिया गया होता तो पिछड़ों-दलितों के सामूहिक नेतृत्व वाली सरकार के नये युग की जो आधार शिला रखी गयी थी उस पर इतिहास के नये साम्राज्य की ऐसी इमारत बनती जिसको ढहाने वाली छेनी का बनना आसान न होता।

लेकिन इतिहास किसी ‘किन्तु-परन्तु’ का मोहताज कहां होता है? ऐसे ही 2009 में नेता जी कल्याण सिंह को साथ लाये। लेकिन बाद में कल्याण सिंह ने साथ छोड़ दिया। वह भी नेता जी का बड़ा दूरदर्शी कदम था। लेकिन कल्याण सिंह को रास नहीं आया। वरना पिछड़े वर्गों को जोड़ कर एक नयी और अपेक्षया ज्यादा मजबूत राजनीतिक शक्ति खड़ी होती जो युगांतरकारी परिवर्तन के लिए जरूरी हेाता है। लेकिन फिर वही बात, इतिहास किन्तु-परन्तु का मोहताज नहीं होता। फिलहाल, समाजवादी पार्टी के भीतर आये बवंडर को तूफान न बनने देकर मुलायम सिंह ने जो कुछ किया उसका तात्कालिक असर भले सीमित दिखाई दे लेकिन ऐतिहासिक असर बहुत महत्वपूर्ण होगा। इसे आज नहीं तो कल महसूस किया जायेगा।


Layout 1

फिलहाल सिरहू राम और बांकेलाल शर्मा की बातें आज के नेताओं को कितनी रास आयेंगी यह अलग बात है लेकिन इस मुद्दे पर समाजवादी पार्टी के उत्तर प्रदेश के नये अध्यक्ष और फिलहाल की लड़ाई के एक ध्रुव शिवपाल सिंह का एलान है- पार्टी का अनुशासन और परम्परा महत्वपूर्ण है। इसकी अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जायेगी। चाहे वह परिवार का ही सदस्य क्यों न हो, नेता जी का सम्मान जो नहीं करेगा, उसके खिलाफ कार्रवाई होगी। सचमुच कार्रवाई की शुरूआत तो घर से ही शुरू हो गयी है। पहली गाज गिरी एम. एल. सी. और रामगोपाल के भांजे अरविन्द पर। उन्हें पार्टी से छह साल के लिए बाहर कर दिया गया। उसके बाद पार्टी के तीन अन्य युवा नेताओं पर भी कार्रवाई हुई। ये तीनों भी एम. एल. सी. हैं और मुख्यमंत्री के करीबी रहे हैं- सुनील साजन, आनंद भदौरिया, और संजय लाठर। इनके अतिरिक्त पार्टी की युवा इकाइयों के चार अन्य नेताओं को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। इन नेताओं पर हुई कार्रवाई पर मुख्यमंत्री ने कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की बल्कि उन्होंने सभी पार्टीजनों से अपील की है कि वे आवेश में आकर इस्तीफा न दें। पार्टी के अनुशासन में रहने की मुख्यमंत्री की सलाह के बाद सारा तूफान अपने आप शांत हो गया। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह शांति बनी रहेगी।

 लखनऊ से सियाराम यादव

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