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आतंकवाद मानवाधिकारों का सबसे बड़ा उल्लंघन

आतंकवाद मानवाधिकारों का सबसे बड़ा उल्लंघन

एक वर्ष पहले मैंने इसी पवित्र मंच से अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के सदस्यों को संबोधित किया था। तब से लेकर आज तक विश्व में बहुत परिवर्तन हुआ है – कुछ अच्छा, कुछ बुरा और कुछ हम सबको बहुत चिंतित करने वाला। पिछले वर्ष के दौरान किए गए कार्यों और उपलब्धियों पर विचार विमर्श करने के लिए इससे बेहतर कोई और मंच नहीं हो सकता। हम सभी को ये याद रखना होगा कि जो काम हमने किए है, उनकी तो समीक्षा होगी ही, लेकिन जो नहीं कर पाए हैं, उनकी भी समीक्षा होगी। इस गरिमामय महासभा में अनेक मुद्दों पर चर्चा हुई है, जैसे – एएमआर के लिए नए टीकों को साझा करना, सस्ती दवाईयों की उपलब्धता को सुनिश्चित करना, प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम को कम करने के लिए सैन्डई ढांचे को लागू करना, मानव संसाधनों का मुक्त एवं सुरक्षित आवागमन सुनिश्चित करना, UN Peace Keeping Forces में सैनिक भेजने वाले देशों के साथ विचार-विमर्श करना। समय के अभाव के कारण मैं सभी मुद्दों को तो नहीं छू सकूंगी, लेकिन कुछ ऐसे मुद्दों का उल्लेख जरूर करना चाहूंगी जो अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। आज हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती है विश्व के कई कोनों में फैली हुई गरीबी को मिटाना, और यह सुनिश्चित करना कि हम उन सभी जरूरतमंद लोगों तक समृद्धि पहुंचा सकें। हमें यह भी सुनिश्चित करना है कि स्त्रियों और पुरूषों के बीच लैंगिक समानता हो और महिलाओं को सुरक्षा मिल सके। हमें विश्व शांति के लिए कार्य करना है क्योकि शांति के बिना समृद्धि नहीं आ सकती।

जलवायु परिवर्तन एक और ऐसा मुद्दा है, जो हमारे सामने एक गंभीर चुनौती बनकर खड़ा है। प्रकृति के पास संपदा तो अपार है लेकिन उतनी, जितनी वो मनुष्य की जरूरत को पूरा कर सके, पर इतनी नहीं कि उसके लालच का पेट भर सके। क्योकि लोभ की कोई सीमा नहीं होती। इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी जी ने एक नया सिद्धांत दिया है Climate Justice यानि जलवायु न्याय। हम प्रकृति के साथ न्याय करें तो वो हमारे और हमारी भावी पीढिय़ों के साथ जरूर न्याय करेगी। लेकिन यदि हम उसका अंधाधुंध दोहन करेंगे तो वो क्रोधित हो जाएगी और अपना रौद्र रूप दिखाएगी। हम देख ही रहे हैं कि दुनिया में कई जगहों पर प्रकृति अप्राकृतिक हो बैठी है – किसी कोने में भयंकर वर्षा, कहीं घनघोर गर्मी, कहीं झंझावात, कहीं सुनामी, कहीं बादलों का फटना।

 ये समय का तकाजा है हम असीमित खपत पर रोक लगाएं और अपनी जीवन-शैली को पर्यावरण के अनुकूल बनाएं। योग भारत का वो प्राचीन ज्ञान है, जो एक टिकाऊ जीवन शैली का प्रतीक है। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के लिए दिए गए अपार समर्थन के लिए मैं आप सबका आभार व्यक्त करना चाहती हूं।

पेरिस समझौते में “Common but Differentiated Responsibilities and Respective Capabilities” के सिद्धांत को स्वीकारा गया है, जिसका अर्थ है कि जिम्मेदारी तो सबकी साझी है, लेकिन देनदारी सबकी अलग-अलग। इसलिए ये बेहद जरूरी है कि विकसित देश अपनी जिम्मेदारियों का निवर्हन करते हुए सभी की भलाई के लिए तकनीक भी दें और धनराशि भी, तभी यह कार्यक्रम सफल होगा। हमने अपने देश में बहुत महत्वाकांक्षी योजना बनाई है, जिसमें हमने वर्ष 2030 तक 40 प्रतिशत ऊर्जा Non Fossil Fuel से बनाने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए हमें एक निश्चित वातावरण की आवश्यकता होगी, क्योंकि बाहर से पूंजी निवेश करने वाले लोग नीतियों की स्थिरता चाहते हैं। ये निश्चितता उन्हें मिले, इस प्रयास में हम लगे हैं। इसके अलावा International Solar Alliance का गठन भी हमारी एक अभिनव पहल है जिससे सौर तकनीक सभी को उपलब्ध हो सके।  मैं इस मंच से यह विश्वास दिलाती हूं कि जलवायु परिवर्तन की दिशा में भारत एक अग्रणी भूमिका निभाएगा। पेरिस समझौते के लिए भारत अपना Instrument of Ratification अक्टूबर को जमा करा देगा। हमने सोच समझकर यह तिथि तय की है क्योंकि यह गांधी जी का जन्म दिवस है जिनका संपूर्ण जीवन प्रकृति के संरक्षण को समर्पित रहा।

अब मैं एक ऐसे विषय पर बोलने जा रही हूं, जिस पर इस सभा में बैठा हर व्यक्ति चिंतित है और चिंतित ही नहीं सोचने पर मजबूर है। इसी महीने इस शहर में हुए 9/11 आतंकी हमले की 15वीं वर्षगांठ थी। पिछले 15 दिनों में इसी शहर में एक और आतंकी हमले में मासूमों को मारने की कोशिश की गई थी। हम इस शहर का दर्द समझते हैं, हम पर भी उरी में इन्हीं आतंकी ताकतों ने हमला किया था। विश्व इस अभिशाप से बहुत समय से जूझ रहा है। लेकिन, आतंकवाद का शिकार हुए मासूमों के खून और आसुओं के बावजूद, इस वर्ष काबुल, ढाका, इस्तांबुल, मोगादिशू, ब्रसेल्स, बैंकॉक, पेरिस, पठानकोट और उरी में हुए आतंकवादी हमले और सीरिया और इराक में रोजमर्रा की बर्बर त्रासदियां हमें ये याद दिलाती हैं कि हम इसे रोकने में सफल नहीं हुए हैं।

सबसे पहले तो हम सबको ये स्वीकारना होगा कि आतंकवाद मानवाधिकारों का सबसे बड़ा उल्लंघन है, क्योंकि वो निर्दोष लोगों को निशाना बनाता है, बेगुनाहों को मारता है, वो किसी व्यक्ति या देश का ही नहीं मानवता का अपराधी है। उसके बाद देखना होगा कि इन आतंकवादियों को पनाह देने वाले कौन-कौन हैं? आतंकवादियों का ना तो कोई अपना बैंक है, ना हथियारों की फैक्ट्रियां, तो कहां से उन्हें धन मिलता है, कौन इन्हें हथियार देता है, कौन इन्हें सहारा देता है, कौन इन्हें संरक्षण देता है? ऐसे ही सवाल इसी मंच से अफगानिस्तान ने भी कुछ दिन पहले उठाए थे।

इतिहास गवाह है कि जिन्होंने अतिवादी विचारधारा के बीज बोए हैं उन्हें ही उसका कड़वा फल मिला है। आज उस आतंकवाद ने एक राक्षस का रूप धारण कर लिया है, जिसके अनगिनत हाथ हैं, अनगिनत पांव और अनगिनत दिमाग और साथ में अति आधुनिक तकनीक। इसलिए अब अपना या पराया, मेरा या दूसरे का, आतंकवादी कहकर हम इस जंग को नहीं जीत पाएंगे। पता नहीं यह दैत्य किस समय किस तरफ का रुख कर ले।

 इसीलिए यदि हमें आतंकवाद को जड़ से उखाडऩा है तो एक ही तरीका है- हम अपने मतभेद भुलाकर आतंकवाद के खिलाफ एकजुट हों, उसका मुकाबला दृढ़ संकल्प से करें और हमारे प्रयासों में तेजी लाएं। हम पुराने समीकरण तोड़ें, अपनी पसंदगियां-नापसंदगियां एक तरफ रखें, मोह त्यागें, अहसानों को भूलें और एक दृढ़ निश्चय के साथ इकट्ठा होकर इस आतंकवाद का सामना करने की रणनीति बनाएं। ये मुश्किल काम नहीं है  केवल इच्छाशक्ति की कमी है। ये काम हो सकता है और ये काम हमें करना है, नहीं करेंगे तो हमारी आने वाली संततियां हमें माफ नहीं करेंगी। हां,  यदि कोई देश इस तरह की रणनीति में शामिल नहीं होना चाहता तो फिर उसे अलग-थलग कर दें। दुनिया में ऐसे देश हैं जो बोते भी हैं तो आतंकवाद, उगाते भी हैं तो आतंकवाद, बेचते हैं तो भी आतंकवाद और निर्यात भी करते हैं तो आतंकवाद। आतंकवादियों को पालना उनका शौक बन गया है। ऐसे शौकीन देशों की पहचान करके उनकी जबावदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए। हमें उन देशों को भी चिन्हित करना चाहिए जहां संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित आतंकवादी सरेआम जलसे कर रहे हैं, प्रदर्शन निकालते हैं, जहर उगलते हैं और उनके ऊपर कोई कार्यवाही नहीं होती। इसके लिए उन आतंकवादियों के साथ वे देश भी दोषी हैं जो उन्हें ऐसा करने देते हैं। ऐसे देशों की विश्व समुदाय में कोई जगह नहीं होनी चाहिए।

21 तारीख को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने इसी मंच से मेरे देश में मानवाधिकार उल्लंघन के निराधार आरोप लगाए थे। मैं केवल यह कहना चाहूंगी कि दूसरों पर मानवाधिकार उल्लंघन का आरोप लगाने वाले जरा अपने घर में झांककर देख लें कि बलूचिस्तान में क्या हो रहा है और वो खुद वहां क्या कर रहे हैं। बलूचियों पर होने वाले अत्याचार यातना की पराकाष्ठा है। दूसरी बात, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने कही कि बातचीत के लिए जो शर्त भारत लगा रहा है, वो हमें मंजूर नहीं है। कौन सी शर्तें? क्या हमने कोई शर्त रखकर न्यौता दिया था शपथ ग्रहण समारोह में आने का? जब मैं इस्लामाबाद गई थी, Heart of Asia Conference के लिए, तो क्या हमने कोई शर्त रखकर Comprehensive Dialogue शुरू किया गया था? जब प्रधानमंत्री मोदी काबुल से चलकर लाहौर पहुंचे थे तो क्या किसी शर्त के साथ गए थे? किस शर्त की बात हो रही है? अध्यक्ष जी, हमने शर्तों के आधार पर नहीं बल्कि मित्रता के आधार पर सभी आपसी विवादों को सुलझाने की पहल की और दो साल तक मित्रता का वो पैमाना खड़ा किया जो आज से पहले कभी नहीं हुआ। ईद की मुबारकबाद, क्रिकेट की शुभकामनाएं, स्वास्थ्य की कुशलक्षेम – क्या ये सब शर्तों के साथ होता था?

लेकिन इस मित्रता के बदले में हमें मिला क्या – पठानकोट, बहादुर अली और उरी। बहादुर अली तो जिंदा आतंकवादी हमारे कब्जे में है, जो पाकिस्तान से भारत में किए जा रहे सीमा पार आतंकवाद का जीता जागता सबूत है। लेकिन पाकिस्तान को जब इन घटनाओं के बारे में बताया जाता है, तो वो तुरंत इंकार करके पल्ला झाड़ लेता है। वह शायद सोचता है कि ज्यादा से ज्यादा आतंकी घटनाओं से भारत की भूमि हथियाने के उसके इरादे पूरे हो जाएंगे। मैं भी पूरी दृढ़ता और विश्वास के साथ कहना चाहूंगी कि पाकिस्तान यह सपना देखना छोड़ दे, जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और रहेगा।

मैंने प्रारंभ में ही कहा था कि जो कार्य हमने किए हैं, उन्हें तो हम गिनें ही, मगर जो नहीं कर पाए, उनको गिनना भी जरूरी है। इस सभा के लिए ऐसे दो काम गिनवाना चाहती हूं। CCIT (Comprehensive Convention on International Terrorism) सन् 1996 से भारत द्वारा ये प्रस्ताव दिया हुआ है। बीस साल गुजर गए मगर आज 2016 में भी हम CCIT को निष्कर्ष तक नहीं पहुंचा सके। इसी कारण हम कोई ऐसा अंतर्राष्ट्रीय मानक नहीं बना सके, जिसके अंतर्गत आतंकवादियों को सजा दी जा सके या उनका प्रत्यर्पण हो सके। इसीलिए आप सबसे मेरा अनुरोध है कि ये सभा पूरे दृढ़ निश्चय के साथ जल्द CCIT को पारित करे।  जिस प्रकार आतंकवाद से लडऩे के लिए हमें एक समकालीन नीति चाहिए उसी प्रकार हमें एक ऐसी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद भी चाहिए जो आज के वैश्विक परिदृश्य के अनुकूल हो। अधिकांश देशों का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र 1945 की वैश्विक परिस्थिति के अनुरूप सिर्फ कुछ ही देशों के हितों की रक्षा न करे। चाहे वह किसी संस्था की बात हो या मुद्दों की, हमें आज की वास्तविकता  और चुनौतियों के अनुसार काम करना होगा। आज सुरक्षा परिषद की स्थाई और अस्थाई दोनों सीटों में विस्तार की आवश्यकता है जिससे सुरक्षा परिषद समकालीन बन सके। मेरा अनुरोध है कि इस आम सभा की इच्छानुसार Inter Governmental Negotiations (IGN) प्रक्रिया के तहत Text Based Negotiation जल्दी प्रारंभ किए जाएं। यदि ये दोनों चिरप्रतीक्षित कार्य आपके इस कार्यकाल में हो जाते है तो मैं कह सकती हूं कि संयुक्त राष्ट्र सभा का 71वां अधिवेशन बहुत ही सार्थक होगा। 21वीं सदी पर शुरूआत से ही अशांति और हिंसा का साया रहा है। परंतु मिल-जुलकर प्रयास करने से हम इसे मानव सभ्यता के इतिहास में एक स्वर्णिम युग में बदल सकते हैं। लेकिन भविष्य में क्या होगा यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम आज क्या करते हैं।

(यह लेख विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के संयुक्त राष्ट्र संघ में दिए गए भाषण पर आधारित है)

सुषमा स्वराज

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