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सब्र का फल मीठा होता है

सब्र का फल मीठा होता है

भगवान ने जब मनुष्य की सृष्टि की तब उसके अन्दर ऐसी शक्तिया प्रदान की, जिसके कारण वह समस्त चीजों को अनुभव कर सकता है, वह है उसके पास रहने वाले उसके पांच इन्द्रीय। इन इन्द्रियों की सहायता से वह अनेक सुख और दुख से वाकिफ होते है। मनुष्य का इन्द्रिय और उसका मन इन सभी के मिलन उदयम से मनुष्य खुशी महसूस कर सकता है। असल में मनुष्य के द्वारा करने वाले कार्य ही उसका सुख और दुख का निर्णय करता है। हमारा कार्य प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हमारे जीवन में ना केवल प्रभाव डालता है बल्कि हमारा जीवन ही उसके ऊपर निर्भर करता है। हमारा सतकार्य और सत चिन्ता हमें खुशी प्रदान करती है, ठीक वैसे ही हमारा कुकर्म और कुचिन्ता हमें दुर्दिन का सामना कराता है। इस प्रक्रिया में कभी-कभी शीघ्र फल मिलता है, कभी-कभी देर से फल मिलता है। लेकिन यह प्रक्रिया चिरन्तन और सत्य है और कोई भी व्यक्ति उससे बच नहीं पाते है। सत कार्य से अधिक गुरूत्व पूर्ण है सत चिन्ता। आधुनिक युग में हर व्यक्ति जल्दी फल प्राप्ति के लिए इच्छा रखता है। सब शीघ्र सब कुछ उत्तम होने की चाहत रखने वाले सहज रास्ता अपनाने लगते है। उसका फायदा उठाकर कुछ अर्थ पिपासु व्यक्ति गलत रास्ता बताकर अर्थ उपार्जन करने लगते है। लोगों के अन्दर धैर्य धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। हमें यह कभी-कभी भ्रम हो जाता है कि हमारा कर्म का फल हमें नहीं मिलता है। हमें धैर्य हरा ना होकर अपना एक निष्ठ सतकर्म करना चाहिए।

हमारे कुकर्म छोटा ही क्यों ना हो, हमें खुद को उसका फल भुगतना पड़ता है। यहां तक हमारा गलत सोच हमें दुर्दिन का सामना कराता है। हमेशा अपने मन को गलत सोच अथवा कम समय में अनेक लाभ करने के लालच से निवृत रखना चाहिए। गलत सोच से निवृत होने का सरल रास्ता खुद को कोई भी कार्य में जुटाके रखना। कार्य कोई भी हो उसमें मन लगा रहने से उसमे कुचिन्ता स्थान नहीं पाती है। ईश्वर के  स्मरण के द्वारा भी हमारा चिन्तन संस्कार युक्त हो जाता है। जरूरी है हमारे मन को हमेशा निर्मल रखने की, हम सतकार्य नहीं कर पाए, या किसी का उपकार भी नहीं कर पाएं, लेकिन गलत सोच से मन को कुलसित ना करें। हम से जाने-अनजाने भी किसी का उपकार हो तो उसका फल भी हमें मिलता है। हमसे उपकार पाने वाले व्यक्ति के मन में जो संतोष का भाव जाग्रत होता है और वह हमारे जीवन को परिवर्तित कर सकता है। हम सतचिन्ता में किसी का भी भला हो, यह भावना रखें। उसका असर भी हमारे जीवन पर आता है। इसलिए हिन्दू धर्म में हर पूजा के पश्चात यह सभी कामना करते है ‘सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया’। ज्यादातर हमारा मन विस्तृत होता है, हम सत चिन्ता रखने वाले व्यक्ति कभी-कभी विचलित हो जाते है। हमारे सतकार्य करने के बाद भी हमें दुख का सामना करना पड़ता है, लेकिन हमें दृढ़ निश्चय होना चाहिए कि हमारा कर्म एक ना एक दिन अनुभव कराएगा, दुनिया में हमारा सर ऊपर कराएंगा जो हमारे साथ घट रही है उसकी शायद जरूरत थी। बुद्धिमान व्यक्ति सतकार्य करने के साथ-साथ अपने ऊपर और समय के ऊपर भरोसा रखते है। सर्वमूल ज्ञानी व्यक्ति हमेशा परमात्मा के ऊपर और उनके स्नेह के उपर भरोसा रखते है। दृढ़मना व्यक्ति अपने कार्य में निश्चल रहता है, कोई भी तूफान आये उसे आसानी से पराजित नहीं कर पाता है यह दुनिया परिवर्तनशील है, यहां कोई भी चीज क्षण में बदली जा सकती है। धैयपूर्वक परिस्थतियों का सामना करने से धीरे-धीरे सब कुछ सुंदर बन जाता है। कोयला को भी यह पता नहीं होता कि समय अतिक्रमण के बाद वह हीरे में रूपांतरित हो सकता है। इसलिए सब्र के साथ सतकर्म और सतचिन्ता में रहने से जीवन एक दिन सुखमय हो जायेगा क्योंकि सब्र का फल मीठा होता है।

उपाली अपराजिता रथ

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