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आचार्य विजय रत्नसुंदरसूरि संत-साहित्य के पुरोधा

आचार्य विजय रत्नसुंदरसूरि  संत-साहित्य के पुरोधा

भारतीय ऋषि परम्परा एवं संस्कृति में साहित्य का विशेष महत्व है क्योंकि शब्दों का सीधा प्रभाव व्यक्ति के जीवन पर पड़ता है। भारत की साहित्यिक परंपरा में संत-साहित्य का अपना विशिष्ट स्थान है। संत-साहित्य का महत्व केवल वर्तमान में ही नहीं, भविष्य के लिए भी होता है, क्योंकि इस साहित्य ने कभी भोग के हाथों योग को नहीं बेचा, धन के बदले आत्मा की आवाज को नहीं बदला तथा शक्ति और पुरुषार्थ के स्थान पर कभी अक्षमता और अकर्मण्यता को नहीं अपनाया। ऐसा इसलिए संभव हुआ क्योंकि संत अध्यात्म की सुदृढ़ परंपरा के संवाहक होते हैं।

आचार्य विजय रत्नसुंदरसूरिजी ऐसी ही संत परंपरा के महान साहित्य-सृष्टा युगपुरुष हैं। उनका साहित्य परिमाण की दृष्टि से ही विशाल नहीं, अपितु गुणवत्ता एवं जीवन-मूल्यों को लोकजीवन में संचारित करने की दृष्टि से भी विशिष्ट है। गिरते सांस्कृतिक मूल्यों की पुन: प्रतिष्ठा का संकल्प इस साहित्य में पंक्ति-पंक्तिमें देखा जा सकता है। उन्होंने सत्यं, शिवं और सौन्दर्य की युगपत् उपासना की है, इसलिए उनका साहित्य मनोरंजन एवं व्यावसायिकता से ऊपर सृजनात्मकता को पैदा करने वाला है। उनके लेखन या वक्तव्य का उद्देश्य आत्माभिव्यक्ति, प्रशंसा या किसी को प्रभावित करना नहीं, अपित स्वान्त: सुखाय एवं स्व-परकल्याण की भावना है। इसी कारण उनके विचार सीमा को लांघकर असीम की ओर गति करते हुए दृष्टिगोचर होते हैं। उनका साहित्य हृदयग्राही एवं प्रेरक है, क्योंकि वह सहज है। वह भाषा-शैली का मोहताज नहीं, अपितु उसमें हृदय एवं अनुभव की वाणी है, जो किसी भी सहृदय को झकझोरने, प्रेरित करने एवं आनंद-विभोर करने में सक्षम है।

आचार्य विजय रत्नसुंदरसूरिजी ने इक्कीसवीं सदी के भाल पर अपने कर्तृत्व की जो अमिट रेखाएं खींची हैं, वे युग-युगों तक स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेंगी। साहित्यद्रष्टा के साथ-साथ वे धर्मक्रांति एवं समाजक्रांति के सूत्रधार भी कहे जा सकते हैं। वे पुरुषार्थ की जलती मशाल है। उनके व्यक्तित्व को एक शब्द में बंद करना चाहें तो वह है- पौरुष। शताब्दियों से दासता के कारण जर्जर देश की अकर्मण्यता को झकझोरने में उनके साहित्य की महत्वपूर्ण भूमिका है। उनकी हार्दिक अभिप्सा है कि पूरा राष्ट्र एवं समाज पुरुषार्थ के वाहन पर सवार होकर जीवन-निर्माण की यात्रा करे और जीवन के सीधे सपाट रास्ते में सृजन का एक नया मोड़ दे। ‘चरैवेति चरैवेति’ का आर्ष वाक्य उनके कण-कण में रमा हुआ है। नन्हें पांवों से धरती को नापने के कारण उन्होंने धरती और धरती के व्यक्ति के दर्द को निकटता से महसूस किया है, इसी कारण उनका साहित्य जीवंत है। वे समस्याओं से गहराई से महसूस करते हैं यही कारण है कि अकर्मण्यता, भोगवाद एवं सुविधावाद पर जितना प्रहार उनके साहित्य में मिलता है उतना अन्यत्र दुर्लभ है।

आचार्य विजय रत्नसुंदरसूरिजी के विराट् व्यक्तित्व को किसी उपमा से उपमित करना उनके व्यक्तित्व को ससीम बनाना है। उनके लिए तो इतना ही कहा जा सकता है कि वे अनिर्वचनीय हैं। इस महान संत आत्मा का जन्म 5 जनवरी 1948 को छोटे से ग्राम देपला में चंपाबेन की कुक्षि से हुआ। आपके पिता डालीचंदभाई हैं। आपका बचपन का नाम रजनी था। मां और पिता दोनों के धार्मिक संस्कारों एवं प्रेरणा के कारण उन्नीस वर्ष की युवावस्था में संन्यास के पथ पर प्रस्थित होकर उन्होंने गहन साधना की, स्वयं को खूब तपाया और एक संतपुरुष एवं मानव-कल्याण के पुरोधा के रूप में वे विख्यात हुए। उन्होंने उद्देश्यपूर्ण जीवन जीकर जो ऊंचाइयां और उपलब्धियां हासिल की हैं, वे किसी कल्पना की उड़ान से भी अधिक है। अपने जीवन के सार्थक प्रयत्नों से उन्होंने इस बात को सिद्ध किया है कि समय और परिस्थितियां उनका निर्माण नहीं करतीं, वे स्वयं समय और परिस्थितियों का निर्माण करते हैं। साधारण पुरुष जहां अवसर को खोजते रहते हैं, वहां महापुरुष नगण्य अवसरों को भी अपने कर्तव्य की छेनी से तराश कर उसे महान बना देते हैं। यही कारण है कि उन्होंने 300 से अधिक पुस्तकें लिखी और 60 लाख से अधिक प्रतियां प्रकाशित हुई हैं, जो साहित्य जगत की एक महान् घटना है।

मेरा आचार्य विजय रत्नसुंदरसूरिजी से सन् 2006 में प्रथम साक्षात्कार हुआ। वे विशेष उद्देश्य और कार्यक्रम को लेकर दिल्ली पधारे थे और उनका प्रथम पड़ाव गणि राजेन्द्र विजयजी महाराज के सुखी परिवार फाउंडेशन के महिपालपुर स्थित आश्रम-कार्यालय में हुआ था। उस दौरान उनसे लंबी चर्चाएं हुई थी जिसमें साहित्य के अलावा लोकतांत्रिक मूल्यों, राजनीतिक शुद्धिकरण, सुविधावाद, भोगवाद, शिक्षा, संस्कार, जनकल्याण आदि-आदि विषयों पर विशद् चर्चा हुई। यूं तो उनके व्यक्तित्व के अनेक आयाम हैं जिनमें साधना, आध्यात्मिक नेतृत्व, अनुशासन, नैतिक मूल्यों की स्थापना आदि है लेकिन उनके विराट् व्यक्तित्व का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू साहित्य-सृजन है। पिछले वर्ष मुम्बई में उनके साहित्य का एक भव्य महाकुंभ महोत्सव उनकी 300वीं पुस्तक ‘मेरा भारत, महान भारत’ के विमोचन के अवसर पर हुआ। इस अवसर पर सेवा, जनकल्याण एवं साधना के अनेक विशिष्ट उपक्रम आयोजित हुए जिनमें महाराष्ट्र की तीन सौ गौशालाओं में छिहत्तर लाख की राशि, जैन मंदिरों के जीर्णोद्धार के लिए बीस करोड़ का अनुदान, ढ़ाई लाख परिवारों और अनाथ आश्रमों को फल वितरण, शिक्षक-शिक्षिकाओं का सम्मान, आठ हजार छात्रों की प्रतिस्पर्धाएं, दस हजार युवकों का यूथ फेस्टिवल आदि-आदि अनेक रचनात्मक एवं सृजनात्मक कार्यक्रम आयोजित हुए थे। ऐसा ही महा उत्सव हाल ही में सूरत में आयोजित हुआ है। वे जहां भी जाते हैं आत्मकल्याण के साथ-साथ परोपकार एवं जनकल्याण के उपक्रम आयोजित करते हैं। रत्नसुंदरसूरिजी व्यक्ति नहीं, वे धर्म, दर्शन, कला, साहित्य और संस्कृति के प्रतिनिधि ऋषिपुरुष हैं। उनका संवाद, शैली, साहित्य, साधना, सोच, सपने और संकल्प सभी कुछ मानवीय मूल्यों के योगक्षेम से जुड़े हुए हैं। उन्होंने पद-प्रतिष्ठा पाने की न कभी चाह की और न कभी चरित्र को हासिए में डाला। केन्द्र में सदा साधुता रही और परिधि में उनका संघ, समाज, साहित्यसृजन और विश्व के हितों का चिंतन।

आचार्य विजय रत्नसुंदरसूरिजी का व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व आश्चर्यों की वनमाला से गुंथित है। यह अपने आप में आश्चर्य से कम नहीं है कि एक व्यक्ति 42 विषयों को 300 पुस्तकों में गुम्फित करके अपने संयममय जीवन को एक नया आयाम दिया है। उनके इर्द-गिर्द साहित्य की अनेक विधाएं प्रस्फुटित हुई हैं, फिर भी उन्हें संतोष नहीं है। वे इस क्षेत्र में और अधिक विकास देखना चाहते हैं। इसीलिए इस विकास यात्रा के हर पड़ाव पर वे अपनी साहित्यिक उपलब्धियों को महोत्सव का रूप देते हैं। केवल आयोजन उनका प्रयोजन नहीं है बल्कि वे ऐसे आयोजनों के माध्यम से नये समाज-आदर्श समाज के प्रकल्प को आकार देते हैं। वे सार्थक एवं जीवनोपयोगी साहित्य के माध्यम से जन-जन के कल्याण के लिए अग्रसर हैं। आपका भविष्य मानवता के अभ्युदय का उजला भविष्य है। उसी से जुड़ी है मानवीय एकता, पारिवारिक सौहार्द, सर्वधर्म समन्वय, सापेक्ष जीवनशैली की विकास की नई संभावनाएं। आपका संपूर्ण जीवन मानवीय मूल्यों का सुरक्षा प्रहरी है, इसलिए आप सबके लिए प्रणम्य है। आपके विचार जीवन का दर्शन है, प्रवचन भीतरी बदलाव की प्रेरणा है। संवाद जीने की सही सीख है। आपकी करुणा में सबके साथ सहअस्तित्व का भाव है।

हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कभी कहा था कि जो साहित्य मनुष्य को दुर्गति, हीनता और परमुखापेक्षिता से न बचा सके, जो उसकी आत्मा को तेजोदीप्त न बना सके, हृदय को परदु:खकातर और संवेदनशील न बना सके, उसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता है।’’ द्विवेदी की ये पंक्तियां साहित्य की कसौटियों को समग्र रूप से हमारे सामने प्रस्तुत करती हैं। इसी स्वरूप को और जीवंतता देते हुए आचार्य रत्नसुंदरसूरिजी का साहित्य इन सभी विशेषताओं को अपने भीतर समेटे हुए हैं। उनके साहित्य का हर पृष्ठ बोलता है कि उनकी विचारधारा एक अहिंसक क्रांतिकारी की विचारधारा है।

आचार्य विजय रत्नसुंदरसूरिजी के पुरुषार्थ ने उन लोगों को जगाया जो सुखवाद और सुविधावाद के आदि बन गये हैं और सम्बोध दिया है उन लोगों को जो जीवन के महत्वपूर्ण कार्यों को कल पर छोड़ देने की मानसिकता से घिरे हैं जबकि जीवन का सिर्फ सच यही क्षण है। वर्तमान में सबकी नजरें उन जैसे आत्मचेत्ता महापुरुषों पर लगी है। क्योंकि वे तनाव की भीड़ में शांति का संदेश है। अशांत मन के लिए समाधि का नाद हैं। चंचल चित्त के लिए एकाग्रता की प्रेरणा हैं। विचारों के द्वैत में सापेक्ष दृष्टिकोण है। संघर्ष के क्षणों में संतुलन का उपदेश है। वे एक ऐसी चेतना है जो स्वयं जागृत है और सबके भीतर सत्य और ज्ञान का आलोक फैलाने के प्रयास में लगे हैं। हम सब उनकी आचारनिष्ठा, नीतिनिष्ठा, अध्यात्मनिष्ठा, साहित्यनिष्ठा को प्रणाम करते हैं।

 ललित गर्ग

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