ब्रेकिंग न्यूज़ 

नापाक हरकतों से कैसे निबटे भारत!

नापाक हरकतों से कैसे निबटे भारत!

अपने पड़ोसी के चयन में भारत का कोई वश नहीं था। रेडक्लिफ ने नक्शा खींचा और भारत के पश्चिमी तथा पूरबी सीमा पर पाकिस्तान आ गया। अपने जन्म से ही पाकिस्तान किसी बिगडै़ल बच्चों की तरह जबरन सब कुछ हासिल करना चाहता है, चाहे वह गलत हो या सही। पहले उसने कश्मीर को तोडऩे के लिए पख्तून कबाइलियों को अपने फौज के साथ भेज दिया। उन्हें भारतीय सेना ने भगा दिया, जो वहां कश्मीर के महाराजा के अनुरोध पर पहुंची थी। उसके पहले महाराजा भारत में विलय पर दस्तखत कर चुके थे।

सेना उन्हें 1948 में ही पूरी तरह भगा चुकी होती, मगर जवाहरलाल नेहरू संयुक्त राष्ट्र में पहुंच गए और फौरन संघर्ष विराम को राजी हो गए…बाकी तो इतिहास है। हमें अपने पड़ोसी से लगातार फौजी और आतंकी दुस्साहस से निबटना पड़ा और उसके प्रधानमंत्री का बकवास सुननी पड़ी।

पाकिस्तान अब ऐसे बच्चो की तरह बनता जा रहा है, जिसे जितना ही पुचकारो-समझाओ, वह उतना ही बिगड़ता जाता है। किसी ऐसे को कैसे समझदारी सिखाई जा सकती है जिसकी बागडोर जनरलों के हाथ में हो और जब भी ये जनरल कोई झटका सहते हैं तो बदले के जुनून में पागल हो जाते हैं।

15-10-2016शायद 1948 में कश्मीर पर कब्जा न कर पाने की नाकामी एक के बाद एक जनरलों में जुनून पैदा करती रही है और वे उसे हासिल करने के लिए और ज्यादा जोखिम उठाने को तैयार हो उठते हैं। ऐसा ही कुछ तब भी हुआ, जब वे बांग्लादेश युद्ध में हार गए। हार से सबक सीखने के बदले वे और आक्रामक हो उठे। उनमें बदले की आग शायद और धधकने लगी, जब हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस के भाषण से बलूच आंदोलनकारी उत्साहित हो उठे।

उड़ी का हमला उसी की प्रतिक्रिया थी। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाषण ‘सेल्फ-गोल’ से भरा हुआ था, जैसा कि हर घबराए आदमी के साथ होता है।

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में उन्हें माकूल जवाब दिया। उन्होंने पाकिस्तान को यह कहकर आईना दिखाया कि ”जिनके घर शीशे के होते हैं, वे दूसरों पर पत्थर नहीं मारते।’’ उन्होंने बलूचिस्तान में चल रहे फौजी दमन की बात उठाई और विश्व बिरादरी से अपील की कि ”ऐसे देश को अलग-थलग करने और दंडित करने की दरकार है जो आतंकवाद को पालता-पोषता हो, दुनिया भर में आतंकवादनिर्यात करता हो।’’ जाहिर है, यह भारत-पाकिस्तान के बीच सबसे बुरा दौर है। नवाज शरीफ का भाषण भी पड़ोसी देश के नेताओं का अब तक का सबसे भड़काऊ भाषण था। उन्होंने मारे गए आतंकवादी बुरहान वानी की सराहना की, जो अपने हाथ में एके-47 लेकर दुनिया भर में खिलाफत की स्थापना की बातें करता था। नवाज ने आतंकवाद की कोई चर्चा नहीं की। वे पठानकोट हवाई ठिकाने पर आतंकी हमले के दोषियों को सजा दिलाने के अपने वादे को भी भुला बैठे। नवाज ने कश्मीर के मुद्दे के समाधान के बिना भारत-पाकिस्तान रिश्तों को सामान्य बनाना असंभव करार दिया। नवाज यहां तक कह गए कि भारत की पारंपरिक सैन्य ताकत में वरीयता की वजह से पाकिस्तान अपने परमाणु अस्त्रों में इजाफा करेगा, जिससे दुनिया भर में चिंताएं बढ़ गई हैं।

संयुक्त राष्ट्र के ज्यादातर सदस्य देशों के लिए नवाज की बातों को पचा पाना मुश्किल होगा। आखिर नरेंद्र मोदी काफी राजनैतिक पहल जो कर चुके हैं। वे दिसंबर में उनके लाहौर की यात्रा भी कर चुके हैं, जो उनके उग्र समर्थकों को अच्छा नहीं लगा था। सुषमा स्वराज भी शरीफ के देश में जाकर काफी सौहार्द जाहिर कर चुकी हैं। लेकिन विडंबना यह है कि पाकिस्तान की विदेश नीति उसके जनरल तय करते हैं। कथित तौर पर नवाज शरीफ के भाषण का मजमून तैयार करने में मदद दे चुके फौजी हुक्मरान रहील शरीफ भारत के साथ दुश्मनी को अनिवार्य रणनीतिक सूत्र मानते हैं। फौज की नजर में इससे उनका देश फौज के साथ खड़ा रहता है और सरकारी तंत्र से जेहादी तत्वों का एका बनाए रखता है। यह नजरिया कितना ही संकुचित क्यों न हो, पर यह गहरे पैठा हुआ है। इसलिए भारतीय नीति-नियंताओं को हमेशा इसका ख्याल रखना होगा कि यह नजरिया बदलेगा नहीं।

तो, फिर भारत के लिए रास्ता क्या बचता है? एक तो यह है कि ”हाल के दौर में जारी जुबानी तल्खी के आवेश में नहीं आना चाहिए। इससे पाकिस्तान के कट्टर तत्वों को फायदा होता है। उन्हें भारत के हिंदू राष्ट्रवादियों के खिलाफ आग उगलकर अपने समर्थकों को एकजुट रखने में मदद मिलती है। गरिमामय चुप्पी भारत के हित में अधिक लाभकारी है। इससे यह एहसास मजबूत होता है कि अपने वैश्विक एजेंडे के साथ एक उभरती ताकत में अपने पड़ोसी की हरकतों का जवाब देने के लिए किसी की मदद की दरकार नहीं है।’’

देश करारा जवाब चाहता है लेकिन सरकार का कहना है कि वह कड़ा कदम उठाएगी मगर उचित समय और जगह का ध्यान रखकर। हमने पाया है कि पाकिस्तान जितना ही मूर्खता करता है, वह उसमें फंसता जाता है। उड़ी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान को कूटनीतिक रूप से अलग-थलग करने की वाजिब नीति अख्तियार की है। यहां तक कि इस्लामिक देश भी उड़ी हमले की निंदा करने में पीछे नहीं हैं। ये इस्लामिक  देश पहले कश्मीर को लेकर काफी मुखर रहे हैं और पिछले दो महीने से वहां मानवाधिकारों के उल्लंघन की पाकिस्तानी नीति को मानते रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र के सभी पांचों स्थायी सदस्य देशों ने उड़ी हमले की निंदा की है। भारत सरकार इस्लामिक देशों के संगठन (ओआइसी) का ज्यादा से ज्यादा समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रही है। पाकिस्तान को दुनिया में अलग-थलग करने की यह मुख्य रणनीति का हिस्सा है। अभी तक ओआइसी के सदस्य देशों में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर और बहरीन ने निंदा में बयान जारी किया है। संयुक्त अरब अमीरात, और बहरीन ने आतंकवाद से लडऩे में भारत की किसी भी पहल का समर्थन करने का भी बयान जारी किया है। भारत पाकिस्तान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई, कूटनीतिक, राजनैतिक और आर्थिक विकल्पों पर विचार कर रहा है। ऐसे में ये बयान उसके लिए मददगार हो सकते हैं।

इसके अलावा ओआइसी के सदस्य, भारत के तीन पड़ोसी देशों-अफगानिस्तान, बांग्लादेश और मालदीव ने भी हमले की निंदा की है। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फोन कर उड़ी हमले की निंदा की और आतंकवाद से लडऩे में भारत को मदद का वादा किया।


उरी के शहीदों के लिए खुला व्यापारियों का खजाना


15-10-2016उरी  में शहीद हुए 18 सैनिको के लिए व्यापारियों ने भी अपने खजाने खोलने शुरू कर दिये हैं। एक ओर जहां बिहार और पश्चिम बंगाल सरकारों द्वारा उरी आतंकी हमले में शहीद हुए जवानों के परिजनों को कम मुआवजा देने के मामले सामने आये हैं, वहीं दूसरी ओर उनकी मदद के लिए गुजरात के सूरत के हीरा कारोबारी महेश सवानी ने अपना खजाना खोल दिया है। उन्होंने कहा है की वे शहीद सैनिको के  बच्चो की न सिर्फ पढ़ाई का खर्च उठाएंगे बल्कि उनके बेटियों की शादियां भी करवाएंगे। महेश सवानी बताते हैं, ‘मैंने टीवी पर एक शहीद की बच्ची को रोते  हुए देखा। वह कह रही थी की उसके पिता ने उसे अच्छी पढ़ाई करने के लिए कहा था। मैंने तभी निश्चय कर लिया की इन बच्चों की पढ़ाई का खर्च मैं उठाऊंगा।’ गौरतलब है की महेश सवानी पहले से ही समाज सेवा के कार्यों से जुड़े हैं और ऐसी बच्चियों की शादियों का पूरा खर्च उठाते है जिनके पिता नहीं होते।

                सूरत से महेन्द्र राउत


सभी सार्क देशों श्रीलंका, नेपाल, भूटान ने हमले की निंदा की है। सरकार ओआइसी देशों पर इसलिए ज्यादा ध्यान दे रही है, ताकि पाकिस्तान को आतंकवाद को शह देने वाला देश घोषित करके उसे अलग-थलग किया जा सके। संयुक्त अरब अमीरात, कतर और बहरीन इन तीनों देशों का दौरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले दो साल में कर चुके हैं। बहरीन में तो भारतीय प्रवासियों की संख्या भी काफी ज्यादा है। उसने भारत के आतंकवाद से लडऩे की हर पहल का समर्थन करने का बयान जारी किया है। श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरिसेना ने प्रधानमंत्री मोदी को फोन करके उड़ी हमले की निंदा की। अमेरिका के विदेश मंत्री जॉन केरी की पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से मुलाकात को भी भारतीय रुख की विजय मानी जा रही है। अमेरिकी विदेश विभाग की प्रवक्ता जॉन किर्बी ने कहा, ”केरी ने पाकिस्तान को आतंकवादियों की सुरक्षित पनाहगाह बनने देने को बंद करने की बात की।’’

सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी देशों- अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन के अलावा जर्मनी, जापान, कनाडा, दक्षिण कोरिया और मॉरीशस जैसे देश हमले की निंदा कर चुके हैं। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि चीन ने पाकिस्तान से कहा है कि कश्मीर भारत और पाकिस्तान का द्विपक्षीय मसला है।


गफलतों का सिलसिला


15-10-2016उड़ी में अगर ये व्यवस्थाएं होतीं और लापरवाही नहीं बरती जातीं तो 18 जवानों को शहीद नहीं होना पड़ता।

  • चार आतंकियों ने दो जगह से बाड़ काटी। आखिर संतरियों की नजर से यह बच कैसे गया?
  • बाड़ काटने पर अलार्म बजने जैसी कोई व्यवस्था क्यों नहीं की गई थी?
  • पठानकोट में भीतरी आदमी की मिलीभगत के सुराग मिले थे तो ऐसे भेदियों से सतर्क रहने की व्यवस्था क्यों नहीं की गई।
  • शिविर के बाहरी इलाकों में रोशनी करने के लिए कोई सर्चलाइट की व्यवस्था नहीं थी। शिविर के भीतर भी कोई सर्चलाइट की व्यवस्था नहीं थी।
  • भारी हथियारों से लैश आतंकियों को 150 मीटर अंदर तक घुस आने पर नहीं पहचाना जा सका।
  • तंबुओं में सो रहे जवानों की सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं था।

ये खामियां और ऐसी अनेक खामियां जाहिर हैं मगर जवाबदेही और नैतिक जवाबदेही नहीं तय की गई तो इन्हें जानकर भी कुछ नहीं होगा।


उड़ी में सैनिक शिविर पर आतंकी हमले में 18 जवानों के शहीद होने के बाद से ही भारत पाकिस्तान को माकूल जवाब देने के तरीके पर विचार-विमर्श कर रहा है। अभी तक रणनीतिक विशेषज्ञों और सरकार की ओर से उभरने वाली राय पर एक नजर डालना जरूरी है।

15-10-2016

एक स्तंभकार की राय है, ”हड़बड़ी में कोई कदम नहीं उठाना चाहिए। उससे कोई लाभ नहीं होगा और हम वही कर रहे होंगे जो पाकिस्तान के आतंकवादी गुट या खुफिया फौजी हुक्मरान जो हमसे चाहते हैं। दूसरे, हमें अपनी सुविधा के हिसाब से समय और स्थान का चुनाव करना चाहिए, न कि पाकिस्तान की मंशा के मुताबिक। तीसरे, संयुक्त राष्ट्र आमसभा की बैठक का लाभ लेकर पाकिस्तान को अलग-थलग करने की कूटनीतिक पहल की जाए।’’

सवाल यह भी है कि आखिर यह रणनीति कितनी कारगर है। आखिर पाकिस्तान की ओर से आतंक और उग्रवाद को शह देने के छद्म युद्ध के 26 साल बाद भी कूटनीतिक रूप से उसे अलग-थलग करने की रणनीति क्यों कारगर नहीं हुई? तो क्या सिर्फ सैन्य कार्रवाई ही माकूल होगी, ताकि वह अपनी हरकतों से बाज आए? इसके लिए हमें पाकिस्तान की किसी हद तक जाने की ताकत और रणनीतिक महत्व को जांचना होगा। यह एहसास तो अब गहरा हो चला है कि पाकिस्तान का इलाका दुनिया के लिए सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक इलाका है। यह पांच सभ्यताओं – भारतीय, चीनी, मध्य एशिया, फारसी और अरबी का संगम-स्थल है। इनमें हर सभ्यता के रणनीतिक हित पाकिस्तान से जुड़े हुए हैं। इसके अलावा दुनिया की बड़ी ताकतों की भी इसमें भारी दिलचस्पी है।


पहले अपना घर दुरुस्त करें


15-10-2016

बहावलपुर स्थित आतंकी गुट जैश-ए-मुहम्मद के आतंकियों ने साल भर के भीतर ही हमारे दो महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों पठानकोट वायु सेना अड्डा और थल सेना के उड़ी अड्डे पर दो हमले किए। महज चार आतंकियों ने उड़ी में तंबुओं में सो रहे 18 जवानों को मौत की नींद सुला दिया। दोनों ही मामलों में आतंकी हमारे सैन्य ठिकानों से बखूबी परिचित थे, जो उन्हें किसी भीतरी आदमी से ही पता चल सकता था। पठानकोट मामले में तो कथित तौर इस भीतरी की पहचान भी कर ली गई थी।

इससे हमने क्या सीखा?  आज देश गुस्से में है। प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री, गृह मंत्री, सेना के अभियान निदेशक सभी कह रहे हैं कि जवाब दिया जाएगा पर उचित समय और स्थान पर। उधर, पाकिस्तान कश्मीर मसले का अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाने की हर कोशिश में जुटा है। अगर भारत फौरन सैन्य जवाब देता है तो पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पहुंच जाएगा। नवज शरीफ संयुक्त राष्ट्र में पहले ही कश्मीर में भारतीय उत्पीडऩ का रोना रो आए हैं। लेकिन यह भी सही है कि उनके बोलने के पहले अमेरिका के दो सांसद पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित करने का प्रस्ताव सिनेट में दे चुके हैं। पाकिस्तान को अलग-थलग करने की भारत की कोशिशों के तहत सऊदी अरब, यूएई, कतर और बहरीन जैसे इस्लामी देश उड़ी हमले की निंदा कर चुके हैं। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज संयुक्त राष्ट्र में माकूल जवाब दे चुकी हैं।

 दरअसल पाकिस्तान लगातार हार और अपने पूर्वी हिस्से को गंवाकर अधिक जुनूनी हो गया है। नरेंद्र मोदी के बलुचिस्तान का मामला उठाने के बाद उड़ी हमले जैसी किसी घटना की आशंका थी। हमारे सुरक्षा बल आंतरिक स्थितियों से ही जूझ रहे हैं। पाकिस्तान चाहता है कि कश्मीर में हालात और बिगड़ें। ऐसे में भारत के पास कूटनीतिक उपाय ही बचते हैं।

हालांकि व्यवस्था की खामियों से जवानों को ऐसे ही नुक्सान झेलना पड़ेगा तो उनका मनोबल टूट जाएगा। रक्षा मंत्री ने माना है कि चूक हुई है। इसलिए हमारी व्यवस्था को पहले चुस्त-दुरुस्त करना होगा और जवानों में आत्मविश्वास भरना होगा।


हमारी किसी भी कार्रवाई में अफगानिस्तान का समर्थन बेहद जरूरी है। ईरान की बेरुखी से पाकिस्तान को वह रणनीतिक गहराई हासिल नहीं हो पाती। शायद इसमें सबसे ज्यादा दिलचस्पी अमेरिका की होगी लेकिन वह भी असहाय-सा है। अफगानिस्तान में उसके हित पाकिस्तान की मदद से ही सधेंगे। उसकी 15 साल की कोशिशों से अफगानिस्तान में स्थितियां कुछ उसके काबू में हैं।

इसी तरह रूसी दिलचस्पी को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 1971 के हालात पर गौर करेंगे तो पता चलेगा कि इंदिरा गांधी ने रूस से संधि करके और आक्रामक कुटनीति के जरिए स्थितियां भारत के हक में की थीं। उसी से युद्ध में विजय का आधार तैयार हुआ था।

हमारी जवाबी कार्रवाई में हर पहलू पर विस्तार से विचार किया जाना चाहिए। कूटनीति का खेल इसमें अहम है।

पाकिस्तान एक निहायत ही गैर-जिम्मेदार और बिगड़ैल देश है। इसे हम दशकों से नजरअंदाज करते आए हैं। अब हर देश आतंक के निर्यात, उसके वित्तीय पोषण, मादक द्रव्यों की आवाजाही, सैन्य और परमाणु ताकत वगैरह को लेकर चिंतित है इसलिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय की दिलचस्पी भी बनी रहेगी।

देश के आम लोग तो फौरन सैन्य जवाब चाहते हैं लेकिन उन्हें युद्ध के नतीजों के प्रति पर्याप्त आगाह नहीं किया गया है। लोगों को अंदाजा नहीं है कि परमाणु अस्त्रों के प्रयोग तक मामला गया तो उसके आर्थिक, सामाजिक, शारीरिक नतीजे क्या होंगे।

इस वजह से कूटनीतिक और सैन्य ताकत का मिला-जुला जवाब ही किसी भी बिगड़ैल देश से निबटने के लिए एकमात्र उपाय होगा।

विजय दत्त

как взломать Whatsappcтоматология

Leave a Reply

Your email address will not be published.