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गाय पर अत्याचार की गाथा

गाय पर अत्याचार की गाथा

‘एक गाय की आत्मकथा’ जो गिरीश पंकज द्वारा लिखी गई पुस्तक हैं। एक गाय पर होने वाले  अत्याचार, देश में बिना किसी रोक-टोक के तेजी से बढ़ते हुए कसाईखाने, गौशाला के उपर खर्च करने के नाम पर हो रही धन उगाही, पंथ व संप्रदाय  के नाम पर गायों का बलि चढ़ाना, एक गाय का आर्थिक महत्व तथा किस प्रकार से एक गाय हमारे सनातनी भारत भूमि के लिए पवित्र है आदी विषयों का उल्लेख करती है। इन सभी विषयों को गिरीश पंकज ने अपने साहित्यिक लेखन के माध्यम से समझाने का प्रयत्न किया है।

06-11-2016इस किताब को श्यामा और श्वेता नामक दो गायें जो सरायपुर के कुछ कसाईयों के चंगुल से छुप कर अपना जीवन गुजारती हैं, उनके दृष्टिकोण से दर्शाया गया है। इसमे लेखक ने पाठको का ध्यान आकर्षित करते हुए बड़ी शीघ्रता से हो रहे शहरी विकास को गायों तथा अन्य जानवरों के भविष्य के लिए खतरा बताया है। लेखक का मानना है कि गायों के सीधे-साधे होने के कारण कसाई इन्हे आसानी से निशाना बनाते है और दयनीय स्थिति यह हैं कि धीरे-धीरे इन कसाईखानो की संया भारत की स्वतंत्रता के बाद से सौ गुना बढ़ गई है।

लेखक इस किताब के माध्यम से लोगों को यह बताने का प्रयास कर रहे है कि  जिस देश का पहला स्वतंत्रता संग्राम (1857) का कारण, अंग्रेजो द्वारा एक गाय से बनाया गया कारतूस हो, आज उस देश कि सांस्कृतिक धरोहर जिसे कई नामो, नंदनी, गीर, सिंधी और साहीवाल आदि के नाम से जाना जाता हैं, ये सभी प्रजातियां तेजी से बढ़ते कसाईखानों के  के कारण खत्म होने के कगार पर हैं।

 लेखक ने यह भी बताने का प्रयास किया है कि वह गौशालाएं जो बूढ़ी हो रही उन्हें गायों के संरक्षण के लिए बनायी जाती हैं, उनमे  गौशालाओं के मालिक दुधारू व दुध न देने वाली गायों की सेवा अलग-अलग प्रकार से बेईमानी पूर्वक करते हैं। जो गाय दुधारू होती हैं उन्हे भरपेट भोजन तथा जो दुध  देने में असमर्थ होती है, उन्हे मरने के लिए छोड़ देते हैं।

एक गाय की आत्मकथा

लेखक                   : गिरीश पंकज

प्रकाशक : बाबा हिरदास पुस्तक सेवा समिति

मूल्य                   : २०० रु.

पृष्ठ                    : २३४

इसी अंश को आगे बढ़ाते हुए लेखक ने लिखा हैं कि गौशालाओं के सेठ इसे माध्यम बनाकर सरकार द्वारा दी जाने वाली राशि एकत्रित करते हैं। लेकिन उसका उपयोग बूढ़ी हो रही गायों के उत्थान में कम ही खर्च करते हैं।

लेखक ने इस लेखन के माध्यम से यह भी समझाने का प्रयास किया है कि किसी भी धर्म और पंथ की किताबें गाय को अपना भोजन बनाने का परामर्श नही देती है, चाहें वो हिन्दू, सिख, ईसाई या मुस्लिम धर्म ही क्यों न हो।

लेखक ने यहां सरायपुर के पास ही के गांव लालपुर का वर्णन करते हुए बताया है कि इस गांव  के मुजफ र भाई की सहायता से गांव के मुस्लिम भाइयों नें ‘मुस्लिम गौ रक्षा संघ’ बनाया, जिसके सदस्य गौ-वंश का आर्थिक महत्व गांव के लोगो को घूम-घूम कर समझाने लगे और अन्तत: लोग कसाईखानों से अधिक धन गायों से निकलने वाले दूध, गोबर व इससे बनने वाली अन्य सामग्री मिठाई, घी, दही तथा खाद्य बेच कर कमाने लगें और कसाईखानों कि संया लगातार कम होती गई तथा लोगों ने देसी गायों को अधिक संख्या में पालना आरम्भ कर दिया।

गिरीश पंकज द्वारा लिखी गई यह पुस्तक पाठकों का ध्यान आकॢषत करेगी, क्योंकि इस पुस्तक में एक गाय पर होने वाली राजनीति, समाज में गाय का आर्थिक योगदान, हिन्दू सयताओं में गाय की मान्यता, गाय पर तथाकथित धार्मिक मतभेद आदि का वर्णन पाठको को इस किताब में मिलेगा, जो गौ-वंश के भूत, वत्र्तमान और भविष्य को विस्तृत रूप से दर्शाता हैं।

रवि मिश्रा

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