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छद्मयुद्ध का जवाब छद्मयुद्ध

छद्मयुद्ध का जवाब छद्मयुद्ध

अगर शांति चाहते हैं तो युद्ध की तैयारी कीजिए। यह वाक्य कुछ अमन की आशा का राग लापनेवालों को भले ही बुरा लगे मगर व्यावहारिक जीवन में कितना सटीक है यह इस देश ने 28 सितंबर, 2016 को एक बार फिर देख लिया। उस दिन देश के इतिहास की दिशा एक बार फिर बदल गई। देश ने लंबे समय तक पाकिस्तानी आतंकवाद की जहालत को चुपचाप झेलने के बाद पाकिस्तान को ऐसा करारा तमाचा जड़ा जिसकी पाकिस्तान को भी उम्मीद नहीं थी। भारत के लोग लंबे समय से पाकिस्तान के आतंकवादी हमले झेल रहे थे और हर बार उन्हें लगता था कि भारत सरकार को इसका मुंहतोड़ जवाब देना चाहिए। मगर कांग्रेस की सरकार तो चूडिय़ां पहने बैठी थी। पता नहीं क्यों इतनी डरी हुई थी कि कई बार आतंकी  हमले होने पर भी शांतिपाठ ही करती रहती थी। मोदी भी दो साल तक आतंकी हमलों को सहते ही रहे। लेकिन उरी के हमलों के बाद सब्र का बांध टूट गया। तब नरेंद्र मोदी ने यह बता ही दिया कि 56 इंच का सीना क्या होता है। इस तरह वह देश के करोड़ों लोगों की अपेक्षाओं पर खरे उतरे।

इसके माध्यम से उरी में शहीद हुए 18 वीर सपूतों के रक्त को प्रधानमंत्री ने व्यर्थ नहीं जाने दिया और अपने उस वचन को भी निभाया जिसमें उन्होंने देश के नागरिकों से कहा था कि वे उरी के अपराधियों को अवश्य दंडित करेंगे। हद पार की जा चुकी थी। सहने का स्तर लांघा जा चुका था। इसलिए यह तो होना ही था। पाकिस्तान को अब यह समझना होगा कि उसके द्वारा आतंक को पोसने और भारत द्वारा आखें मूंदे रखने का दौर जा चुका है। मोदी के आने के बाद भारत बदल चुका है। सख्त कदम लेने में सक्षम और विश्व मंच पर अपना पक्ष मजबूती से रखता भारत पहले से अलग है। पाकिस्तान की छत्रछाया में पलते सात आतंकी ठिकानों पर भारतीय सेना का बेहद संतुलित और सटीक हमला सिर्फ उरी हमले का जवाब भर नहीं है। यह कोई राजनैतिक निर्णय या सिर्फ सैनिक कार्रवाई भर भी नहीं है, बल्कि इसे भारतीय विदेश और सामरिक नीति में उस बदलाव के तौर पर देखा जाना चाहिए जहां इस देश ने पीठ में छुरा घोंपने वालों को गले लगाने वाली आत्मघाती मुद्रा त्याग दी है।

आतंकवाद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ललकारते हुए भारत ने उस पड़ोसी को बेनकाब कर दिया है जो आतंकी कठपुतलियों के जरिए ही भारत को हजारों जन्म देने की सैन्य और विदेशनीति पर दशकों से काम कर रहा था।

कई रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि भारतीय सेना का नियंत्रण रेखा के पार चला जाना पाकिस्तानियों के लिए इस लिहाज से बुरा है क्योंकि उन्हें लगता है कि उनकी सेना अपराजेय है और भारत पाकिस्तान के खिलाफ कुछ करने की हिम्मत नहीं रखता है। पाकिस्तान की यह गलतफहमी दूर हुई यह अच्छा ही हुआ। फिर भी मानना ठीक नहीं है कि पाकिस्तान भारत के सैन्य अभियान का जवाब नहीं देगा। वह अपनी आदत से बाज नहीं आनेवाला है। हाल ही में पाकिस्तान यह मानने को ही तैयार नहीं है कि सर्जिकल स्ट्राइक हुई है। इस पर सर्जिकल स्ट्राइक को मास्टर स्ट्रोक कहने वाले तारेक फतह

कहते हैं  कि, जब पाकिस्तान कहता है कि भारत ने कोई सर्जिकल स्ट्राइक नहीं किया तो भारत को भी वही कहना चाहिए।

उन्होंने कहा कि, दो-चार थप्पड़ (सर्जिकल स्ट्राइक) और लगा दे और कहे कि हमने तो कुछ भी नहीं किया।

भारत द्वारा एक बार हमले का जवाब देने से पाकिस्तान मानने वाला नहीं लगता क्योंकि पाकिस्तान भारत विरोध पर ही जिंदा है। यही उसके अस्तित्व का आधार है। पाकिस्तान के जुल्फिकार अली भुट्टो ने धमकी दी थी-हम भारत के साथ एक हजार साल तक युद्ध लडऩे को तैयार है। इसी चाह का नतीजा है कि भारत और पाकिस्तान के बीच चार युद्ध हो चुके हैं। यह बात अलग है कि हर बार पाकिस्तान बुरी तरह से हारा। बांग्लादेश के युद्ध में उसकी सेना को समर्पण करना पड़ा। चार युद्धों में हार से पाकिस्तान ने एक ही सबक सीखा है कि परंपरागत युद्ध में वह भारत से जीत नहीं सकता। इसलिए वह पिछले तीन दशकों से भारत के खिलाफ छद्म युद्ध छेड़े हुए है। इसके बारे में पाक में कहा जाता है कि बिना युद्ध किए सौ घाव देने का युद्ध। इसके लिए पाकिस्तान ने राज्य द्वारा प्रायोजित आतंकवादियों अलग फौज तैयार की हुई है। भारत के कई शहर, हजारों नागरिक पाकिस्तान के इन आतंकवादियों द्वारा लड़े जाने वाले छद्म युद्ध के शिकार हो चुके हैं। वह इतनी आसानी से उसे छोडऩेवाला नहीं है।

हम पाकिस्तानी आतंकवादी हमलों को रोकने के लिए कई उपाय कर रहे हैं जैसे पाकिस्तान को अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में अलग- थलग करना, व्यापार में मोस्ट फेवर्ड नेशन की सुविधा खत्म करना। लेकिन ये उपाय पाकिस्तानी छद्मयुद्ध का जवाब नहीं हो सकते। छद्मयुद्ध का जवाब छद्मयुद्ध है। हमें भी पाकिस्तान की छद्मयुद्ध  या कोवर्ट आपरेशन की नीति को अपना लेना चाहिए। जिसमें आप दुश्मन पर हमला कर सके और उसकी जिम्मेदारी से पल्ला भी झाड़ सकें। हमला करने वालों को सजा भी दे सकें। जब तक हम यह क्षमता पैदा नहीं करेंगे तब तक आतंकवाद जारी रहेगा। इसके अलावा यह जरूरी नहीं है कि हम हमला होने पर ही उसके जवाब के तौर पर कार्रवाई करें। असल में अंग्रजी में जैसा कहा जाता है कि ऑफेंस इज बेस्ट डिफेंस की नीति पर चलना चाहिए तब पाकिस्तान हमले करने से भी डरेगा।

23-10-2016

भारत पर एक के बाद  एक पाकिस्तान के आतंकी हमले होते रहे मगर भारत कभी उसका जवाब नहीं दे पाया। हम केवल पाकिस्तान को धमकियां देकर चुप हो जाते हैं। कारण हमने अपने पैरों पर कुल्हाडी मार ली है। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने इस देश में न जाने कितने आतंकी हमले करवाए। न जाने कितने आतंकवादी भारत में आतंकवादी करतूते करके पाकिस्तान में शरण लेते हैं। पठानकोट और उरी के हमलों का सूत्रधार, मुंबई बमकांड का सूत्रधार दाऊद इब्रहिम या 26 नंवबर के हमले का मास्टर माइंड सईद हाफिज पाकिस्तान में है लेकिन भारत जैसा महाशक्ति बनने का सपना देखने वाला देश उनका बाल भी बांका नहीं कर पाता। उन्हें सही-सही पता तक नहीं होता कि दाऊद है कहां। क्यों पाकिस्तान के मामले में भारत की सारे खुफिया ऑपरेशन फेल हो जाते हैं। कोई मोसाद जैसा ऑपरेशन कर दाऊद जैसे आतंकी को पकड़ लाने वाले ऑपरेशन की बात तो छोड़ ही दीजिए। कभी-कभी तो लगता है सीआईए, मौसाद या एमआई 6 जैसे दुस्साहसी अभियान ऑपरेशन भारत के बस की बात नहीं। यह भले ही आज की हकीकत हो लेकिन बहुत से जानकारों का कहना है कि कभी हमारे देश में रॉ जैसी खुफिया एजेंसी थी, जो ऐसे अभियान करने में सक्षम थी। वह भारतीय खुफिया एजेंसियों का स्वर्णयुग था। कई दशकों की मेहनत से इंदिरा गांधी ने रॉ को खड़ा किया था जिसने कभी काहूटा, सिक्किम, बांग्लादेश, श्रीलंका जैसे कोवर्ट ऑपेरशनों को सफलता पूर्वक अंजाम दिया था लेकिन इस कई दशकों की मेहनत को बाद के मोरारजी और गुजराल जैसे प्रधानमंत्रियों  ने चौपट कर दिया। जिसका नतीजा हम आजतक भुगत रहे हैं। उर्दू का एक शेर है न लमहों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई। इन प्रधानमंत्रियों के गलत फैसलों का फल हमारा देश आजतक भुगत रहा है। कुछ अर्से पहले रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर ने एक बार फिर इस पुराने घाव को कुरेद दिया। एक बार फिर पुरानी बहस को छेड़ दिया कि कैसे हमारे राजनेताओं ने हमारी एजंसी रॉ जैसी खुफिया एजेंसी को बधिया बना दिया।

रॉ के अफसर ने इस बारे में खरी-खरी बात कही थी कि हर हमले के बाद हमारे नेता कहते हैं, हम उनके ऊपर बमबारी कर देंगे, हम जंग कर देंगे, ये सब तो होने वाला नहीं हैं वो भी परमाणु देश है, आप भी परमाणु देश हैं, इतनी तो हिम्मत हमारी है नहीं। हिम्मत तो छोडिय़े, क्षमता भी नही है। क्षमता की बात पहले आती है, हिम्मत बाद में आती है क्योंकि क्षमता के बगैर हिम्मत बेवकूफी होती है। अब एक ही रास्ता बचता है कोवर्ट ऑपरेशंस (गुप्त, राजनीतिक और असैनिक लड़ाई) का। वो इन नेताओं ने दशकों से खत्म करके रखी है, एजेंसियों को बिल्कुल कह दिया है कि आप  कोवर्ट का ये मतलब नही हैं कि हम वहां पर आतंकवाद शुरू करायें। आतंकवाद शुरू कराना हमारे देश के लिए संभव है ही नहीं, क्योंकि हम पाकिस्तान के स्तर पर नहीं गिरना चाहते, लेकिन कोवर्ट ऑपरेशन में एक तो टार्गेटेड ऑपरेशन होता है। जो खास आतंकवादी हैं, उनको लक्ष्य बना कर खत्म किया जाये या उनके जो समर्थक हैं उनको खत्म किया जाये एक ये कोवर्ट ऑपरेशंस होते हैं। दूसरा जो संस्थायें हैं उनको देखिये। देखिये कि उनसे कौन-कौन सी संस्थायें आतंकवाद को समर्थन देती हैं और उनके खिलाफ आप एक मुहिम चलाइये, ये राजनीतिक हो सकती है, ये कूटनीतिक हो सकती है, ये आर्थिक हो सकती है। उद्देश्य ये है कि उनकी शक्ति खत्म की जाये, यह कोई हफ्ते दो हफ्ते का काम नहीं है।

आप जानते हैं कि 1977 से ही रॉ की सारी क्षमतायें खत्म कर दी गई। मोरारजी देसाई और गुजराल के जमाने में रॉ की क्षमता को नेस्तनाबूत कर दिया गया। ये सिलसिला तभी से शुरू हुआ था और किसी सरकार ने इस सिलसिलें को उल्टा मोडऩे की कोशिश नहीं की। किसी सरकार ने नहीं कहा कि बहुत हो गया, अब वापस अपनी क्षमता बनाइये। बिना राजनीतिक अनुमति के कोई भी एजेंसी कुछ नहीं कर सकती। राजनीतिक अनुमति इसलिए नही हैं क्योंकि हमारे नेताओं में सुरक्षा की कोई समझ ही नही है। कोई दूरगामी सोच ही नही है, जो अपने देश में ऑपरेशन करने की क्षमता नहीं रखते वो किसी और देश में ऑपरेशन करने का क्या गुमान रखेंगे। उनको समझ ही नहीं है।

आप खुफिया एजेंसियों को संसाधन नहीं देंगे और आदेश नही देंगे। तो सुरक्षा एजेंसियां कुछ नहीं कर पाएंगी। जब तक इसका आप कुछ हल नहीं निकालेंगे तब तक चलता रहेगा, इसलिए भारत के सामने एकमात्र विकल्प है कि हम अपनी एजेंसियों को मजबूत करें और पाकिस्तान में कोवर्ट ऑपरेशन शुरू करें। कोवर्ट ऑपरेशन हर मायने में हो ऐसे अभियान हिंसक नहीं होते। ये राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक तीनों ही स्तरों पर चलाए जाते हैं। ये लंबे समय के ऑपरेशन होते हैं और इनका दायरा विस्तृत होता है। लोग समझते हैं कि कोवर्ट ऑपरेशन का मतलब सिर्फ किसी को गुपचुप तरीके से ठिकाने लगा देना या मार देना। ऐसा बिल्कुल नहीं है लेकिन यब बात हमें समझ लेनी चाहिए कि कोवर्ट ऑपरेशन या छद्मयुद्ध ही एकमात्र विकल्प है और उसे हमें पूरी क्षमता से लागू करना चाहिए।

सतीश पेडणेकर

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