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मोदी की अग्निपरीक्षा

मोदी की अग्निपरीक्षा

उड़ी के हमले से देश के अहं को चोट पहुंची है इसलिए राष्ट्रीय भावना भी कुछ अधिक आवेग में दिख रही है। सोशल मीडिया पर तो हमारे युवा और दूसरे वर्गों में गजब की एकजुटता दिखती है। सभी निगाहें ‘हर हर मोदी’ की ओर लगी हैं। बेशक, देश ने नरेंद्र मोदी को भरपूर जनादेश मुहैया कराया था, ताकि वे स्वतंत्र होकर कड़े फैसले कर सकें। इतिहास गवाह है कि पंडित नेहरू के प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही देश में कई गलत फैसले होते रहे हैं। हम सभी साठ के दशक में चीन युद्ध के दौरान नेहरू की गलतियों से बाखबर हैं। वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते अजहर मसूद की रिहाई भी एक बड़ी भूल थी। मोदी डॉ. मनमोहन सिंह की आलोचना कई कमजोर फैसलों के लिए करते रहे हैं और आडवाणी तो उन्हें ‘कमजोर प्रधानमंत्री’ ही बताते रहे हैं।

अब गेंद नरेंद्र मोदी के पाले में है। दुनिया देख रही है कि मोदी क्या कदम उठाते हैं? कुछेक भारत विरोधी छद्म सेकुलर नेताओं और तथाकथित छद्म बुद्धिजीवियों के अलावा पूरा भारत एकजुट है और विपक्ष ने भी कुल मिलाकर सकारात्मक भूमिका निभाई है। अब वक्त आ गया है कि भारत ‘बोले’ नहीं, कुछ ‘करे’। अभी तक भारत पाकिस्तान के साथ अपनी रणनीतिक कूटनीति से कुछ हासिल नहीं कर पाया है। भारत के मुकाबले कमजोर देश होने के बावजूद पाकिस्तान अपने पड़ोस के साथ कूटनीति में सफल रहा है, लेकिन वह ज्यादा दिन तक नहीं रह सकता। अब भारत को हर हालात से निपटने की तैयारी करनी होगी और हमरी सेना को अत्याधुनिक हथियारों से लैस होकर तैयार रहना होगा। चीन से युद्ध के समय हमारे जवान दुश्मन के मुकाबले कमतर हथियारों से लैस थे। सबसे बढ़कर तो हमारी सेना को एक मजबूत राजनैतिक नेतृत्व की दरकार है, ताकि वह आगे बढ़ सके।

प्रधनमंत्री नरेंद्र मोदी कोझीकोड में अपने भाषण के लिए सराहना के पात्र हैं। उन्होंने लगभग साफ कर दिया कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री, उनकी सरकार और फौज कश्मीर के नाम पर अपने देश के आम आदमी से धोखा कर रही है। पाकिस्तान के लोग हमसे प्यार करते हैं मगर उन्हें दिग्भ्रमित कर दिया गया है। गौरतलब है कि  अगर ज्लद ही पाकिस्तान अपने भीतर के फैल रहे कैंसर का इलाज नहीं तलाशा तो उस देश का बचना मुश्किल है। उसका भविष्य अंधकारमय है। इसे भुला नहीं दिया जाना चाहिए कि पाकिस्तान की धरती का प्रतिभावान बेटे सलमान तासीर की हत्या 2011 में इसलिए कर दी गई थी क्योंकि वे ईशनिंदा कानून में सुधार की वकालत कर रहे थे।

उड़ी हमले में पाकिस्तान की शिरकत के स्पष्ट सबूतों के उभर आने के बाद भारत का ‘सेकुलर ब्रिगेड’ को शायद यह समझ नहीं आ रहा है कि वह क्या कहे। वे विरोधाभासों की मूर्ति जैसे लगने लगे हैं। वे एक राष्ट्रीय सुरक्षा नीति बनाने की मांग कर रहे हैं और ऐसी तस्वीर पेश करने की कोशिश कर रहे हैं कि 2014 में मोदी के नेतृत्व में भाजपा सरकार आने के बाद भारत में आतंकवादी घटनाएं कई गुना बढ़ गई हैं। मानो वे कह रहे हों कि पाकिस्तान ने अपनी शरारतें पिछली दोस्ताना सरकार यानी कांगे्रस के दौर में छोड़ दी थीं। जब तक हम राष्ट्रीय सुरक्षा के मसलों पर यह पूर्वाग्रही नजरिया नहीं छोड़ेंगे, देश में को सुरक्षा नीति तैयार नहीं हो पाएगी। पूरी दुनिया जानती है कि भारत की सुरक्षा का मामला पाकिस्तान से जुड़ा है, जो आतंकवाद का केंद्र है।

आतंकवादियों से कोई अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति पार नहीं पा सकती, जब तक वे पाकिस्तान की धरती से पैदा होते रहेंगे और वहां आतंकी सरगनाओं को वहां की लोकतांत्रिक सरकार से सुरक्षा और सम्मान हासिल होता रहेगा। ये सरगना फौज और माफिया की सरपरस्ती में वहां फल-फूल रहे हैं। पाकिस्तान ने कुछ खास आतंकी गुटों के खिलाफ कभी कार्रवाई नहीं की क्योंकि उनकी खुफिया एजेंसियां उन्हें भारत के खिलाफ अपना राजनैतिक औजार मानती हैं। पाकिस्तान का अफगानिस्तान के आतंकी नेटवर्क से संबंध है। वह सीमावर्ती इलाकों में स्थानीय कट्टर गुटों के जरिए यह संपर्क साधता है। वह उनके लिए मोबाइल शिविर चलाता है।

फिर भी कुछ लोग सरकार को नाकामियों के लिए कोसते हैं। लेकिन सरकार तथ्यों के अनुसार काम कर रही है, वह दूसरों की तरह वोट पाने की खातिर नाटक नहीं कर रही है। कश्मीर मुद्दे के अंतरराष्ट्रीयकरण के पाकिस्तान के तरीके को मात देने के लिए संयुक्त राष्ट्र में कोई तरकीब निकालने की दरकार है जिस मोर्चे पर भारत नाकाम हो रहा है। इन दिनों सैन्य खुफिया की नाकामियां भी खुलकर सामने आ रही हैं। मोदी सरकार को इस मामले में समीक्षा करनी चाहिए और नारेबाजी के बदले सीमा पर सुरक्षा इंतजामात बेहतर करने की कोशिश करनी चाहिए। हमें मूर्खें की तरह खाली हगा नहीं मचाना चाहिए।

यह जिक्र करना भी जरूरी है कि पाकिस्तान के खिलाफ फौजी कार्रवाई या सिंधु नदी जल संधि के साथ छेड़छाड़ करना कारगर हल नहीं है। एक तो, पाकिस्तान एटमी ताकत वाला देश है और उसके जनरल किसी भी हद तक जा सकते हैं। दूसरे, सिंधु नदी जल संधि को समाप्त करने में काफी समय लगेगा, जिससे कोई मकसद नहीं सधेगा। तो उपाय क्या है?

उपाय है चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरीडोर पर निशाना साधा जाए, जो पीओके और बलूचिस्तान के जरिए चीन को जोड़ता है। इस साल स्वतंत्रता दिवस पर प्रधामंत्री के भाषण के मद्देनजर यह जरूरी है कि पीओके और बलूचिस्तान में अपने क्षेत्रीय अधिकार पर दावा किया जाए क्योंकि पाकिस्तान और चीन ने हमारे क्षेत्र में गैर-कानूनी रणनीतिक संधि कायम की है।

यह कहना भी जरूरी है कि ताकतवर देश इस इलाके की संपदा को अस्थिर करने के लिए देशों के बीच मतभेद कायम करते हैं। चीन इससे बखूबी परिचित है। पश्चिमी देश मोर्चे पर आने के बदले पाकिस्तान और दूसरे छोटे देशों का इस्तेमाल करते हैं। ये आतंकवाद, सीमा विवाद और कश्मीर मसले के जरिए अंजाम दिया जाता है। पाकिस्तान में सरकार वैसे भी नाम मात्र के लिए है, फौज ही देश चलाती है। फौज के लिए सीपीईसी अहम परियोजना है। उसी से उसे अस्तित्व बचाए रखने की उम्मीद है। इसलिए भारत के लिए माकूल विकल्प है कि सीपीईसी पर निशाना साधे। तब मोदी को अपने ठोस फैसले के लिए जाना जाएगा। यह देश के व्यापक हित में भी होगा और 2019 के चुनावों में भी मददगार साबित होगा।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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