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जीवन में होगा अब सब कुछ फलैक्सी ही

जीवन में होगा अब सब कुछ फलैक्सी ही

बेटा: पिताजी।

पिता:  हां, बेटा।

बेटा: यह फलैक्सी क्या होता है?

पिता: बेटा, हमारे समय में तो फलैक्स एक कम्पनी का नाम था जिसके जूते बहुत बढिय़ा होते थे। मैंने तो बहुत पहने हैं। पर अब वह कम्पनी बंद हो गई लगती है।

बेटा: पिताजी, मैं फलैक्स जूतों की नहीं फलैक्सी किराये की बात कर रहा हूं।

पिता: अच्छा-अच्छा, तू तो उस किराये की बात कर रहा है जो अभी-अभी शताब्दी व राजधानी एक्सप्रेस के किरायों में लागू हुआ है।

बेटा: हां पिताजी, उसी की।

पिता: बेटा, यह तो सरकार के निणर्य हैं। हम क्या कह सकते हैं? सरकार तो कुछ भी योजना बना सकती है।

बेटा: पर पिताजी, हम तो विश्व के सब से बड़े लोकतन्त्र के नागरिक हैं। हमें सरकार के निर्णयों पर अपना विचार प्रकट करने की पूरी स्वतन्त्रता है। क्या आपको यह निर्णय ठीक लगता है?

पिता: समाचारों के अनुसार तो इस कारण पहले ही दिन कुछ करोड़ की अतिरिक्त आय हो गई।

बेटा: पिताजी, तो यह सरकार है या हमारे पड़ोसी की पंसारी की दुकान जो हर बात में लाभ की ही बात सोचता है?

पिता: बात तो तूने पते की कही है  लेकिन तू कब से इतना समझदार हो गया है?

बेटा: पिताजी, आपने तो मुझे सदा मूर्ख ही समझा। पर आप हंस क्यों रहे हैं?

पिता: बेटा, पंसारी की दुकान पर मुझे एक बात याद आ गई।

बेटा: क्या?

पिता: कहते हैं कि हमारे पंसारी की तरह ही एक व्यक्ति था। उसकी मृत्यु हो गई। उसे यमराज के सामने पेश किया गया। यमराज ने पूछा – बोल तुझे कहां भेजूं -स्वर्ग में या नर्क में? उसने हाथ जोड़ कर विनती की – महाराज, मैंने स्वर्ग-नर्क से क्या लेना है। मुझे तो आप वहां भेज दीजिये जहां मुझे दो पैसे का फायदा हो।

बेटा: पिताजी, वह तो व्यवसायी था। पर सरकार तो मुनाफे का धंधा नहीं कर रही है। उसे तो जनता की सेवा करनी है। जनता की सुख-सुविधाओं की चिन्ता करनी है। पैसा कमाना तो उसका धर्म नहीं है और वह भी जनता के सिर पर।

पिता: पर बेटा, सरकार साथ में यात्रियों की सुख-सुविधायें भी तो बढ़ा रही होगी ना।

बेटा: नहीं पिताजी, कुछ नहीं। बस किराया ही बढ़ा रही है।

पिता: तब तो बेटा, यह गलत होगा। इस का तो अन्य क्षेत्रों पर भी विपरीत असर पड़ेगा।

बेटा: बिलकुल पिताजी। जब सरकार ही यह काम करने लगेगी तो वह अन्य व्यक्तियों या व्यवसायों पर कैसे नियन्त्रण कर सकेगी। लोगों को लूटने वालों पर कैसे शिकंजा कस सकेगी? अपने बचाव में सभी रेलवे का ही हवाला देंगे।

पिता: तेरी बात में तो दम है, वजन है। पर बेटा, अर्थशास्त्र का असूल है कि जब किसी वस्तु की मांग बढ़ जाती है और उसकी आपूर्ति कम होती है तो उस वस्तु के बाजार में दाम बढ़ जाते हैं।

बेटा: और तभी चोर-बाजारी बढ़ जाती है। मुनाफाखोरी का आलम हो जाता है। जमाखोरी को बाजार गर्म हो जाता है।

पिता: तब बेटा, सरकार मुनाफाखोरो, चोरबाजारियों और काले बाजार का धंधा करने वालों पर श्किंजा भी तो कसती है। उन पर जुर्माना करती है, जेल भेजती है।

बेटा: पर वह यह सब कैसे कर पायेगी? यही लोग सरकार पर उंगली उठायेंगे। वह तर्क देंगे कि यदि यह सब सरकार करे तो जनसेवा और दूसरे करें तो जुर्म।

पिता: बेटा, रेलवे मुनाफे पर तो चल नहीं रही। उसने जनसुवधिायें भी देनी होती हैं। फिर यह बढ़ा हुआ किराया भी तो अमीर आदमी ही देंगे जो देने में सक्षम हैं। आम आदमी पर तो इसका कोई असर नहीं है।

बेटा: कल को तो पिताजी आप यह तर्क भी देंगे कि यदि प्याज-सब्जी महंगी हो गई तो लोग इन वस्तुओं का सेवन न करे। दाल महंगी हो गई तो दाल न खायें। शताब्दी-राजधानी एक्सप्रेस के किराये बढ़ गये तो वह उस में सफर न करें। उसका बोझ भी तो आम आदमी पर ही पड़ेगा। उसको तो पहले ही आम ट्रेनों में जगह नहीं मिलती। भेड़-बकरियों की तरह सफर करते हैं। उनकी हालत और भी बदतर हो जायेगी।

पिता: बेटा, सरकार चलाने के लिये, जनता को सुख-सुविधायें देने के लिये सरकार को कई बेलन बेलने पड़ते हैं। कड़े फैसले लेने पड़ते हैं। सख्त कदम उठाने पड़ते हैं।

बेटा: मैं भी तो पिताजी, इसीलिये ये बातें सरकार के ध्यान में लाना चाहता हूं। सरकारी अधिकारी तो कई बार सरकार के सामने दूसरा पक्ष आने ही नहीं देते जिस कारण बुराई या आलोचना होती है सरकार की, अधिकारियों की तो नहीं।

पिता: बात तो तेरी ठीक है। पर अभी सरकार ने कुछ समय के लिये ही यह योजना प्रयोग के रूप में चलाई है।

बेटा: इसलिये मैं कई सच्चाइयां व अनुभव सरकार तक पहुंचाना चाहता हूं।

पिता: बोल तू क्या कहना चाहता है?

बेटा: पिताजी, एक बार मेरा एक दोस्त बारिश में फंस गया। उसे तो घर पहुंचना था। हार कर उसने एक ऑटो लेकर घर पहुंचने की सोची। अव्वल तो कोई ऑटोवाला जाने को तैयार ही न था। और अगर कोई तैयार हो भी जाये तो जहां मीटर से चलने पर उसका बिल 50 रूपये बनता था, वह 300-400 मांगने लगे। हार कर वह 300 रूपये देकर घर पहुंचा।

पिता: यह तो सरासर लूट-खसूट है।

बेटा: यही नहीं, पिताजी। मेरे एक और दोस्त ने बताया कि एक बार उसके पिताजी बीमार पड़ गये। रात काफी हो चुकी थी। सिवाये टैक्सी कर उन्हें अस्पताल पहुंचाने के सिवा हमारे पास कोई रास्ता न था। बड़ी देर हम सड़क पर टैक्सी के आने की प्रतीक्षा करते रहे। अन्त में जब एक आई तो उसने 500 रूपये मांग लिये। दूरी के हिसाब से उसे एक सौ रूपये से अधिक नहीं लेने चाहिये थे। दोस्त ने कहा कि हमारी व्यथा पर तर्स खाओ और दो सौ रूपये लेलो। सुनते ही उसने गाड़ी स्टार्ट की और जाने लगा। मैं समय की नजाकत को समझ गया। मैंने ड्राईवर से विनती की और कहा कि हमें अस्पताल छोड़ दे क्योंकि मेरे पिताजी की स्थिति गंभीर थी। हमने उसे 500 रूपये ही दे दिये।

पिता: बेटा, तेरे दोस्त ने तो वक्त संभाल लिया पर है तो यह बिल्कुल अमानवीय है ना।

बेटा: कुछ भी हो पिताजी, है तो यह यथार्थ ही।

पिता: ऐसे लोगों के विरूद्ध तो सख्त कार्रवाई होनी चाहिये।

बेटा: बात यहीं खत्म नहीं हो जाती। मैं आपको कई और उदाहरण देता हूं।

पिता: बता।

बेटा: आपको याद है इसी वर्ष फरवरी मास में जाट आंदोलन हुआ था हरियाणा में। उस समय दिल्ली से पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल व जम्मू-कश्मीर को कोई रेल या बस व टैक्सी नहीं जा सकती थी। वहां पहुंचने का एक मात्र साधन था तो वह थी हवाई यात्रा। इसी फलैक्सी किराया प्रणाली का उपयोग करते हुये हवाई यात्रा कंपनियों ने यात्रियों की दयनीय दशा के कारण उनका काफी शोषण किया। मुझे मेरे एक मित्र ने बताया कि उसके एक संबंधी की बेटी की शादी निश्चित थी पर वह दिल्ली में फंस कई। उसने 45000 का टिकट खरीदा और तब वह अपने विवाह के लिये समय पर पहुंच सकी।

पिता: सचमुच?

बेटा: पिताजी, शत् प्रतशित सच। पर हवाई सफर में संतोष का एक पहलू यह है कि ये कंपनियां कई बार अपने किराये कम भी रखती हैं, रेल किराये के बराबर। पर रेल की व्यवस्था में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।

पिता: बेटा, हो सकता है बाद में रेलवे भी ऐसी व्यवस्था कर दे।

बेटा: अभी से ऐसी आशा लगा बैठना तो व्यर्थ लगता है। जब होगा तब की तब देखेंगे।

पिता: बेटा, आशा पर ही तो जीवन टिका है।

बेटा: मैं आपको और याद दिला दूं। दिल्ली में उबर व ओला जैसी टैक्सी सुविधा प्रदान करने वाली कंपनियों ने भारी मांग के समय दिन में ड्योढ़ा व दुगना किराया मांगना शुरू कर दिया था। पर सरकार ने कड़ा रूख अपनाया जिस कारण इन कंपनियों ने ऐसा करना बंद कर दिया। यात्रियों को राहत मिली।

पिता: बेटा, सरकार सरकार होती है। वह सब कुछ कर सकती है।

बेटा: पर सरकार जब यह काम स्वयं कर रही है तो वह दूसरों पर कैसे नकेल डाल सकती है?

पिता: नहीं बेटा, तू इतना अधीर मत हो।

बेटा: पिताजी, आप तो फिजूल में सरकार का पक्ष लेते जा रहे हैं। आपके पास कोई तर्क तो है नहीं।

पिता: मुझे तो पूरा विश्वास है कि सरकार कुछ न कुछ अवश्य करेगी।

बेटा: अब मैं समझने लगा हूं कि आप सरकार से क्यों इतने आशावान हैं और क्यों उसका पक्ष ले रहे हैं?

पिता: क्यों?

बेटा: इस लिये कि जब हम कोई गलती करते हैं तो आप हमें कभी नहीं बख्शते। हमें डांटने में कभी नहीं चूकते। बुरा-भला जो आपके मुंह में आता है सब कह डालते हैं। पर जब वही गलत बात या काम आप कर देते हैं तो हमारे बताने पर मुस्करा कर रह जाते हैं।

पिता: अच्छा अब इस चर्चा को छोड़। कोई और बात कर।

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