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चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरीडोर पर निशाना साधें

चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरीडोर पर निशाना साधें

पाकिस्तान कश्मीर घाटी में बुरहान वानी के बहाने आग भड़काने का खेल खेल रहा है। भारत ने जवाब में पीओके और बलूचिस्तान का मामला उठाकर उसका जवाब दिया। अगर चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरीडोर (सीपीईसी) पीओके से गुजरता है तो क्या हम इसे नियति का खेल मानकर बैठ जाएंगे? अगर कोई सरकार इसे चुपचाप स्वीकार कर लेती है तो वह संसद के प्रस्ताव के साथ धोखा करेगी, जो वस्तुत: ”राष्ट्रीय प्रस्ताव’’ ही है। ऐसी सरकार पाकिस्तान और चीन के संदर्भ में दो मोर्चे खोलने की भी दोषी होगी।

सीपीईसी के जरिए पीओके और बलूचिस्तान दोनों चीन से जुड़ जाएंगे। इसलिए भारतीय प्रधानमंत्री के लिए जरूरी है कि पीओके और बलूचिस्तान के संबंध में हमारे क्षेत्रीय अधिकारों की बात उठाएं। यही नहीं, जब ऐसी कोई गैर-कानूनी परियोजना हमारे क्षेत्र में मानव जीवन और पर्यावरण से खिलवाड़ करे तो ऐसी स्थिति में हमारी चुप्पी और निष्क्रियता आपराधिक किस्म की होगी। हमें यह एकदम साफ हो जाना चाहिए कि सीपीईसी अनिवार्य तौर पर सैन्य मकसदों के साथ रणनीतिक परियोजना है।

रहील शरीफ की सीपीईसी को लेकर चीन के कई दौरों से यह स्पष्ट हो जाता है। दोनों देशों को इससे होने वाले आर्थिक फायदे तो अलग से हैं। वैसे, इस परियोजना ने पाकिस्तान के गरीब लोगों में उम्मीद की एक किरण जगाई है। वहां के लोग और फौज दोनों ही इसमें आपनी आॢथक बदहाली और भारत से असुरक्षा का हल देख रहे हैं। सीपीईसी को लेकर पाकिस्तान के हर सार्वजनिक मंच पर काफी उत्साह दिखाया जाता है। इस परियोजना की राह में कोई रोड़ा पाकिस्तान में भारी निराशा का माहौल पैदा करेगा।

संयुक्त राष्ट्र में जब मौलाना मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित किया जाने वाला था तो चीन के अड़ंगे से जाहिर है कि वह कश्मीर में आग भड़काए रखने के लिए पाकिस्तानी जेहादियों को बर्दाश्त करने को तैयार है, ताकि सीपीईसी पर भारत को राजनैतिक और कूटनीतिक तौर पर दूर रखा जा सके। पीओके के जरिए बलूचिस्तान में ग्वादर तक फारस की खाड़ी तक पहुंच का ऐसा रणनीतिक महत्व है कि चीन हर असंतुलन को झेलने को तैयार है। इसी रणनीति के साथ वह जम्मू-कश्मीर में भारत के खिलाफ जेहादी छद्म युद्ध को शह देने में पाकिस्तान का गुप्त सहयोगी है। इसलिए घाटी में पाकिस्तान की मौजूदा सक्रियता और उड़ी में मौलाना मसूद अजहर के जैश-ए-मुहम्मद के सैन्य ठिकाने पर हमला चीन की रजामंदी के बिना हो सकता।

भारत के मामले में सीपीईसी का रणनीतिक दुष्परिणाम यह है कि जम्मू-कश्मीर में जेहादी युद्ध में पाकिस्तान और चीन दोनों साझीदार हैं। पाकिस्तान में विभिन्न जेहादी संगठन पाकिस्तानी फौजी-खुफिया तंत्र के हिस्से के अलावा कुछ और नहीं हैं। उन्हें जेहादियों और फिदायीन की भर्ती और ट्रेनिंग के लिए अलग-अलग इलाके दिए गए हैं। पाक फौजी हुक्मरानों के कहने पर जेहादी संगठन अमेरिकियों और चीनियों के काम आने से परहेज नहीं करते।

चीन और इस्लाम के बीच चयन के मामले में मसूद अजहर और हाफिज सईद हर इस्लामी आग्रह छोडऩे तैयार हो जाते हैं। चीन के शिंगजियांग में सरकारी अधिकारियों के रमजान रखने पर पाबंदी लगाई जाती है और औरतों को बुर्का पहनने से रोका जाता है तो उनका मजहबी तेवर ठंडा पड़ा जाता है। उनका मजहबी एजेंडा बस भारतीय उपमहाद्वीप में फिदायीन पैदा करने तक ही कायम रहता है। यही मजहबी तेवर भारत में कश्मीरी अलगाववादियों का भी है। उनका इस्लाम भारत के मामले में ही जगता है, चीन के मामले में नहीं। इसलिए कभी-कभार किसी चीनी अखबार या विचार समूह के द्वारा पाकिस्तान में जेहादी गुटों की निंदा से भुलावे में नहीं रहना चाहिए। चीन हमेशा ही ऐसा खेल खेलता रहता है।

विडंबना देखिए कि अफगानिस्तान में शीत युद्ध के दौर में कम्युनिस्ट सत्ताओं बर्बाद करने के लिए विकसित किए गए जेहादी तत्व अब चीन को सीपीईसी जैसी गैर-कानूनी परियोजना को कायम करने के लिए भारत के खिलाफ काम आ रहे हैं।

इसलिए जरूरी निष्कर्ष यही है कि सीपीईसी चीन-पाकिस्तान साझेदारी का सबसे संवेदनशील हिस्सा है और पाकिस्तान के लिए यह अपने देश के आर्थिक-भौतिक अस्तित्व का सवाल है। पाकिस्तान अभी तक अपने इलाके को अमेरिकियों को सौंपकर जिंदा रहा है, अब वह चीनियों के हवाले करके नया जीवन पाना चाहता है।

पाकिस्तान को सबक सीखाने के लिए भारत अगर सैन्य विकल्प पर विचार करता है तो उसे नफा-नुकसान का आकलन कर लेना चाहिए। अमेरिकी मैरीन के एबटाबाद में ओसामा बिन लादेन ऑपरेशन या बलूचिस्तान में मुल्ला मंसूर पर ड्रोन से हमले से पाकिस्तान को सबक नहीं मिला। अमेरिकी या नाटो फौज अफगानिस्तान को लगातार निशाने पर लिए हुए हैं। इसलिए पाकिस्तान के खिलाफ यह विकल्प जोखिम भरा है। आखिर जेहादी और फिदायीन के सहारे अपने अस्तित्व की रक्षा करने वाले देश के खिलाफ भला क्या विकल्प बचता है।

पाकिस्तानी विदेश सेवा में रह चुके प्रतिष्ठित पत्रकार खालिद अहमद की राय है, ”पाकिस्तान बिखर रहा है क्योंकि यह लड़का राज्य है और उसका अस्तित्व हमेशा बना नहीं रह सकता। वह युद्ध के आदर्श से बंधा है जिसके विचारकों को जायज जंग में शहीद होना ही पसंद है।’’

सीपीईसी ही पाकिस्तान की इकलौती उम्मीद है, उसके अस्तित्व का भविष्य उसी के आसरे टिका है। इसलिए भारत के विकल्पों में सबसे ऊपर सीपीईसी होनी चाहिए। सीपीईसी हकीकत बन जाएगी तो पाकिस्तान चीन के इलाके का हिस्सा बन जाएगा और उसकी रणनीतिक जिम्मेदारियां भी चीन पर आ जाएंगी। यह पीओके के मामले में आंख मूद लेने के भारत सरकारों के रवैए के बिना नहीं हो सका है। इस मामले में मौजूदा सरकार अपवाद है।

हम भारतीयों ने जम्मू-कश्मीर के मौजूदा इलाके को ही नियति मान लिया है। हम दिमागी रूप से गिलगित-बाल्टीस्तान को भुला चुके हैं। इसी वजह से करगिल का युद्ध हुआ। इसी वजह से सीपीईसी के प्रति हमारा विरोध अब तक गिड़गिड़ाहट जैसा रहा है। दूसरी तरफ पाकिस्तान कभी जम्मू-कश्मीर पर हमारा नियंत्रण स्वीकार नहीं करता।

सबसे जरूरी, कारगर विकल्प भारत के लिए यही है कि सेना को आदेश दिया जाए कि पीओके हमारा इलाका है और नियंत्रण रेखा तो दुर्घटनावश हो गई है। जैसा कि उड़ी में हमला करके पाकिस्तान ने नियंत्रण रेखा के स मान का नियम तोड़ दिया है। निचले कमांडरों को अधिकार दिया जाना चाहिए कि एलओसी के उस पार के इलाकों को धीरे-धीरे अपने में शामिल करते जाएं। इस विशेष फोकस के लिए इस पर जोर देना जरूरी है कि गिलगित-बाल्टीस्तान हमारा इलाका है, जहां से सीपीईसी गुजरती है।

जेहादियों पर निर्भरता से कमजोर और गैर-पेशेवर हो चुकी पाकिस्तानी फौज भारत की इस चुनौती को झेल नहीं सकती। मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं कि पीओके की बहुसंख्यक आबादी भारत के ऐसे किसी पहल का स्वागत करेगी।

आरएसएन सिंह

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