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आओ जलाएं ज्ञान का दीया

आओ जलाएं ज्ञान का दीया

दिपावली हिन्दू धर्म का प्रमुख पर्व है। त्योहारो का हमारे जीवन में बहुत अधिक महत्व होता है। हमारे निन्य जीवनशैली और हमारे जीवन दर्शन हमारे त्योहारो के ऊपर निर्भर करता है। दिपावली का केवल सुख-समृद्धि और आनंद का त्योहार है, वह हमारे जीवन को एक महान शिक्षा प्रदान करता है। दिपावली जैसी पर्व को देखकर यह आसानी से पता चल जाता है कि हमारी संस्कृति, परंपरा कितना अधिक महान है, केवल घर को आलोकित करना, सुस्ज्जीत सामानों से घर को सजाना अथवा उपहार देकर अपनों को बधाई देना। दिपावली हमारे जीवन तत्व का हमारे सामने लाता है, जरूरत है तो केवल हमे उसी तत्व को समझने की। हमारे जीवन में रहने वाले अज्ञान रूपी अहंकार से दूर हो कर ज्ञान की ओर जाने का दीया दिखाता है। यदि विद्यालय जाकर अनेक विद्या का अधिकारी हो जाते है लेकिन असली जब मनुष्य के अन्दर हमेशा जरूरत रहती है। इस अज्ञान के कारण वह हमेशा तनाव और अशांति में रहते है। अगर इस दिपावली का महत्व समझ कर ज्ञान का दीप अपने अन्दर प्रज्जवलन करें तो हम महा आनंद का लाभ प्राप्त कर सकेंगे।

हमारे पुराण और ग्रंथों में यही वर्णन हुआ है कि किस प्रकार हमारे ज्ञान का आलोक द्वारा हर अज्ञान रूपी अंधकार को मिटा सकेंगे। ऊं असोतो मां सदगम्य, तमसो मां ज्योतिगर्मय, मृत्यु मां अमृते गमय। हमारे पूवर्जों जो महान पंडित थे, उन्होंने यह श्लोक को ना केवल अनुभव किये थे, वह नित्य जीवन में सबको अनुभव करने के लिए प्रोत्साहन किए थे। इसी श्लोक को हम सभी समझकर कार्य में लगाना चाहिए। हम हमेशा असत्य से सत्य को की ओर करना चाहिए। पहले हमें सत्य को जानना आवश्यक है, यह दुनिया में केवल एक ही सच है कि यहां सब कुछ क्षण स्थायी। कुछ भी चीज चिरन्तन नहीं हैं, जो आज हमारे साथ है, वह कल हमारे साथ नहीं रहेगा। जो आज हमारे साथ नहीं हैं, हो सकता है वह भी हमारे पास हो सकता है, इसलिए यही सोच को  मन में रखकर नहा हमें खुश या दुखी होना चाहिए। हमारा जीवन तमस से अर्थात अंधकार से निकलकर अर्थात आलोक की ओर जाना चाहिए। जो अज्ञान के अंधकार मानव जीवन को विचलित करता है, उससे दूर होकर ज्ञान के उजाले की ओर जाना चाहिए। ज्ञान ही हमें खुशी रहने का रास्ता दिखा सकता है। अंत में यह कहा गया है मृत्य मां अमृतं ममय मृत्यु को पहचानना चाहिए। जो मृत्यु हम सबको भयभीत कर देता है। मृत्यु से हम अमृत्य कैसे सोचे वही हमें जीवन दर्शन बताता है। हम जिस मृत्यु से विचलित हो जाते है उसका असली में अंत नहीं होता है। केवल एक बदलाव होता है, तो इसी मृत्यु का भयंकर, अशुभ, अवसोच मानकर केवल कुछ परिवत्र्तन माने तो हम आशानुरूप कम दुखी होंगे।

यह समस्त बातों में सबसे महत्वपूर्ण बात है अपने अन्दर के ज्ञान का दीया जलाना। उसी आलोक से दुनिया को देखना। हम प्रत्येक मनुष्य अगर त्योहार के महत्व को समझकर और हमारे शास्त्र में लिखे गए शब्दों को अनुभव कर जीवन निर्वाह कर सकेंगे तो हम बहुत अधिक खुश रह पाएंगे और दूसरों को अपने ज्ञान का आलोक से दिप्तीमन्त कर पाएंगे।

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