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हमारा उद्देश्य है सबको शिक्षा, अच्छी शिक्षा   –प्रकाश जावड़ेकर

हमारा उद्देश्य है सबको शिक्षा, अच्छी शिक्षा   –प्रकाश जावड़ेकर

किसी देश और खासकर हमारे देश की शिक्षा के पांच मूल स्तंभ हैं: उपलब्धता, समता, गुणवत्ता, किफायती और जवाबदेही। इन्हीं स्तंभों पर हमारी नई शिक्षा नीति आधारित होगी,’’ कहते हैं प्रकाश जावड़ेकर, केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री, प्रकाश नंदा और दीपक कुमार रथ को दिए विशेष साक्षात्कार में। प्रस्तुत है साक्षात्कार के प्रमुख अंश:-

 

शिक्षा के मामले में गुणवत्ता मुख्य समस्या बनती जा रही है क्योंकि दुनिया की टॉप २00 विश्वविद्यालयों में हम कहीं नहीं हैं। सरकार ने मेक इन इंडिया जैसे कई कार्यक्रमों को शुरू किया है, जो गुणवत्ता की ही मांग करता है, वहां अधिक मात्रा का कोई मतलब नहीं रह जाता। क्या इसका आकलन हुआ है कि समस्या कितनी बड़ी है?

नहीं, अधिक मात्रा का भी महत्व है। जब अंग्रेजों ने आधुनिक शिक्षा शुरू की थी तो उनका मकसद सबको शिक्षित करना नहीं था। उनका मकसद था इस देश में अपने राज को बनाए रखने के लिए जरूरी कार्यबल तैयार करना। इसलिए आजादी के आंदोलन के दौरान गांधी जी से लेकर गोखले, आंबेडकर तक सभी कांग्रेस नेता और हर कोई शिक्षा में रुचि लेने लगा और वह राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन जैसा बन गया। इसलिए शिक्षा का विस्तार अंग्रेजों के हक में नहीं था। आजादी के बाद हमने इसका विस्तार शुरू किया और 70 साल में देश के हर कोने में शिक्षा पहुंचाई जा सकी है और अब बच्चों का दाखिला 98-99 प्रतिशत तक हो गया है, जो अच्छी बात है। इसलिए विस्तार जरूरी है क्योंकि सभी की शिक्षा तक पहुंच होनी चाहिए। मेरे 5 जुलाई को मानव संसाधन विकास मंत्रालय संभालते ही सभी मुख्यमंत्रियों की अंतर राज्य परिषद की बैठक हुई। इसे प्रधानमंत्री ने दस साल के अंतराल के बाद आयोजित किया था। उस बैठक में गुणवत्ता पर विशेष चर्चा हुई। सभी मुख्यमंत्रियों ने एक स्वर में गुणवत्ता पर जोर दिया। उन्होंने प्राथमिक और उच्चतर शिक्षा दोनों में गुणवत्ता पर जोर दिया। मेरे हिसाब से यह अच्छी शुरुआत थी। इसलिए हमारा मकसद गुणवत्ता सुधारने पर है। हमारा नारा है सबको शिक्षा, अच्छी शिक्षा।

लेकिन सवाल है कि हम इसे कैसे कर रहे हैं?

हम इसे कायदे से कर रहे हैं। अब ‘कैब ‘ की एक बैठक होगी और प्राथमिक शिक्षा के नतीजे सुधारने का एक प्रस्ताव पहले से है। हम शिक्षा के अधिकार में सिखने के नतीजे की बात शामिल करेंगे। यानी यह मानदंड बनाया जाएगा कि पहली कक्षा में बच्चा क्या सीखे और दूसरी में क्या सीखे। हम इसे अधिसूचित करने जा रहे हैं। दूसरा सवाल यह है कि राज्यों को विचार करने दिया जाए कि वे परीक्षा चाहते हैं या नहीं। सबसे बढ़कर हम यह कह रहे हैं कि उच्चतर शिक्षा में शोध और नवाचार पर जोर नहीं रह गया है, सिर्फ पढ़ाई और डिग्री पर ही जोर है।

हम शोध और नवाचार पर जोर देने के लिए बदलाव कर रहे हैं। इसलिए नरेंद्र मोदी जी का विचार है कि सभी उच्चतर अध्ययन के केंद्रों को शोध और नवाचार के केंद्र के रूप में विकसित किया जाए। इसी उद्देश्य से हम विश्वस्तरीय विश्वविद्यालयों को ला रहे हैं। हम ”छात्र आविष्कार योजना’’ के तहत उद्योग-अकादमी सहयोग की अवधारणा ला रहे हैं। हम करीब 10 क्षेत्रों में 300 शोध परियोजनाओं को भी वित्तीय मदद दे रहे रहे हैं। मुझे पूरा यकीन है कि इन शोध परियोजनाओं से हमारे लिए कई पेटेंट निकलेंगे। हम यह भी कर रहे हैं कि दूसरे उच्चतर  शिक्षा वित्तीय एजेंसियों के जरिए अगले साल करीब 20 हजार करोड़ रु. मुहैया कराने की व्यवस्था कर रहे हैं, ताकि उच्चतर  शिक्षा में शोध का इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार हो सके। इस तरह इन सबको मिलाकर उच्चतर  शिक्षा में शोध तथा नवाचार और प्राथमिक, यहां तक कि नर्सरी शिक्षा में गुणवत्ता सुधार का हमारा प्रयास है।

लेकिन इसमें दो विरोधाभास भी हैं। एक, मसलन, आप देश में 50 जगहों पर आइआइटी की स्थापना करते हैं तो आपको नहीं लगता कि इन प्रमुख संस्थाओं के ब्रांड मूल्य से समझौता करना होगा?

नहीं, मैं इससे सहमत नहीं हूं। देखिए, हमारा देश विशाल है। हाल में मैं शिमोन पेरेस के अंतिम संस्कार में हिस्सा लेन इजरायल गया था। वहां की आबादी सिर्फ 80 लाख की है लेकिन उनके यहां विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय हैं।

लेकिन आपके पास उतने अध्यापक भी नहीं हैं?

शिक्षकों के मामले हमारे एजेंडे की तात्कालिक प्राथमिकता सूची में है। जो छात्र अध्यापक बनाना चाहते हैं, उन्हें उसके लिए प्रोत्साहन दिया जाएगा। शोध के क्षेत्र में अधिक स्वतंत्रता होगी, अच्छा पारिश्रमिक मिलेगा और सातवें वेतन आयोग के बाद मैं नहीं समझता कि कोई समस्या रह जाएगी। सबसे बढ़कर यह कि शिक्षकों को सेवा के दौरान प्रशिक्षण की व्यवस्था होगी और स्कूली शिक्षकों के लिए सेवा-पूर्व प्रशिक्षण की व्यवस्था होगी। कई राज्यों ने विचार रखा है कि हेडमास्टरों के लिए अलग काडर बनाया जाए। इसमें 15 साल की सेवा के बाद हेडमास्टर बन पाएंगे, ताकि वे ज्यादा समय तक नेतृत्व प्रदान कर सकें, सिर्फ रिटायरमेंट के वक्त ही नहीं। इसलिए कई चीजें हम नई कर रहे हैं।

दूसरा विरोधाभास यह है कि आपकी सशक्तीकरण की नीति भी है। इसका प्रभावी मतलब उच्चतर शिक्षा में जाति आरक्षण से है। अब यह कहा जा रहा है कि छात्रों की संख्या बढऩे से पास होने का अंक भी नीचे आ जाएगा, जैसा कि दिल्ली विश्वविद्यालय की लॉ डिपार्टमेंट में हो रहा है। उनका कहना है कि 20 फीसदी अंक प्रमोटरों के लिए आरक्षित रखा जाए और तब सरकार को समझौता करना पड़ता है। इसलिए शिक्षा की गुणवत्ता के साथ इसका कैसे तालमेल बैठ पाएगा?

नहीं, नहीं, मैं बताता हूं। एससी/एसटी और सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए दो अलग इम्तहान नहीं होगा। उन्हें उसी इम्तहान में बैठना होगा। उनका आकलन भी उनकी पहचान बताए बगैर एक ही विधि से होगा। इसलिए उनका आकलन एक ही आधार पर होगा।

लेकिन रूड़की में क्या हुआ? आइआइटी को फेल हुए छात्रों को वापस लेना पड़ा।

नहीं, उपेक्षित तबकों के लिए हमेशा सकारात्मक पक्षपात या कार्रवाई की दरकार होती है। हम जानते है कि आइआइटी में कोई धनी और शिक्षित परिवार से पहुंच रहा है तो कोई ऐसी पृष्ठभूमि से पहुंच रहा है जिसके मां-बाप कभी स्कूल नहीं गए, वह किसी आदिवासी क्षेत्र से आइआइटी में आता है तो उसे कुछ अधिक मदद मुहैया कराने की जरूरत है। आपको उन्हें पूरी व्यवस्था में आत्मसात करने की दरकार है। यह हमारा दायित्व है और यह हमें जरूर करना चाहिए।

दूसरी समस्या शिक्षा का नकारात्मक अर्थों में राजनीतिकरण है। जो हम जवाहरलाल नेहरू, दिल्ली और हैदराबाद विश्वविद्यालयों में देख रहे हैं।

नहीं, देखिए हमारे यहां 40 केंद्रीय विश्वविद्यालय और करीब 2 लाख छात्र हैं। इन ज्यादातार संस्थानों में पूरी तरह शांति और शिक्षा का माहौल है। अगर एकाध जगह कुछ होता है तो वह चलता है लेकिन मामला यह है कि विरोध प्रदर्शन लोकतांत्रिक तरीके से होना चाहिए। आप वीसी को रोक नहीं सकते, खासकर जब वे बातचीत को तैयार हों। बातचीत ही सभी चीज का समाधान है। इसलिए छात्र या और कोई भी मांग उठा सकता है। मुझे खुशी है कि एनसीपी सांसद डी.पी. त्रिपाठी और जेएनयू के कई दिग्गज ने वीसी के साथ छात्रों ने जो किया उसका विरोध किया। जेएनयू के वीसी को जमीन पर सोने को मजबूर किया गया। उन्हें खाना भी नहीं दिया गया। यह लोकतांत्रिक विरोध का तरीका नहीं है।

06-11-2016

जब आप इस मंत्रालय में आए तो विवाद भड़के हुए थे लेकिन अब मामला शांत हो गया है। इस सुधार के पीछे क्या है?

देखें, स्मृति ईरानी मेरी पूर्ववर्ती मंत्री थीं और उन्होंने कई अच्छे काम किए। लेकिन मुझे यह भी कहने दीजिए कि मैं बातचीत में यकीन करता हूं। मैं शिक्षा क्षेत्र में 40 साल से हूं। मैं 12 साल सीनेट का सदस्य रहा और 10 साल छात्र राजनीति में रहा। मैं महाराष्ट्र  विधान परिषद का सदस्य रहा और मैं दो चुनाव ग्रेजुएट और टीचर क्षेत्र से जीता था। मैं योजना आयोग का अगुआ रहा और आइटी महाराष्ट्र राज्य कार्यबल का चेयरमैन रहा। मैं एचआरडी स्टेंडिंग समिति का सदस्य भी रहा। इसलिए मैं इस क्षेत्र को जानता हूं और इसलिए मैं विचारों के प्रति खुला हूं और आलोचना के लिए तैयार हूं। इसलिए यह तुलना ठीक नहीं है कि पहले कुछ था और अब कुछ है।

आपको नहीं लगता कि आपका विभाग गलत वजहों से खबरों में रहा?

मेरी प्रतिबद्धता यह है कि मैं कोई भेदभाव नहीं बरतूंगा।

आपके विरोधियों का कहना है कि शिक्षा का भगवाकरण किया जा रहा है। क्या यह सही है?

नहीं, अब ऐसा कोई नहीं कह रहा है। कुछ समय पहले यह फैशन जरूर था लेकिन अब नहीं है क्योंकि मैं हर किसी से बात कर रहा हूं और शिक्षा से जुड़े हर किसी से सुझाव ले रहा हूं। मैंने 1, नवंबर को सभी सांसदों को उनके विचार सुनने के लिए बुलाया है। देखिए, किसी देश और खासकर हमारे देश की शिक्षा के पांच मूल स्तंभ हैं उपलब्धता, समता, गुणवत्ता, किफायती और जवाबदेही। इन्हीं स्तंभों पर हमारी नई शिक्षा नीति आधारित होगी।

नीति की मौजूदा स्थिति क्या है?

सुब्रह्मण्यम समिति का एक मजमून है और समिति ने अच्छा काम किया है लेकिन उसके बाद से हमें कई और सिफारिशें मिली हैं इसलिए सभी सुझावों पर गौर करने के लिए एक समिति बनाई जाएगी। अब दो साल हो गए हैं और देश भर से सुझाव आए हैं। दरअसल स्मृतिजी ने एक लाख से अधिक ग्राम और जिला सभाएं की हैं। इसलिए काफी काम हो चुका है और नई समिति उसे देखेगी। उसके बाद एक मजमून कैबिनेट में जाएगा।

हर कोई यह कह रहा है कि आपकी सरकार के तीन साल हो गए और आइसीएसएसआर जैसी संस्थाओं में कई अहम पद आज भी खाली पड़े हैं।

नहीं, हमने हाल में आइसीएसएसआर में सदस्य सचिव की नियुक्ति की है। चेयरमैन का सवाल है तो वे रिटायर होंगे तो कोई नया आएगा। अब हम योजना बना रहे हैं कि कुछ पहले ही लोगों की चयन प्रक्रिया जारी की जाए ताकि कोई पद ज्यादा देर तक खाली न रहे।

लेकिन केंद्रीय विश्वविद्यालयों के वीसी की नियुक्ति के बारे में क्या है?

अब कोई पद खाली नहीं रहेगा। हम जल्दी भरेंगे।

क्या आपको लगता है कि अब राष्ट्रीय पाठ्यक्रम व्यवस्था की समीक्षा की जरूरत है?

देखिए, हर पीढ़ी को नीतियों में संशोधन का अधिकार है। आखिरी समीक्षा 1992 में की गई थी। 1986 की नीति की समीक्षा 1992 में हुई। तब से 25 साल बीत गए। इसलिए राष्ट्रीय पाठ्यक्रम व्यवस्था दस साल पहले 2006 में बनाई गई थी। मुझे लगता है कि हर दस साल में समीक्षा होनी चाहिए। उसे प्रासंगिक बनाया जाना चाहिए। यही प्रगतिशील भारत, आधुनिक भारत की मांग है। हम बातचीत के जरिए इसे करेंगे।

आप एचआरडी के आवंटन को पर्याप्त अच्छा मानते हैं?

आवंटन पर्याप्त अच्छा है। मोदी सरकार ने इसे काफी बढ़ाया है। अब हम जीडीपी का 4.5 फीसदी शिक्षा पर खर्च कर रहे हैं। हमे यह भी साफ करने दीजिए जीडीपी सरकार की जेब में नहीं है। हम केंद्र से करीब 15 फीसदी और राज्य से 20 फीसदी शिक्षा पर खर्च कर रहे हैं। अगर यह सही है तो अच्छी रकम खर्च की जा रही है और हर पैसे को सही ढंग से खर्च करने के उपाय करने चाहिए।

शिक्षा में निजी खिलाड़ी देश के हर कोने में उग रहे हैं। वे शोध के क्षेत्र में नहीं हें जो आपकी सरकार की प्राथमिकता है, उनका लक्ष्य तो व्यवसाय है। आप इस मामले में क्या कर रहे हैं?

हम चाहते हैं कि अकादमिक क्षेत्र और उद्योग में लगातार संवाद कायम रहे क्योंकि उद्योग शिक्षा परिसरों में अपनी जरूरतें नहीं बताएंगे तो अकादमिक क्षेत्र समाधान नहीं दे पाएगा और जब तक अकादमिक परिसर समाधान नहीं दे सकेंगे, वे प्रतिभा और शोध के केंद्र नहीं बन पाएंगे। इसी तरह से पश्चिमी देशों में विश्वविद्यालय विलक्षण हुए हैं। हम यही चाहते हैं।

आप विदेशी विश्वविद्यालयों को यहां आने की अनुमति देंगे?

देखिए, जब यूपीए सरकार इससे संबंधित विधेयक लाई थी तो मैं एचआरडी स्टेंडिंग समिति का सदस्य था। ऑस्कर फर्नांडिस चेयरमैन थे। हमने विधेयक को जांचा-परखा और सुझाव दिया कि 200 विश्वविद्यालय यहां कैंपस बना सकते हैं लेकिन उस समय विधेयक पास नहीं हो पाया, सरकारी पार्टी के लोग ही उसका विरोध कर रहे थे। अब प्रशिक्षण की व्यवस्था बन गई है और यूजीसी और एआइसीटीई उसकी देखरेख कर रहे हैं। लेकिन हम इस बारे में कुछ समय बाद विचार करेंगे। हम देखेंगे कि क्या किया जा सकता है। हम विचारों के प्रति खुले हैं।

डीम्ड विश्वविद्यालयों के बारे में क्या सोच है?

डीम्ड विश्वविद्यालयों की संख्या 123 है। हम अच्छे विश्वविद्यालय चाहते हैं और उन्हें पूरी स्वायत्तता देना चाहते हैं। हम उन अच्छे विश्वविद्यालयों का संचालन करना चाहते हैं। यही हमारा आधार होगा।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय के बारे में आपका एजेंडा या नजरिया क्या है?

मैं समझता हूं कि शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार समय का तकाजा है और प्राथमिक शिक्षा में सुधार पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। राज्यों को अधिक स्वायत्तता देना दूसरा मामला है। तीसरे, शिक्षकों की भर्ती, रिक्तियों को पूरा करना, प्रशिक्षण और जवाबदेही, सभी मेरे लिए जरूरी हैं। इसलिए अपने पांच बुनियादी स्तंभों पर हम सार्थक शिक्षा देना चाहते हैं। यही मेरा लक्ष्य है।

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