ब्रेकिंग न्यूज़ 

आज भी प्रासंगिक है अभिनवगुप्त

आज भी प्रासंगिक है अभिनवगुप्त

प्रश्न उठता है कि हजार वर्ष बीत जाने के बाद अचानक अभिनवगुप्त का राष्ट्रीय स्तर पर स्मरण करने का उद्देश्य क्या है। महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य हानें के अतिरिक्त अभिनवगुप्त और उनके शैव दर्शन की आज और क्या प्रासंगिकता है?

इतिहास किसी राष्ट्र या देश की स्मृति होती है। विस्मृत राष्ट्र की अपने मूल, युगों से सञ्चित अपने ज्ञान-भंडार और अपनी निहित प्रतिभाओं की पहचान प्रतिकूल काल की परतों के नीचे दबी होती है। अभिनवगुप्त की ही भाषा में विभिन्न केंचुलियों (कंचुकाओं) के नीचे छिपी होती हैं। राष्ट्र का अतीत इन परतों में धुंधला और विकृत-सा दिखाई देता है। अभिनवगुप्त ऐसे प्रतिभावान दार्शनिक और चिन्तक थे जिन्होंने अनेक दार्शनिक मान्यताओं और साधना-पद्धतियों का समन्वय करते हुए एक समग्र दर्शन प्रस्तुत किया, एक ऐसा दर्शन जिसने समाज को हजारों वर्षों से चली आ रही  अतिरंचनाओं से मुक्त होने का मार्ग प्रशस्त किया जिनसे समाज तब प्रभावित था और आज भी किसी-न-किसी रूप से प्रभावित है। प्राचीन काल में वर्ण-व्यवस्था को भले ही समाज को सुचारू ढंग से संचालित करने के लिए विकसित किया गया हो, लेकिन दिशाहीन अतिवाद के कारण ही इससे ऊंच-नीच जैसी धारणा भी विकसित हुई। अभिनवगुप्त ने शिवमार्ग पर चलने के लिए ब्राह्मण और शूद्र को समान स्तर पर रखकर आह्वान किया। साधना के लिए ऊंच-नीच के बीच अंतर को समाप्त किया।

इन्द्रियों के सुख का निग्रह करके भौतिक जगत से मुख मोडऩे की धारणाओं ने ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग ही सामान्य जन के लिए अवरूद्ध कर दिया था। मान्यता बन गई थी कि ईश्वर साधना केवल विरक्ति से ही संभव है। लेकिन अभिनवगुप्त ने संन्यासी और गृहस्थ के बीच अंतर ही समाप्त कर दिया। वे स्वयं जीवनभर संन्यासियों की तरह अविवाहित रहे लेकिन अपने भक्तों के लिए घर-गृहस्थी से भागकर साधना करने की बाध्यता नहीं रखी। अभिनवगुप्त जिन आचार्यों से सहमत नही थे, उनसे खुलकर अपनी असहमति व्यक्त करते   थे, लेकिन वे महान आचार्यों की परंपरा को एकदम नकारने में विश्वास नहीं करते थे। अपने ग्रंथों में ही उन्होंने ऐसे बीसियों आचार्यों का उल्लेख किया है। महान ग्रंथों को त्याज्य न मानकर अभिनवगुप्त ने उनकी अपनी प्रतिभा के बल पर नयी व्याख्याएं कीं। कालिदास की भांति वे मानते थे कि कोई बात इसलिए सही या गलत नहीं होती कि वह प्राचीन है और नक कोई बात इसलिए त्याज्य होती है कि वह नयी है। प्राचीन शास्त्रों की उनकी परिभाषाएं नयी परंपराएं बन गयीं। अभिनवगुप्त के युग में जैसी समस्याए्र और चुनौतियां समाज के सामने थीं, वैसी चुनौतियां बौद्धिक और भौतिक स्तर पर आज भी हमारे सामने हैं। इसलिए आश्चर्य नहीं कि अभिनवगुप्त का दार्शनिक चिन्तन जैसा प्रासंगिक दसवीं शताब्दी के लिए था, वैसा ही प्रासंगिक इक्कीसवीं शताब्दी के लिए भी है।

जम्मू-कश्मीर के बारे में अभिनवगुप्त की प्रासंगिकता इस अर्थ में भी है कि आज जम्मू-कश्मीर के बारे में बहस और चिन्तन का विमर्श बदलने की आवश्यकता है। प्राचीन शारदाखण्ड भारत का एक ऐसा सांस्कृतिक केंद्र रहा है जिसका स्पन्दन देश के सुदूर प्रांत भी अनुभव करते रहे हैं। इस सांस्कृतिक, बौद्धिक और दार्शनिक प्रयोगशाला के निर्माण में देश के हर क्षेत्र के मनीषियों और विद्वानों का योगदान रहा है, चाहे वे दक्षिण के केरल और कर्नाटक के हों या पूर्व में असम और बंगाल के। या फिर गंगा-यमुना की घाटियो  से आये हो। इसी प्रकार देश का शायद ही कोई क्षेत्र ऐसा होगा जहां शारदाखण्ड की प्रतिमा प्रतिबिम्बित न हुई हो। जब अभिनवगुप्त प्रत्यभिज्ञा पर बल देते हैं तो वे जीव के अंतर में विद्यमान शिव की पहचान की बात करते हैं। इसीलिए वे इसे ईश्वरप्रत्यभिज्ञा कहते हैं लेकिन आज हमारे सामने, जन-जन के मन मे बसे विराट राष्ट्र की प्रत्यभिज्ञा की बहुत बड़ी चुनौती है।

                साभार: अभिनवगुप्त और शैवदर्शन का पुनरोदय

जवाहरलाल कौल

как ВКонтакте читать чужие сообщениякак определить позиции сайта в поисковиках

Leave a Reply

Your email address will not be published.