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जावड़ेकर बनाम  शिक्षा माफिया

जावड़ेकर बनाम  शिक्षा माफिया

इसमें कोई संदेह नहीं कि देश को प्रकाश जावड़ेकर के रूप में एक अनुभवी और ऊर्जावान शिक्षा (या मानव संसाधन विकास) मंत्री मिला है। उन्होंने हमें बताया कि वे देश में गुणवत्तापरक शिक्षा के प्रसार के लिए प्रतिबद्ध हैं। वैसे, जितना जल्दी अपने इस संकल्प पर काम शुरू करें, उतना ही बेहतर है। आखिरकार, बेहद दुखद हकीकत यही है कि दुनिया के टॉप 200 विश्वविद्यालयों में एक भी भारतीय विश्वविद्यालय या शिक्षा संस्था नहीं है। शिक्षा संस्थानों की वैश्विक रैंकिंग में सबसे ऊंचा स्थान पाने वाला इकलौता बेंगलूरू का भारतीय विज्ञान संस्थान (आइआइएससी) ही है। उसे एक ताजा सर्वेक्षण (टाइम्स हायर एजुकेशन) में आइआइएससी को बेहतरीन विश्वविद्यालयों की 201 से 250 के वर्ग में स्थान मिला। उसके बाद आइआइटी बांबे को  351-400 के वर्ग में जगह मिली। यहाँ यह बताना जरूरी है कि टाइम्स हायर एजुकेशन पहले 200 विश्वविद्यालयों की रैंकिंग के लिए कोई एक वर्ग नहीं, बल्कि 50 के वर्ग में आंकता है।

बदतर तो यह है कि देश में स्कूली शिक्षा के गिरते स्तर से उच्चतर शिक्षा की गुणवत्ता का मामला और गंभीर हो गया है। कई सर्वेक्षणों से जाहिर होता है कि कई स्कूली छात्र तीन शुद्ध वाक्य लिखने या गणित के बुनियादी सवालों को  हल करने में सक्षम नहीं हैं। और स्कूलों की संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है। हालत यह है कि स्कूल का भवन  तो है पर अध्यापक नहीं हैं। बच्चें परीक्षा में चाहे जितने नंबर लाएं, वे बेरोकटोक ऊपरी कक्षा में पहुंच जाते हैं। जब ऐसे छात्र कॉलेज और विश्वविद्यालयों में पहुंचेंगे तो शिक्षा का स्तर स्वाभाविक रूप से गिरेगा ही।

देश में भी ऐसा राजनैतिक माहौल है जिसमें ”पहचान की राजनीति’’ की प्रधानता है, ”सशक्तीकरण की राजनीति’’ की नहीं। हम रोज-ब-रोज सरकारी शिक्षा संस्थानों में ही नहीं, निजी संस्थानों में भी आरक्षण की मांग तेज होते देखते हैं। इस व्यवस्था के तहत 30-40 प्रतिशत अंक लाने वाले डॉक्टर, इंजीनियर, प्रशासनिक अधिकारी और शिक्षक बन जाते हैं जबकि 60-80 प्रतिशत अंक लाने वाले (मान लेते हैं कि 80-90 प्रतिशत और उससे अधिक अंक लाने वाले मौजूदा व्यवस्था के बावजूद ऊपर पहुंच जाते हैं) निजी संस्थानों में या विदेश जाकर न पढें तो उच्चतर शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। यह सरकारी दावा विचित्र है कि सीटें बढ़ा दी गई हैं इसलिए कोई वंचित नहीं रह जाएगा, जबकि बढ़ाई हर 10 सीट में 7 सीट आरक्षण के कोटे में चली जाती है।

कहने का मतलब यह नहीं है कि आरक्षण की व्यवस्था या सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर तबके की मदद के उपायों को हटा देना चाहिए। सवाल यह है कि हमें ऐसे उपायों पर गंभीरता से सोचना चाहिए, जिसके तहत समाज में वंचित तबकों का उत्थान भी हो सके और गुणवत्ता से समझौता भी न हो सके और प्रतिभावान छात्र सिर्फ इसलिए प्रताडि़त न हों कि वे किसी तथाकथित जाति से हैं। मेरी राय में जावडेकर के सामने यही चुनौती सबसे बड़ी है।

जावड़ेकर की चुनौती इस तथ्य से और बड़ी हो जाती है कि उनके द्वारा सुझाए गए किसी भी सुधार का देश में जनमत तैयार करने वालों की ओर से भारी विरोध झेलना पड़ेगा। इनमें ज्यादातर अकादमिक विद्वान, कलाकार, पत्रकार और स्तंभकार हैं जो नेहरूवादी मानसिकता या तंत्र से जुड़े हैं जो अमूमन ”वाम/उदार/सेकुलर’’ धाराओं के हैं। ये प्रधानमंत्री मोदी, भाजपा या वैकल्पिक नजरिया रखने वाले हर किसी से घोर नफरत करते हैं। उनकी सोची-समझी राय है कि मोदी के राज में असहमति के प्रति असहिष्णुता बढ़ती जा रही है। हालांकि सच्चाई यह है कि वे खुद देश में सबसे असहिष्णु लोग हैं।

हमने देखा है कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के अध्यापक और छात्र, खासकर जो माओवादी और उग्र वाम धाराओं में यकीन करते हैं, किसी न किसी बहाने मोदी सरकार के खिलाफ जंग का मोर्चा खोले हुए हैं। उनका मानना है कि मोदी शिक्षा का ”भगवाकरण’’ कर रहे हैं, जिसे वे हमेशा ”लाल’’ रंग में देखना चाहते हैं। उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि ऑक्सफोर्ड और कैंबरिज जैसे दूनिया के आला विश्वविद्यालयों में भारतीय संस्कृति की पढ़ाई चल रही है। वहां ”हिंदू संस्कृति, धर्म, वेदांत, व्याकरण और संस्कृति दर्शन के साथ बौद्ध दर्शन, भाषा, साहित्य, दर्शन, इतिहास, कला और हर दौर के समाज’’ का अध्ययन चल रहा है। इन असंतुष्टों को दूसरी राय सुनने की फुर्सत नहीं है।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का मामला ही लें। वहां शिक्षकों और छात्रों का प्रभावी समूह अगले आयोजन में प्रधानमंत्री मोदी को कैंपस में बुलाने के लिए वीसी लेफ्टिनेंट जनरल जमीरूद्दीन शाह के खिलाफ आग उगल रहा है। एएमयू शिक्षक संघ के सचिव प्रोफेसर मुस्तफा जैदा के मुताबिक, ”मोदी ने अभी तक मुस्लिम समुदाय को भरोसा नहीं दिलाया है। विश्वविद्यालय अभी तक उन्हीं को बुलाता रहा है जिनका अकादमिक क्षेत्र में कोई योगदान हो। मोदी का ऐसा कोई योगदान नहीं है। इसके अलावा यहां प्रधानमंत्री को बुलाने की कोई परंपरा नहीं रही है। जवाहरलाल नेहरू के अलावा कोई प्रधानमंत्री यहां नहीं आया। इसलिए मोदी को बुलाने की कोई वजह नहीं दिखती।’’

यही मामला दूसरे विश्वविद्यालय जामिया मिलिया इस्लामिया का है। वहां सालाना आयोजन में मोदी को बुलाने के फैसले का छात्रों और शिक्षकों की प्रभावी बिरादरी भारी विरोध कर रही है। ये नहीं चाहते कि मोदी कैंपस में आएं क्योंकि 2008 में उन्होंने बाटला हाउस मुठभेड़ के सिलसिले में जुड़े कुछ छात्रों के कानूनी बचाव का खर्च विश्वविद्यालय द्वारा उठाने का विरोध किया था।

अब जरा सोचिए दो महत्वपूर्ण विश्वविद्यालयों (एएमयू और जामिया), जो पूरी तरह केंद्र के पैसे से चलते हैं, कह रहे हैं कि देश का प्रधानमंत्री उनके लिए कोई मायने नहीं रखता। उनके लिए मोदी सरकार को उनकी हर मांग मान लेनी चाहिए। कितनी छात्रवृत्ति उन्हे चाहिए, विश्वविद्यालय के इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के लिए कितनी रकम की दरकार है, वे क्या पढ़ाएं और क्या न पढ़ाएं, सब उनकी मर्जी से होना चाहिए। लेकिन वे मोदी का चेहरा देखना नहीं चाहते। दूसरे शब्दों में कहें तो मतलब यह है कि उन्हें पूरा अधिकार है कि मोदी उन्हें सुनें, उनकी हर मांग मान लें, वरना उन्हें मीडिया की सुनियोजित योजना के मुताबिक असहिष्णु बना दिया जाएगा। लेकिन वे मोदी के प्रति सहिष्णु नहीं हो पाएंगे। उन्हें नहीं सुनेंगे।

दरअसल भारत के शिक्षा तंत्र में बढ़ते माफिया राज की चर्चा बहुत कम हुई है। यह राज चाहता है कि हर संस्थान का पद उसे ही मिले जो उसके दर्शन का हो। अगर आप इसके प्रमुख लोगों से सहमत नहीं हैं तो आपको कहीं नौकरी नहीं मिलेगी। अगर आप उनसे सहमत हैं तो वे आपके लिए वह भी करेंगे जो गैर-कानूनी और अनैतिक है। यह इस कदर होता है कि जेएनयू और डीयू की रिक्तियों में इनके अपने  स्थायी प्रोफेसर ही आवेदन करते हैं। वे चुन लिए जाते हैं और अपने पूर्व पद से इस्तीफा देने से इनकार कर देते हैं। इसके बदले वे डेपुटेशन पर चले जाते हैं दोनों जगह के भत्तों का लाभ उठाते हैं। चुनने वाले भी इन्हीं दोनों विश्वविद्यालयों से होते हैं और अमूमन एक ही समूह से जुड़े होते हैं। वे इस अजीब व्यवस्था को चलने देते हैं। ये वही  नाम हैं जिनकी बौद्धिक जगत में धाक है। उनके पास नया कुछ कहने को नहीं है लेकिन वे किसी और को कुछ नया कहने या करने नहीं देंगे।

जब मैं यह लिख रहा हूं, भारतीय अंतरराष्ट्रीय केंद्र के तिमाही प्रकाशन का शरद 2015-वसंत 2016 का अंक आया है। यह वाम-उदार धारा के दिगी के बौद्धिकों का सबसे सशक्त अभिव्यक्ति स्थल है। यह अंक ‘शिक्षा’’ पर है। जरा सोचिए इसमें क्या लिख है। ”आभिजात्य’’ शिक्षा संस्थानों (हमारे ज्यादातर विश्वविद्यालयों) में सवर्णों का बोलबाला है, शिक्षकों को क्लास लेने और शोध पत्र प्रकाशित करने के लिए कोई नियम-कायदा नहीं होना चाहिए क्योंकि इससे रचनात्मकता टूटती है, निजी विश्वविद्यालयों को बंद कर देना चाहिए, विदेशी विश्वविद्यालयों को आने की इजाजत नहीं देनी चाहिए, कारोबारियों से सिर्फ दान लिया जाना चाहिए, सरकार का काम फंड मुहैया करना है लेकिन जवाबदेही की मांग करना नहीं, ”राष्ट्रवाद’’ और ”सांस्कृतिक मूल्यों’’ की बात करने वालों को दरवाजा दिखा देना चाहिए, वगैरह।

यह चाहे जितना विचित्र लगे लेकिन देश के शिक्षा तंत्र में ऊंचे पदों पर बैठे ज्यादातर ”वाम-सेकूलर’’ लोग एनडीए-1 (1998-2004) के राज में बने रहे। भगवाकरण के आरोपों के बावजूद एक भी भगवा खेमे का व्यक्ति किसी केंद्रीय विश्वविद्यालय में वीसी नहीं बनाया जा सका है। डीयू, जेएनयू, एएमयू और जामिया में एनडीए-1 के दौरान वाम और सेकूलर तत्व ही जमे रहे। जाहिर है, यह ताकतवर माफिया एनडीए-2 में भी वही राज चाहता है।

मुझे शंका है कि वे और संसद में मौजूद विपक्षी पार्टियों में उनके समर्थक जावड़ेकर को शिक्षा के क्षेत्र में जरूरी सुधार करने देंगे। वाकई मुझे उन पर दया आती है।

प्रकाश नंदा

обслуживание мфустоматология в поликлинике

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