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सपा की साइकिल फिर पटरी पर?

सपा की साइकिल फिर पटरी पर?

यूपी में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी या कहें मुलायम सिंह यादव के समाजवादी कुनबे में शुरू हुई महाभारत फि लहाल थम गई है लेकिन यकीन के साथ यह कहना कि ‘युद्ध खत्म हो गया’ जल्दबाजी होगी। ऐसा इसलिए भी कि स्वयं मुलायम सिंह यादव कि मौजूदा परिस्थितियां यह साफ नहीं कह रही हैं कि युद्ध खत्म हो गया है। हालांकि सपा अध्यक्ष जोर देकर कह रहे हैं कि अब हमारे परिवार में कोई विवाद नहीं रह गया है। सब कुछ दुरूस्त हो गया है। लेकिन महाभारत के दौरान घायल महारथियों के बारे में जब तक किसी दो टूक निर्णय की घोषणा नहीं हो जाती, तो कैसे मान लिया जाय कि ‘सब कुछ सामान्य’ हो गया है। ‘देखिए इधर  कुछ दिनों से जो शीत युद्ध चल रहा था और बाद में जिसकी परिणति खुले तौर पर आम जनता के सामने भी हुई, उसके बाद अचानक स्नेह की गंगा बहने लगे, यह स्वाभाविक नहीं लगता। हां, काफी कुछ सहमति बन गयी है, धीरे-धीरे स्नेह की धारा भी बहेगी, यह मानकर चलिए। अभी नेता जी का इतना सम्मान है कि परिवार के किसी भी सदस्य मे इतना दम नहीं है जो उनकी अवमानना करके अपना रास्ता अलग बना ले। इसलिए रास्ता तो उन्हीं का बताया होगा, चाहे लोग खुशी से उस पर चलें या नाखुशी से,’ कहते हैं पूर्वांचल से लखनऊ आये एक पूर्व सपा विधायक। इस बात में दम भी है। इसकी तसदीक पार्टी के उ.प्र. के अध्यक्ष और विवाद में एक पक्ष रहे शिवपाल सिंह के इस कथन से भी होती है- ‘सब कुछ ठीक है। अब किसी तरह का विवाद पार्टी में नहीं रह गया है। नेता जी जैसा चाहेंगे, वैसा ही होगा।’ इतना ही नहीं बल्कि अपने लोगों को भी उन्होंने आश्वास्त किया कि – ‘नेता जी का जो आदेश है, मैं वैसा ही करूंगा।’ यानी शिवपाल सिंह को समझौते में घाटा भी होगा तो भी उसे वे स्वीकार करेंगे। यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है।

उधर दूसरे पक्ष से मुख्यमंत्री अखिलेश यादव एक दिन पहले यह स्पष्ट कह चुके हैं कि ‘मुझे नेता जी कहेंगे तो मैं मुख्यमंत्री पद छोड़ दूंगा।’ यानी दोनों पक्ष मुलायम सिंह यादव के ‘आदेश’ को मानने को तैयार हैं। अत: कहा जा सकता है कि मुलायम सिंह के कुनबे की महाभारत खत्म हो गई है। उम्मीद की जानी चाहिए कि देश के सबसे महत्वपूर्ण सियासी सूबे में ऐन चुनाव के मौके पर आया तूफान ठंडा हो गया है।

इसे बिडम्बना ही कहा जायेगा कि भारी बहुमत से सत्ता में आयी समाजवादी पार्टी की सरकार के मुखिया की अच्छी छवि और विकास कार्यो के बावजूद जब चुनाव में जाने का मौका आया तो पार्टी के भीतर आपस में ही घमासान शुरू हो गया। चुनाव मैदान में जाकर अपनी उपलब्धियों को जनता के सामने रखने और इसके बदले उससे वोट का निवेदन करने का वक्त आया तो सपा के महारथी आपस में ही जूझने लगे। एक ओर मुलायम सिंह के पुत्र और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और दूसरी ओर मुलायम के अनुज शिवपाल यादव दोनों एक दूसरे पर वार करने लगे तो पूरी सपा सेना दो हिस्सों में बंट गयी। विपक्षियों पर आक्रमण की बजाय, आपस में ही वार किये जाने लगे। इसलिए समाजवादी पार्टी के मुखिया ‘नेता जी’ के सामने अजीब संकट आ गया। अपने राजनीतिक दांवा-पेच के लिए सुविख्यात मुलायम सिंह के लिए कुनबे का यह संकट बहुत बड़ा और जटिल रहा। लेकिन वे अंतत: इस संकट का समाधान खोजने में सफल हुए। पुत्र और भाई को बैठाकर उन्होंने यह समझाया कि आपसी कलह और लड़ाई से बड़ी-बड़ी सल्तनतें और सत्ताएं तबाह हो गयी हैं, इसलिए इससे बचों और चुनाव मैदान में जाओ। पहले चुनाव जीतो। यदि बहुमत की सरकार बनी तो बाकी चीजें भी हल हो जायेंगी। फिलहाल इसी बात पर सहमति बनी, ऐसा कहा जा रहा है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि मुलायम सिंह ने अखिलेश को नसीहतें दीं और लोकधर्म समझाया। बात शायद अखिलेश की समझ में आ गयी और अंतत: वे पिता की बात मानकर चाचा के गले मिले और उनके पैर छुए। चाचा ने भी उन्हें आशीर्वाद देकर गले लगाया।

06-11-2016

महाभारत का वृतांत तो फि लहाल अपनी जगह है लेकिन राजनीतिक यथार्थ उतना सहज नहीं है। दरअसल मुलायम सिंह यादव समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष हैं जिनका जनाधार मध्यवर्गीय जातियों का समूह है। इन जातियों का व्यवसाय कृषि आधारित व्यवसाय, यथा-खेती, दुग्ध व्यवसाय छोटी-मोटी दुकानदारी या खेतिहर मजदूरी है। मुलायम सिंह यादव से जुड़ाव के पीछे इसकी वैचारिक प्रतिबद्धता उतनी नहीं है जितनी जातीय और भावनात्मक एकता। इसी कारण उनके मुख्यमंत्रितत्व काल को लोग ‘सरकार के कार्य’ या सरकार की उपलब्धियों के आधार पर विश्लेषित करने के बजाय सेंटीमेंट के आधार पर विश्लेषित करते रहे हैं। लेकिन अखिलेश यादव के साढ़े चार वर्ष के कार्यकाल को उनके मतदाताओं ने भी ‘विकास कार्यो’ के आधार पर देखा। ऐसा स्वयं मुख्यमंत्री ने भी चाहा और जनता को यह अच्छा लगा। इसी वजह से न केवल पिछड़े वर्ग के लोगों ने बल्कि सामान्य वर्ग की जनता की नजरों में भी अखिलेश साफ सुथरी छवि वाले और काम करने वाले मुख्यमंत्री के रूप में देखे गये। यह महत्वपूर्ण तथ्य रेखांकित करने लायक है कि अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री की कुर्सी भले ही पिता मुलायम सिंह यादव की कृपा से मिली लेकिन उसे सहेजने और अपने को उस पर बैठने लायक सिद्ध करने में उन्होने कोई कसर नहीं छोड़ी। मुख्यमंत्री के साथ ही पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष होने के कारण उन्हें अपनी युवा ब्रिगेड बनाने का अवसर भी मिला। युवाओं ने मुख्यमंत्री का हौसला बढ़ाया और भरपूर ऊर्जा दी। इस ऊर्जा से लबरेज अखिलेश ने प्रदेश की ‘शेष जनता’ का विश्वास भी जीता और एक ‘भले मुख्यमंत्री के रूप में अपनी छवि बनायी। हालांकि मुलायम सिंह ने मुख्यमंत्री के रूप में उनकी क्षमताओं पर कई बार सवाल उठाये लेकिन यह शायद एक बेटे को और अधिक ‘शॉर्प’ बनाने की एक पिता की ‘सदिच्छा’ ही कही जायेगी। इस मामले में यह बताना जरूरी है कि मुलायम सिंह की नसीहतों की बहुलता को जनता ने भी उनकी ज्यादती के रूप में देखा। बी. एच. यू. के समाजशास्त्र के प्रो. सोहन राम यादव कहते हैं- जब एक युवा मुख्यमंत्री के हाथ में अपने प्रदेश की बागडोर थमा दी तो उस पर यकीन करके पूरा मौका भी देना चाहिए। उसे गाइड करना पार्टी के मुखिया के नाते आपका हक है लेकिन कदम-कदम पर सार्वजनिक हस्तक्षेप उसके कामकाज में हस्तक्षेप माना जायेगा। इससे उसे नाकाबिल बताने वालों को, बल मिलेगा। विरोधियों को उस पर आक्रमण का मौका मिलता है।’ और हुआ भी यही। इतना ही नहीं इससे सरकार के मुखिया का हौसला डिगने का खतरा पैदा होता है। साथ ही उसमें ‘विद्रोह की चिन्गारी सुलगने लगी है।’ कहते हैं प्रो साहन।


धन के बंटवारे की लड़ाई — मनोज सिन्हा


06-11-2016 उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी में मचे घमासान को विपक्षी दलों ने अलग तरह से लिया है। 25 अक्टूबर को एक कार्यक्रम में लखनऊ आये केन्द्रीय रेलवे राज्य मंत्री और संचार राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) मनोज सिन्हा से जब इस प्रकरण पर प्रतिक्रिया जाननी चाही तो उन्होने बोला: ‘कुछ नहीं भाई, यह धन के बंटवारे की लड़ाई है। इसे आप लोग क्यों नहीं समझते ।’

आप किस धन के बंटवारे की बात कर रहे हैं?

प्रदेश सरकार के पिछले साढ़े चार वर्षो में जो धन की लूट हुई है, उसके बंटवारे को लेकर यह जंग छिड़ी है। एक आदमी पूरी की पूरी रकम न हड़प ले, दूसरों को भी हिस्सा दे, इसके लिए लड़ाई है।

लेकिन इसके आरोप तो भाजपा पर भी लगाये जा रहे हैं। सार्वजनिक रूप से कहा गया कि सपा महासचिव राम गोपाल भाजपा के कहने पर यह सब कर रहे हैं।

भाजपा को यह सब करने की क्या पड़ी है। भाजपा के पास करने के लिए बहुत काम हैं। अपने घर को संभाल नहीं पा रहे, तो बेकार की बातें कर रहे हैं।


सार्वजनिक रूप से मुलायम सिंह द्वारा सरकार की आलोचना और कई बार सरकार तथा अफसरों पर मुख्यमंत्री की ढीली लगाम के वक्तव्य से अखिलेश को भी क्षोभ होने लगा। मंत्रियों और अधिकारियों को हटाने तथा फिर रखने के नेता जी के निर्देशों से वे कई बार आहत और अंतत: उद्धिग्न हो। 24 अक्टूबर को फूट पड़े। पार्टी की बैठक में उन्होंने कहा-‘नेता जी अपने जैसा कहा, मैंने वैसा किया। आपने मुख्यसचिव को हटाने को कहा, मैंने हटा दिया। फिर आपने रखने को कहा, मैने कहा, कर दूंगा। थोड़ा रूक जाइये। आपने प्रजापति (मंत्री) को हटाने को कहा, मैंने हटा दिया। फिर आपने रखने को कहा, मैंने वापस ला दिया।,…आखिर मुझसे क्या गलती हई? मुझे न्याय चाहिए…।’ पूरे प्रदेश के लोग चैनलों पर देख रहे थे। अत मुख्यमंत्री को न्याय की गुहार पर प्रदेश की जनता की सहानुभूति अखिलेश यादव के साथ दिखी। कहना न होगा कि इस पूरे प्रकरण में मुख्यमंत्री ने जनता की सहानुभूति भी जीती और शायद वे चुनाव में जनता (मतदाताओं) का समर्थन भी पायें। चुनाव में पार्टी बहुमत पाये, न पाये यह अलग बात है लेकिन जो भी समर्थन मिलेगा, वह अखिलेश का अपने बल पर जुटाया होगा। सपा सुप्रीमो तब शायद न कह पायें कि तुम्हें जानता कौन था या कि तुम मेरा बेटा होने के नाते मुख्यमंत्री हो।’ कहते हैं पूर्वी उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के सेहमलपुर के किसान गिरिजेश कुमार स्नातक हैं और सरकारी नौकरी छोड़ किसानी करते हैं। वे प्रगतिशील किसान हैं और युवा मुख्यमंत्री से काफी प्रभावित दिखे।

फिलहाल युवा किसान गिरिजेश यादव को हम प्रदेश की जनता का प्रतिनिधि न भी मानें तो भी इतना कहा जा सकता है कि पिछड़े वर्गों के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से खासे प्रभावित हैं। इसीलिए वे सपा के मौजूदा प्रकरण से आक्रोशित नजर आये। लखनऊ के हजरतगंज चौराहे के पास भाजपा कार्यालय के सामने मिले एक युवक ने अपना नाम तो नहीं बताया (कहा-मैं भाजपा कार्यकर्ता हूं। नाम नहीं बताऊंगा) लेकिन कहा-मैं सपा की नीतियों से सहमत नहीं हूं। अखिलेश युवा मुख्यमंत्री हैं। भले आदमी हैं। कुछ अच्छे काम किये हैं, इसलिए उनके अच्छे कामों का समर्थन करता हूं।

जो भी हो, प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव में सपा सत्ता में आयेगी या नहीं, यह कहना मुश्किल है लेकिन अभी के महाभारत ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की छवि को और अधिक निखारा ही है।

अमर सिंह अंकल से दलाल अंकल

कुनबे की लड़ाई में सपा सुप्रीमों के परमप्रिय और बाद में परम विरोधी से फिर प्रिय हुए अमर सिंह इस बार खलनायक के रूप में उभरे। पहले तो वे सिर्फ राम गोपाल जी के निशाने पर थे लेकिन इस बार तो नेता जी और शिवपाल सिंह को छोड़कर वे सबके लिए खलनायक हो गये। मुख्यमंत्री अखिलेश ने तो सार्वजनिक तौर पर उन्हें ‘दलाल अंकल’ कहा। उनके मुताबिक कुनबे के झगड़े की जड़ में अमर सिंह हैं। वे जबसे आये हैं परिवार से शांति गायब हो गयी है। शिवपाल सिंह और उनके बीच विवाद को हवा देने का काम भी अमर सिंह ने किया। यह सच है कि मुलायम सिंह का अमर के प्रति बड़ा ही साफ्ट कार्नर है। झगड़े की पंचायत 24 अक्टूबर की बैठक में नेता जी ने यहां तक कह दिया कि अमर सिंह मेरे भाई हैं। अमर सिंह को मैं नही छोड़ सकता। उन्होंने मुझे जेल जाने से बचाया है। नेता जी ने अखिलेश से एक तरह से (प्रकारांतर से) कह दिया कि तुम्हारे बिना रह सकता हूं अमर सिंह के बिना नहीं। इसलिए दोस्त और दुश्मन की पहचान करना सीखो।

06-11-2016

खलनायक, विदूषक और पराये

इस जंग में काफी कुछ हुआ। कुछ ज्यादा महत्वपूर्ण हो गये, कुछ अनावश्यक रूप से चर्चाओं में आ गये। कुछ खलनायक तो कुछ विदूषक बन गये। अखिलेश के साथ खड़ी उनकी युवा ब्रिगेड ज्यादा महत्वपूर्ण हुई तो ‘अंकल अमर सिंह’ नायक से दलाल अंकल हो गये। इसी तरह मंत्री गायत्री प्रजापति का रूपांतरण ‘विदूषक’ के रूप में हुआ। वे कभी मुख्यमंत्री के चरणों में लोटते दिखे तो कभी भगवान शिव (नेता जी) के नन्दी के रूप में अपने को पेश करने का आग्रह दिखाया। लेकिन सर्वाधिक त्रासद स्थिति प्रोफेसर राम गोपाल जी की दिख रही है। फिलहाल वे नेता जी की नजरों से उतर गये लगते हैं। कारण ‘उन्होंने मुलायम सिंह पर सीधे अटैक किया। इसे वे कैसे बर्दाश्त कर सकते थे,’ कहते हैं इटावा के एक अध्यापक जो 24 अक्टूबर को पंचायत का नजारा देखने लखनऊ आये थे। नाम न छापने की शर्त पर बताया-अभी तक प्रोफेसर नेता जी को बड़े भाई और गुरू कहते थे, अब सीधे मुलायम सिंह कहने लगे हैं।

 लखनऊ से सियाराम यादव

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