ब्रेकिंग न्यूज़ 

महाराष्ट्र में फिर दलित बनाम मराठा

महाराष्ट्र में फिर दलित बनाम मराठा

महाराष्ट्र के अहमदनगर  जिले के कोपर्डी गांव में एक किशोरी 14 जुलाई को अपने दादा-दादी को देखने गई और लौटी ही नहीं। बाद में गांव के एक खेत में उसका शव मिला। बलात्कार के बाद उसकी गला घोंटकर हत्या कर दी गई थी। वह एक मराठा थी और बलात्कार और हत्या के आरोपी दलित हैं। चार में से तीन पुलिस हिरासत में हैं। यह घटना कुछ समय तक सुर्खियों में रही लेकिन बाद में मीडिया इसे भूल ही गया। मराठा समाज  के सोशल मीडिया और व्हाट्सअप समूहों में सवाल उठने लगे अगर यही वाकया किसी दलित के साथ होता और आरोपी सवर्ण होते तो क्या इस मामले में ऐसी उदासीन प्रतिक्रिया होती? इसके साथ मराठाओं में सुलगने लगी आक्रोश की चिंगारी। यह आक्रोश बहुत बड़े पैमाने पर और सुनियोजित तरीके से उभर कर आने लगा। राज्य के शहरों में लाखों की संख्यावाले शांतिपूर्ण और मूक प्रदर्शन होने लगे। अभी कई शहरों में प्रदर्शन होनेवाले हैं। आखिरी प्रदर्शन मुंबई में होगा जिसमें पच्चीस से पच्चास लाख मराठाओं के आने का अनुमान लगाया जा रहा है।

इन प्रदर्शनों से मराठा समाज का गुस्सा तो स्पष्ट है। लेकिन इनको लेकर राजनीतिक हल्कों में रहस्य बना हुआ है। लाखों की संख्यावाले प्रदर्शन न केवल शांतिपूर्ण हैं वरन अराजनीतिक हैं। लोग अनुमान लगा रहे हैं कि इन्हें किसने आयोजित किया। इन प्रदर्शनकारियों की तीन मांगे हैं। पहला कोपर्डी बलात्कार के आरोपियों को फांसी की सजा हो। दूसरा एट्रोसिटी एक्ट में बदलाव हो और मराठाओं को आरक्षण दिया जाए। अगस्त में मराठवाड़ा जिले के उस्मानाबाद में 25,000 मराठा लोगों की रैली हुई। इस जमावड़े की खास बात यह थी कि इसे कोई राजनैतिक संरक्षण हासिल नहीं था। किसी नेता ने वहां भाषण नहीं दिया। लोगों ने शांति से मार्च किया जो आगे चलकर एक रैली में तब्दील हो गया।

कुछ दिन बाद ऐसी ही एक रैली मराठवाड़ा के ही बीड़ इलाके में  आयोजित की गई। यहां 50,000 लोग एकत्रित हुए। इसके बाद परभणी में एक लाख लोग आए। अब मराठा समूह महाराष्ट्र के हर जिले के हर बड़े शहर में ऐसी रैलियां आयोजित करने की योजना बना रहे हैं।

इस मसले पर जहां दलित कार्यकर्ता समूह खामोशी ओढ़े हुए हैं, मराठाओं की तीन मांगों में से दो मांगे दलितों को लेकर है। एक बलात्कार करने वाले आरोपियों को फांसी हो और दूसरा एट्रोसिटी कानून में बदलाव हो। महाराष्ट्र में दलितों की आबादी मुखर और एक हद तक हठधर्मी है। वर्षों के दमन और सक्रियता ने दलितों को सिखा दिया है कि अपने पक्ष में चीजों का प्रयोग कैसे करना है। एट्रोसिटी एक्ट राष्ट्रीय अधिनियम है जो दलितों के खिलाफ कदम को संज्ञेय अपराध बनाता है। इसके तहत अगर कोई गैर-दलित किसी दलित की काम के दौरान कटु आलोचना भी करता है तो वह उस व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा सकता है और पुलिस उसे पकड़कर बंद कर देगी। मराठाओं का कहना है कि राज्य में ऐसी दुर्भावनापूर्ण रिपोर्ट बड़ी संख्या में होती हैं। इस कानून का प्रयोग ब्लैकमेल करने, उगाही करने और ऐसे ही अन्य वजहों से किया जाता है। लेकिन दलितों का इस बारे में अलग ही कहना है। वे कहते हैं वे एट्रोसिटी का दुरूपयोग तब होगा जब पहले उसका उपयोग हो हकीकत यह है कि राज्य प्रशासन पर अब भी सवर्ण हावी है एट्रोसिटी एक्ट लागू ही नहीं होने देते। दलित बलात्कारियों को फांसी को लेकर प्रदर्शन किए  जाने के खिलाफ नहीं हैं। उनका कहना हंै कि यह अधिकार बाबा साहब के संविधान ने लोगों को दिया है। लेकिन वे यह नहीं समझ पा रहे कि बलात्कार के मामले और एट्रोसिटी में बदलाव का क्या ताल्लुक है।

दलितों के खिलाफ शुरू हुआ यह आंदोलन अब आरक्षण की मांग पर आ पहुंचा है। राज्य की पिछले 50 वर्षों से सामाजिक -आर्थिक और राजनीतिक सत्ता पर एकछत्र रूप से  हावी रही  मराठा जाति में पिछले कुछ वर्षों से आरक्षण की मांग जोर पकड़े हुए हैं। महाराष्ट्र में लोकसभा चुनावों में सत्तारूढ कांग्रेस -राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के गठबंधन की हार  के बाद विधानसभा चुनावों में भी इस गठबंधन की हार को पक्का माना जा रहा था। इसे टालने के लिए गठबंधन की सरकार ने तरुप का पत्ता खेलते हुए मराठाओं को 16 प्रतिशत और मुस्लिमों को 4 प्रतिशत आरक्षण दे दिया। मराठा आरक्षण एक तरह से आरक्षण की अवधारणा को सिर के बल खड़ा कर देना था क्योंकि मराठा वह जाति है जो राज्य की प्रभुत्ववाली जाति है। राजनीतिक, आर्थिक तौर पर शक्तिसंपन्न हैं।

एक समय जातियों में अपने को ऊंची जाति का बताने की होड़ थी। आरक्षण ने इस प्रवृत्ति को बदल दिया अब फारवर्ड जातियों  में अपने को पिछड़ा साबित करने की होड़ लगी हुई  है। कभी  मराठा जाति के लोग अपने को क्षत्रिय कहते थे। आज वे अपने को पिछड़ा साबित करने में लगे हैं। यहां आप को बता दें। हमें मराठा जाति और मराठी माणूस में घालमेल नहीं करना चाहिए। मराठा वैसी ही जाति है  जैसी पंजाब में और हरियाणा में जाट है जो राजनीतिक और आर्थिक रूप से ताकतवर है। मराठा जाति राज्य की 35 प्रतिशत आबादी होने के कारण राज्य की राजनीति पर हावी है। बहुसंख्य विधायक इसी जाति के हैं। यह जाति आज महाराष्ट्र की सत्तारूढ जाति है ज्यादातर मुख्यमंत्री और मंत्री  इसी जाति के रहे है। आर्थिक रूप से भी यह जाति सशक्त हैं शक्कर कारखाने, कोपरेटीव, कोपरेटीव बैंक, शिक्षा संस्थाएं जो महाराष्ट्र की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं उन पर इस जाति का ही कब्जा है। पिछले कुछ वर्षों से मराठा संगठन आरक्षण के लिए आंदोलन चला रहे राज्य सरकार ने उन्हें आरक्षण दे भी दिया। मगर अदालत ने उसे खारिज कर दिया। अब मामला सुप्रीम कोर्ट में है।

06-11-2016हालांकि इस आंदोलन का नेतृत्व न तो बड़ा मराठा नेता कर रहा है और न ही कोई राजनीतिक पार्टी। रणनीति के तहत मराठा समुदाय के लोग एक योजनाबद्ध तरीके से सड़कों पर उतर रहे हैं जिनमें युवा, महिलाएं और युवतियां खासतौर से शामिल हो रही हैं। एट्रोसिटी रद्द करने की मांग से शुरू हुए इस आंदोलन के इस मंच का उपयोग मराठा आरक्षण की मांग के लिए भी किया जाने लगा है। यही वजह है कि राजनीति के जानकार मराठा आंदोलन की तुलना गुजरात के पटेल आंदोलन से करने लगे हैं। बताया जाता है कि मराठा आंदोलन का नेतृत्व पटेल आंदोलन चलाने वाले हार्दिक पटेल जैसा युवा नहीं बल्कि रिटायर्ड पूर्व आईएएस निर्मल देशमुख कर रहे हैं।

महाराष्ट्र सरकार की ओर से प्रतिक्रिया मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के बयान के रूप में आई है जिसमें उन्होंने मार्च को शांतिपूर्ण बनाए रखने के लिए आयोजकों का धन्यवाद किया है। मराठा आरक्षण पर बनी कमेटी के संयोजक और शिक्षा मंत्री विनोद तावड़े ने कहा कि ये मोर्चे राजनीतिक नहीं है। ये प्रदर्शन सामाजिक मुद्दों को लेकर हो रहे हैं। आप इनमें एक भी नेता को नहीं देख पाएंगे। राज्य सरकार ने उनकी मांगों पर संज्ञान लिया है और हमारी सरकार इस पर काम कर रही है।

सवाल ये भी है कि मराठा आंदोलन का महाराष्ट्र की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा। क्या ये आंदोलन फडणवीस सरकार के लिए खतरे की घंटी है कहीं इस आंदोलन की वजह से मराठा और दलितों में संघर्ष तो नहीं खड़ा हो जाएगा। ये सवाल अब राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है, क्योंकि सभी पार्टी के मराठा नेता इन मोचार्ओं को सहायता कर रहे हैं। कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि इस आंदोलन की वजह से मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को घेरने का मौका उनकी पार्टी के भीतर के और बाहर के दोनों विरोधियों को मिल रहा है। महाराष्ट्र में देवेंद्र फडनवीस के ब्राह्मण मुख्यमंत्री होने पर सबसे पहले शरद पवार की उस चुटकी पर विवाद खड़ा हो गया था, जो उन्होंने कोल्हापुर के संभाजी महाराज को बीजेपी ने राज्यसभा में लेने पर की थी। महाराष्ट्र में अगले साल स्थानीय निकायों के चुनाव होने वाले हैं, जिसे मिनी विधानसभा चुनाव के तौर पर देखा जाता है, राजनीतिज्ञ मान रहे हैं कि इन आंदोलनों का इस्तेमाल उन चुनाव के लिए जमीन तैयार करने के लिए किया जा रहा है।

मराठवाड़ा मे दलित और मराठा संघर्ष का इतिहास रहा है, मराठवाड़ा विश्वविद्यालय के नामांतर के वक्त ये संघर्ष पूरे महाराष्ट्र ने देखा था। अब मराठा आंदोलन की एक मांग एट्रॉसीटी रद्द करने की हैं, जिसकी वजह से अब कुछ दलित नेता इसका विरोध कर रहे हैं।

कुछ दलित संगठनो ने इस मांग के खिलाफ प्रदर्शन करने की तैयारी शुरु की थी मगर दलित नेताओं ने उन्हें समझाया कि अभी तक मराठा आंदोलन दलितों के खिलाफ नहीं है इसलिए उन्हें जवाबी रैली निकालने के चक्कर में नहीं रहना चाहिए। लेकिन एक बात तो साफ है की लाखों मराठाओं के सड़क पर उतरने से महाराष्ट्र की राजनीति में एक नया भूचाल आ गया है और इस पर अब सबकी नजरें टिकी हैं। जाहिर सी बात है कि एक समाज का असंतोष जब इतने बड़े पैमाने पर सड़क पर आएगा तो उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मामला जातिगत होने के कारण बहुत संवेदनशील है। कभी भी गंभीर रूप ले सकता है। इस पर भाजपा ने गलती यह की है कि मराठा वर्चस्व वाले इस राज्य में एक ब्राहमण को मुख्यमंत्री बना दिया है। यह बात मराठाओं को रास नहीं आ रही। इसलिए देवेंद्र फडनवीस की डगर आसान नहीं है।

 सतीश पेडणेकर

101otzyv.ruСезонность

Leave a Reply

Your email address will not be published.