ब्रेकिंग न्यूज़ 

बुजुर्गों का सम्मान सर्वोपरि

बुजुर्गों का सम्मान सर्वोपरि

कई संतों ने भविष्यवाणी की है कि 21वीं सदी भारत की सदी होगी। भारत दुनिया को राह दिखाएगा और विश्वगुरु कहलाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी भारत को ताकतवर बनाने, उसकी परंपराओं और मूल्यों को संरक्षित करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। मोदी सरकार ने हमारे उत्पादन क्षेत्र, इंफ्रास्ट्रक्चर, कृषि क्षेत्र को मजबूत करने और हमारे समाज में सद्भाव तथा सौहार्द कायम करने के लिए कई महत्वपूर्ण कार्यक्रमों की शुरुआत की है। लखनऊ में दशहरा पर प्रधानमंत्री का भाषण देश और दुनिया को कई पुख्ता संदेश दे गया। प्रधानमंत्री ने दशहरा पर सामाजिक बुराइयों से लडऩे पर जोर दिया। उन्होंने बेटियों को बचाने का जोरदार आह्वान किया। उन्होंने आतंकवाद से निबटने पर विस्तार से चर्चा की। फिर भी हमारे समाज में ऐसी कई कमजोरियां हैं जिन पर फौरन गौर करने की दरकार है।

हमारे पढ़े-लिखे युवा शादी के बाद अपने बुजुर्ग मां-बाप से अलग रहना पसंद करते हैं। हर मां-बाप यही चाहता है कि उसके बच्चे सुखी जीवन जीएं, इसलिए वे धीरे-धीरे अपनी प्रिय संतान से दूर जाने लगते हैं। जब वे अलग रहने लगते हैं तो कई बार उन्हें किसी की देखभाल की जरूरत पड़ती है और कई बार वे पैसों की लालच में अपराधियों के हत्थे चढ़ जाते हैं और कत्ल कर दिए जाते हैं। इन दिनों महानगरों और छोटे शहरों में कई ऐसे मामले उजागर हुए हैं, जिनमें बुजुर्ग या तो असहाय-सा जीवन जीते हैं या फिर घातक खतरों में फंस जाते हैं।

आज, एक खबर पढ़कर मेरा दिल जार-जार रो उठा। एक बेहद बुजुर्ग पति दिल्ली में अपनी मृत पत्नी के शव के साथ रहता पाया गया। यह खबर हमारे बुजुर्गों की दयनीय दुर्दशा का परिचय कराती है। इस पृष्ठभूमि में यहां यह चर्चा प्रासंगिक है कि 2011 की जनगणना के मुताबिक हमारे देश में करीब 10 करोड़ वरिष्ठ नागरिक हैं, जिनमें करीब 1.5 करोड़ अकेले रहते हैं। उनमें करीब तीन-चौथाई तो महिलाएं हैं। यह भी गौर कीजिए कि देश में हर 10 बुजुर्ग दंपती में छह से ज्यादा को अपने बच्चों का घर छोडऩे पर मजबूर होना पड़ता है। कहीं और जाने की जगह न होने और सारी उम्मीदें डूब जाने के बाद ये बुजुर्ग वृद्धाश्रमों में पहुंच जाते हैं, जहां उन्हें आला दर्जे का व्यवहार नहीं मिलता।

अमेरिका के उलट भारत में बच्चों को 18 वर्ष की उम्र के बाद मां-बाप उन्हें अपनी तरह जीने को नहीं छोड़ देते, लेकिन बच्चे यह सच्चाई नहीं पचा पाते कि ऐसा वक्त भी आता है जब मां-बाप को वैसे ही प्यार की दरकार होती है, जिस प्यार से उन्होंने बच्चों को पाला-पोसा होता है। सवाल यह है कि भारतीय समाज में मां-बाप की देखभाल कौन करे? क्या कोई बेटी, जो शादी के बाद चली जाती है और उसके पास अपने परिवार की जिम्मेदारियां होती हैं? या बेटा, जो पूरा दिन काम में बिताकर रात को थका-मांदा घर लौटता है? शहरी इलाकों में तो बेटे की पत्नी को भी घर चलाने के लिए काम करना पड़ता है। पोते-पोती अपनी पढ़ाई में व्यस्त रहते हैं। अंतत: मां-बाप की सेवा की जिम्मेदारी बहू पर आ जाती है, जिसका कोई रक्त-संबंध नहीं होता और दरअसल वह जिम्मेदारी उठाने को बाध्य भी नहीं है। असल में उलझन यह नहीं है कि मां-बाप की देखभाल कौन करे, बल्कि यह है कि उन्हें साथ में रखा जाए। यह कहना लाजिमी है कि भारत में बुजुर्गों को देखभाल से कुछ अधिक की दरकार होती है। इतना ही काफी नहीं है कि बच्चों का मां-बाप के प्रति आदर हो और जब जरूरत हो उन्हें चिकित्सा और वित्तीय मदद कर दी जाए। इससे अधिक उन्हें साथ रखने, उनकी सुनने और लगातार उनका आदर करते रहने की दरकार है।

यह नहीं भूला जाना चाहिए कि मां-बाप ही हमारे रचयिता हैं और उन्हीं की वजह से हमारा अस्तित्व है। उनके बच्चों का असली सरोकार यही होना चाहिए कि हम एक व्यक्ति के नाते, एक परिवार के नाते, एक वृहत्तर परिवार के नाते क्या कर सकते हैं। हमें इस सच्चाई का सामना करना है कि भारत में बुजुर्गों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं होता और उन्हें समाज पर बोझ माना जाता है। यह उनके लिए वाकई एक दयनीय स्थिति है। भारतीय संस्कृति में उम्मीद की जाती है कि बच्चों अपने बुजुर्गों के निपट आज्ञाकारी होंगे। वयस्क बच्चे उनके साथ रहेंगे, न कि अपने अलग घर में। लेकिन हमारे समाज में हो क्या रहा है? बच्चे अपने जीवन की निजता के बहाने अलग रहना पसंद करते हैं, जो पश्चिमी विचार है। यह कोरा बकवास-सा विचार है। फर्ज कीजिए कि मां-बाप भी अगर बच्चों को 18 साल की उम्र में अलग करने की सोचें तो उनकी हालत क्या होगी?

कुछ विशेषज्ञ राय जाहिर करते हैं कि देश में वृद्धाश्रमों की संख्या अधिक होनी चाहिए, लेकिन यह कोई समाधान नहीं है। समाधान संयुक्त परिवार है, एकल परिवार नहीं। संयुक्त परिवार में बुजुर्ग अभिभावक की तरह होते हैं, जो बच्चों में उचित मूल्यों का संचार करते हैं। लेकिन आज जो चल रहा है, वह वाकई निराशाजनक और निंदनीय है। इसलिए हमारी युवा पीढ़ी को यह आश्वस्त करना चाहिए कि बुजुर्गों को उचित आदर मिले और उन्हें गरिमा के साथ जीने दिया जाए, क्योंकि उन्होंने अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अपने बच्चों के लिए सुंदर संसार बनाने में खर्च कर दिया है। हमें यह आश्वस्त करना चाहिए कि उन्हें जीवन में वह सब कुछ मिले, जो वे जरूरी समझते हैं। अंत में, मैं यही कहना चाहूंगा कि हर किसी का अपने मां-बाप के साथ एक स्वस्थ, सुंदर और प्यारा संबंध होना चाहिए। यह आश्वस्त किया जाना चाहिए कि उनकी आर्थिक और सेहत संबंधी जरूरतें पूरी हों। चाहे वे घर में या जहां भी रहना चाहें, इसमें कोई सही-गलत नहीं है, बस उन्हें प्यार और भरपूर आदर दिया जाना चाहिए।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

parket-ukladkaресторан никас отзывы

Leave a Reply

Your email address will not be published.