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भारत वैभव के लिए दीनदयाल जी के 7 आदर्श एकरसता, कर्मठता, समानता, संपन्नता, ज्ञान, सुख और शान्ति

भारत वैभव के लिए दीनदयाल जी के 7 आदर्श  एकरसता, कर्मठता, समानता, संपन्नता, ज्ञान, सुख और शान्ति

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित ‘पंडित दीनदयाल उपाध्याय: सम्पूर्ण वांङमय’ का लोकार्पण किया और इस अवसर पर उन्होंने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के सिद्धांतों, विचारों एवं जीवन के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करते हुए लोगों से उनके द्वारा दिखाए गए रास्ते पर चलने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि ”विचार अपने आप में एक शक्ति होता है और उस विचार यात्रा का सम्पुट आज हमें प्रसाद के रूप में मिला है, मैं आप सबका इस प्रसाद के लिए ह्रदय से बहुत आभारी हूं।’’ सभी देशवासियों को विजयादशमी की अग्रिम बधाई देते हुए उन्होंने कहा कि यह विजयादशमी देश के लिए बहुत ही ख़ास है, विजयदशमी के लिए सभी देश वासियों को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

प्रधानमंत्री ने कहा कि एक सार्वजनिक व्यक्ति के जीवन को, उनके विचारों एवं उनकी उपलब्धि को कलमबद्ध करना काफी दुष्कर नहीं होता क्योंकि चीजें उपलब्ध होती हैं लेकिन एक ऐसे व्यक्ति, जिसका जीवन तो सार्वजनिक हो लेकिन वह पहचान न बनाने की भूमिका में जीते हुए देश और समाज के कल्याण में पूर्णतया अपना सारा जीवन खपा दे, उनकी जीवनी, उनके विचारों और उनके दृष्टिकोण को जनता तक पहुंचाने के लिए वांड्मय निर्माण का यह प्रयास एक भागीरथ प्रयास है, मैं इसके लिए प्रभात जी, महेश जी और उनकी टीम को बहुत-बहुत बधाई देना चाहता हूं। उन्होंने कहा कि ये 15 ग्रंथ पंडित जी की जीवन यात्रा, विचार यात्रा और संकल्प यात्रा की त्रिवेणी है और आज का यह पल त्रिवेणी के चरणामृत लेने का पर्व है।

उन्होंने कहा कि दीनदयाल जी सादगी की प्रतिमूर्ति थे, इतने कम समय में, अल्प राजनीतिक जीवन में एक राजनीतिक दल, एक विचार, एक राजनीतिक व्यवस्था और विपक्ष से विकल्प तक की यात्रा को कोई पार कर ले, यह छोटी सिद्धि नहीं। उन्होंने कहा कि विपक्ष से विकल्प तक की यह यात्रा संभव इसलिए बनी है कि पंडित जी ने जिस विचार बीज से फाउंडेशन बनाया था, जो नींव डाली थी, आज उसी का परिणाम है कि हम विपक्ष से विकल्प तक की यात्रा विश्व के सामने प्रस्तुत कर पाए हैं।

श्री मोदी ने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने संगठन आधारित राजनीति दल का एक दर्शन देश के सामने प्रस्तुत किया। जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी तक की यात्रा संगठन आधारित राजनीति की अलग पहचान है और इसका श्रेय पंडित दीनदयाल जी को जाता है। उन्होंने कहा कि श्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी कहते थे कि अगर मेरे पास दो दीन दयाल हो तो मैं हिन्दुस्तान की राजनीति का चरित्र बदल सकता हूं।

23-10-2016

प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि 60 के दशक में ‘नेहरू के बाद क्या नहीं बल्कि नेहरू के बाद कौन’ का विचार चलता था, पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक एक ही राजनीतिक दल की व्यवस्था थी, कोई विकल्प नहीं था। उन्होंने कहा कि 62 से 67 का कालखंड पंडित जी को समझने के लिए बहुत बड़ा मूल्य रखता है। उन्होंने कहा कि डॉ. राम मनोहर लोहिया ने भी कहा था कि यह दीनदयाल जी के विशाल दृष्टिकोण का ही परिणाम था कि विभिन्न विचारधारा वाले दल साथ आए और राष्ट्र को एक वैकल्पिक राजनीतिक व्यवस्था दी। उन्होंने कहा कि पंडित जी की एक और विशेषता थी, उन्होंने कार्यकत्र्ता के निर्माण पर बल दिया, राजनीतिक कार्यकतार्ओं की एक नई श्रेणी तैयार की जिसका कोई राजनीतिक गोत्र न हो। उन्होंने कहा कि पंडित जी ने एक स्वतंत्र चिंतन वाला, राष्ट्रभक्ति से प्रेरित, समाज को समर्पित कार्यकतार्ओं का समूह, इससे बना हुआ संगठन और इस संगठन से राजनीतिक जीवन में पदार्पण, ऐसे कार्यकतार्ओं की फौज खड़ी की और इसलिए उन्होंने संगठन को वैचारिक अधिष्ठान देने के लिए, कार्यकतार्ओं के निर्माण में, संगठन के विस्तार में अपना पूरा जीवन खपा दिया।

श्री मोदी ने कहा कि एक ऐसा राजनीतिक दल जिसका कार्यकर्ता संगठनकेंद्री है और एक ऐसा संगठन जो राष्ट्रकेंद्री है, ऐसी व्यवस्था पंडित जी ने देश को दी है। आज हम जहां भी काम कर रहे हैं, उसका तुलनात्मक अध्ययन कोई भी कर ले, हम तो चाहते हैं कि विश्लेषक वर्ग द्वारा हर राजनीतिक पार्टी के शासन काल का मूल्यांकन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि पंडित दीनदयाल जी ने अपने पसीने से, यूं कहें कि अपने खून से जिस पार्टी को सींचा, जिस विचार को अपनाया, वह तपस्या आज भी कसौटी पर खरी उतरने के लिए सामथ्र्यवान है, यह विश्वास के साथ हम कह सकते हैं।

प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि पंडित जी का कहना था कि ‘आन, विज्ञान और संस्कृति, सभी क्षेत्रों में अपने जीवन के विकास के लिए जो भी आवश्यक होगा, वह हम स्वीकार करेंगें। हम नवीनता के विरोधी नहीं और न प्राचीनता के नाम पर रूढिय़ां और मृत परम्पराओं के हम अंध‐उपासक हैं।’ उन्होंने कहा कि यही हमारे चिंतन की मूल सोच है।

उन्होंने कहा कि हम राष्ट्र और समाज की आवश्यकतानुसार अपने आप को ढालने वाले लोग हैं, तभी तो विपक्ष से विकल्प तक की यात्रा में हम हिन्दुस्तान के 125 करोड़ देशवासियों का विश्वास जीत पाए। उन्होंने कहा कि ‘वेद से विवेकानंद तक’, ‘सुदर्शन चक्रधारी मोहन से चरखाधारी मोहन दास’ तक – उन सारे विचारों को पंडित दीनदयाल जी ने आधुनिक परिवेश में सरलता से प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि भारत की जड़ों से जुड़ी हुई अर्थनीति, राजनीति और समाज नीति ही भारत के भाग्य को बदल सकती है।

उन्होंने जोर देते हुए कहा कि दुनिया का कोई राष्ट्र अपनी जड़ों को काटकर विकास नहीं कर पाया है।श्री मोदी ने कहा कि पंडित दीनदयाल जी हमेशा इस बात पर बल देते थे कि हमें अपने आप को सामथ्र्यवान बनाना होगा, वे कहते थे कि सेना को अत्यंत सामथ्र्यवान होना चाहिए और तब जाकर राष्ट्र सामथ्र्यवान बनता है। उनका मानना था कि व्यक्ति से राष्ट्र तक सामथ्र्यवान होना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज पूरा विश्व इंटरडिपेंडेंट है, ऐसे समय पर भारत के मूलभूत चिंतन के आधार पर देश को सामथ्र्यवान बनाना समय की मांग है और इसके लिए समस्त देशवासियों को अविरल एकजुट होकर प्रयत्नशील रहना चाहिए।

प्रधानमंत्री ने कहा कि ‘गरीब’ पंडित दीनदयाल उपाध्या जी की चिंतन के केंद्र बिंदु में थे। उन्होंने कहा कि पंडित जी का मानना था कि राष्ट्र की अर्थव्यवस्था की रचना ऊपर से नीचे की ओर नहीं बल्कि नीचे से ऊपर की ओर होना चाहिए, उनका मानना था कि सरकार की सारी योजनाओं के केंद्र बिंदु में गरीब और गरीब-कल्याण होना चाहिए, तभी हम राष्ट्र को विकास पथ पर गतिशील कर सकते हैं, नीचे वाले ऊपर आयेंगे तभी ऊपर वाले और ऊपर जायेंगें। उन्होंने कहा कि इसलिए हमें विकास यात्रा के सारे प्रवाह उस दिशा में ले जाने हैं जहां पर हम गरीब को सशक्त करें, उसका सशक्तिकरण करें और जहां गरीब ही गरीबी के खिलाफ जंग में फौजी बन जाएं। उन्होंने कहा कि हम सभी मिलकर गरीबी से मुक्त भारत के निर्माण की दिशा में काम करें।

उन्होंने कहा कि पंडित जी के सपने को चरितार्थ करने के लिए हम उनके शताब्दी वर्ष को गरीब-कल्याण वर्ष के रूप में मनाना तय किया है, इसके कारण सरकार के सभी विभाग यह भूल नहीं सकते कि उसके सभी निर्णयों, सभी विचारों और सभी कार्यक्रमों में गरीब-कल्याण की सोच अवश्य होनी चाहिए और इसी सोच को गरीब-कल्याण की दिशा में प्रेरित करने के अवसर के रूप में हम पंडित जी की जन्मशती वर्ष को गरीब-कल्याण वर्ष के रूप में मना रहे हैं।

श्री मोदी ने कहा कि समाज में हर प्रकार का सामथ्र्य पैदा हो और भारत वैभव के शिखर पर पहुंचे, इसके लिए पंडित दीनदयाल जी सात आदर्शों की वकालत किया करते थे – एकरसता, कर्मठता, समानता, सम्पन्नता, ज्ञान, सुख और शान्ति, इन्हीं सप्त धाराओं से हम भारत का वैभव बना सकते हैं। उन्होंने कहा कि पंडित जी एक ऐसे समाज का पुनर्निर्माण करना चाहते थे जहां मनमुटाव न हो, भेदभाव न हो, शोषण की कल्पना तक न हो, यही राष्ट्रभक्ति है और हम इसी चिंतन के साथ इस विचारधारा पर आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि उस समय हम कुछ भी नहीं थे पर पंडित जी का सामथ्र्य देखिये, विचारों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता देखिये, अद्भुत श्रद्धा देखिये कि उन्होंने अपने पथ पर चलते हुए संगठन को खड़ा किया, विजय का विश्वास और तपस्या के निश्चय के साथ चरैवेति, चरैवेति का जो संकल्प उन्होंने दिया था, वह आज भी उतना ही सार्थक है, उसे लेकर हमें चलना है। उन्होंने कहा कि पंडित जी के चरणों में प्रणाम करते हुए हमें इस महान विचार यात्रा को आगे बढाने के लिए परिश्रम की पराकाष्ठा करना चाहिए, हमें अपना सर्वस्व मां भारती के लिए अर्पित कर दें।

                उदय इंडिया ब्यूरो

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