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पाकिस्तान: युद्ध नहीं अभी!

पाकिस्तान: युद्ध नहीं अभी!

पाकिस्तान से युद्ध की ललकार दिन-ब-दिन तेज होती जा रही है। कई विशेषज्ञों और टीवी पर बैठकर बतकही करने वालों की मानी जाए तो बस सेना को कूच करने का आदेश देने भर की देरी है और ना जाने मोदी सरकार ऐसा क्यों नहीं कर रही? फिर सोशल मीडिया पर अपनी-अपनी पार्टी की राय के अनुरूप तरह-तरह के सन्देश चल रहे हैं जो युद्ध को एक टी- 20 मैच की तरह खेलना चाहते हैं। बस ताबड-तोड़ चौके और छक्कों की बरसात और सारी समस्याओं का अंत। सोशल मीडिया और टीवी के स्वनाम धन्य विशेषज्ञों ने युद्ध को तो गुड्डे-गुडिय़ा का खेल जैसा बना दिया है। इन सबसे पूंछा जाए कि क्या आज हम पकिस्तान से जंग नहीं लड़ रहे? यूं भी तो युद्ध चल ही रहा है तो फिर कौन से युद्ध की जरूरत है।

आज जरुरत मौजूदा जंग की शक्ल बदलने की है। आज चल रहे युद्ध की सीमाएं, हथियार, भीषणता और सघनता पाकिस्तान के हाथ में दिखाई देती है, क्या इसकी नकेल भारत अपने हाथ में ले सकता है? यही आज तय करने की बात है। असल सवाल है कि ये कैसे होगा? पकिस्तान अपने वजूद के बाद से ही कहीं-न-कहीं भारत को तंग करता आया है। 1948 में कश्मीर, 1965 में सीधा युद्ध, 1971 में बांग्लादेश, 80 के दशक में पंजाब में खालिस्तान की समस्या, 1999 में कारगिल और अब जम्मू-कश्मीर में फैलाया आतंकवाद। इसलिए ये आकलन सही है कि भारत की समस्या कश्मीर नहीं बल्कि पाकिस्तान ही है। इस समस्या का स्थायी हल हमें खोजना ही होगा। क्या अभी के अभी पकिस्तान पर चढ़ई इसका हल है? मैं समझता हूं कि नहीं। एटमी हथियारों के मसले को अगर अलग भी रख दिया जाए तो आज सीधी लड़ाई से हमें ज्यादा कुछ हासिल नहीं होगा।

इसके दो ही रास्ते हैं – पहला तो पकिस्तान के असली हुक्मरान यानि उनकी सेना को अहसास दिलाना कि आज वो जो छद्म युद्ध लड़ रहे हैं उसकी कीमत बहुत भारी होगी। हमारे देश के नेता एक बड़ी गलती करते रहे हैं। वो ये कि उन्होंने हमेशा पकिस्तान की तथाकथित चुनी हुई सरकारों से दोस्ती गांठने की कोशिश की है और हमेशा उन्हें निराशा ही हाथ लगी है। यथार्थ की मांग है कि ये भाईचारे का राग, ट्रैक 2 का तमाशा, लोगों के बीच का संपर्क और अमन की आशा जैसे लोकलुभावन नारों से निजात पाई जाए। ये मान लिया जाए कि भारत-पाक संबंधों की कुंजी पकिस्तान की सेना के पास है। अगर पाकिस्तान की सेना ही दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा गुंडा है तो फिर क्यों हम शरीफों के चक्कर में पड़ कर अपना वक्त जाया कर रहे हैं? पकिस्तान की सेना से सीधा संपर्क और हो सके तो खरा-खरा संवाद ये भारत को करना चाहिए। अन्यथा हम लगातार भूसे में से गेहूं छानने की जुगत में ही लगे रहेंगे।

और दूसरा उपाय है-एक और 1971, यानि पाकिस्तान के वर्तमान स्वरुप को चुनौती देना। आज की जरुरत है इसके लिए पुख्ता रणनीति बनाना और उस पर अमल करना। ये संभव है। मगर ये कोई महीने दो महीने या फिर बरस दो बरस का खेल नहीं है। भारत में इस समय 1971 की तरह एक शक्तिशाली और दृढ फैसले लेने वाला नेता है और हमारा पड़ोसी अपने अंदरूनी हालात – बलूचिस्तान और सिंध में विद्रोह जैसी स्थिति झेल रहा है। हमारी आर्थिक स्थिति ठीक ठाक है और पकिस्तान आज दुनिया भर के मानस में आतंकवाद के ‘आदर्श विश्वविद्यालय’ के रूप में स्थापित हो चुका है। प्रधानमंत्री मोदी के लिए ये ‘मत चूके चौहान’ जैसी स्थिति है। क्या ये सरकार ये बीड़ा उठाने का हौसला रखती है?

भारत को ये करना ही चाहिए क्योंकि जब तक आज चल रहा युद्ध हमारी धरती से पकिस्तान की धरती पर नहीं जाएगा तब तक उसकी नीयत बदलेगी नहीं। वैसे जब पकिस्तान के असल हुक्मरानों यानि सेना को लगेगा कि उसके लिए फिर 1971 जैसे हालात बन सकते हैं तो फिर वह दुम दबाकर अपनी मियांद में जा सकते है। हमें आज आक्रमण करने की नहीं बल्कि पकिस्तान के हालात पर आक्रामक रणनीति बनाने की जरुरत है। जब प्राचीन तक्षशिला ‘आतंकवाद’ की ‘आई वी लीग यूनिवर्सिटी’ में तब्दील हो गयी है तो फिर आज एक नए चाणक्य की आवश्यकता है। जो फिर से एक नयी समर नीति बनाये। वह समर सीमा पर फौज भेजने से नहीं बल्कि पकिस्तान की सीमाओं को नए सिरे से परिभाषित करने का समर होगा।

उमेश उपाध्याय

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