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दीवाली से पहले की आतिशबाजी

दीवाली से पहले की आतिशबाजी

इस बार दीवाली से पहले ही आतिशबाजी हो गई। ये आतिशबाजी भारतीय सेना ने सीमापार जाकर उस इलाके में की जहां अभी तक सिर्फ भारत को नुकसान पहुंचाने के लिए आतंकी धमाकों की तैयारी ही होती थी। सीमापार में हुई इस आतिशबाजी की गूंज दूर तक सुनाई दी और अब तक जारी है।

इसकी धमक की मार तितरफा हुई। पहली तो पाकिस्तान के भीतर जिसने कहा कि उसने तो ये नजारा देखा ही नहीं। यानि सर्जिकल स्ट्राइक हुए ही नहीं। दिलचस्प बात है कि पाकिस्तान के भीतर इसे लेकर इतनी कुलबुलाहट हुई कि सर्जिकल स्ट्राइक को नकारते हुए भी उसकी सेना और हुकमरान तकरीबन मान ही गए कि घाव गहरा लगा है। सर्जिकल स्ट्राइक नाविक के उन तीरों की तरह थे जो ‘देखन में छोटे लगे, घाव करे गंभीर’। पाकिस्तान रणनीति का परमाणु युद्ध धमकी का हथियार भी इससे भोंथरा हो गया।

इसकी दूसरी मार हुई भारत की अन्दरूनी राजनीति पर। एक तरफ आम हिन्दुस्तानी के मन को इससे एक दिलासा मिली कि अब हर आतंकवादी हमले पर उसका मन सिर्फ रूदाली की तरह विलाप नहीं करेगा, बल्कि हाथ में तलवार उठाकर नागफनी के उन कांटों को काटने की हिम्मत दिखाएगा जो बरसों से उसका खून बहा रहे हैं। मगर कुछ ऐसे लोग भी खड़े हुए जो वकीलों की तरह बस राजनीतिक जिरहबाजी ही करते रहे कि सर्जिकल स्ट्राइक हुए भी कि नहीं। ये लोग इस दौरान मोदी विरोध में इतने लीन हुए कि वे सरकार और भारत विरोध के बीच की महीन रेखा को भी लांघ गए।

विजयादशमी से कुछ दिन पहले हुए इन धमाकों की गूंज अंतर्राष्ट्रीय फलक पर भी सुनाई दी। इसने दक्षिण एशिया के सामरिक-रणनीतिक परिदृश्य में एक नया अध्याय जोड़ दिया। मजेदार बात ये रही कि पिटने वाला कहता रहा कि मेरी पिटाई नहीं हुई। इसके उलट मारने वाले ने जोर-जोर से कहा कि उसने मारा। मगर भारत की सफलता इस बात में रही कि पीटने वाले पाकिस्तान को जिनसे उम्मीद थी कि वो उसके बचाव में बोलेंगे, वो बोले ही नहीं। असल में पिटने वाले की इतनी बदनामी पहले ही हो चुकी थी कि ज्यादातर ने तो शायद ऐसा सोचा कि ऐसा पहले क्यों नहीं हुआ।

सर्जिकल स्ट्राइक से भारत की विदेश नीति और सामरिक नीति में कुछ नयी इबारत भी लिखीं गयीं :

  • भारत ने अपने धैर्य की परीक्षा की एक नई लक्ष्मण रेखा खींच दी।
  • परमाणु युद्ध की भभकी की पोल खुल गई और साफ हुआ कि पाकिस्तान परमाणु युद्ध की धमकी को आतंकवाद के कवच के रूप में इस्तेमाल नहीं कर सकता।
  • पाकिस्तान आंतकवाद पर बचाव की मुद्रा में आ गया और उसके यहां एक अंदरूनी बहस शुरू हो गई।
  • भारत ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर घुसकर पलटवार करने के सिद्धांत को मान्य करा दिया।
  • नये मनोबल के साथ भारतीय सेना को काम करने की छूट मिल गई।

दशहरे और दीवाली का ये समय श्रीराम के चरित्र के गुणगान का समय है। अगर हम रामलीला से ही दृष्टांत लें तो सर्जिकल स्ट्राइक हनुमान जी द्वारा लंका में अशोक वाटिका उजाडने जैसा है। अशोक वाटिका उजाड़ते हुए हनुमानजी ने रावण के पुत्र अक्षय कुमार को मारा था। उससे भी महत्वपूर्ण था कि उन्होंने लंकावासियों के मन में बसी ‘अजेय और अपराजेय लंका’ की छवि को ध्वस्त किया था। उन्हें बताया था कि अगर वे रावण के पाप की गठरी से दूर नहीं हुए तो उनकी नगरी ध्वस्त हो जाएगी।

उम्मीद है कि पाकिस्तान में जो थोड़ा बहुत मंथन शुरू हुआ है वह गहरे आत्मनिरीक्षण में बदलेगा। वो समझेगा कि आंतकवाद के पाप की कीमत उसे चुकानी पड़ेगी। वह नहीं बदला तो फिर ऊपर वाला ही उसका मालिक है। खैर, ऐसी दीवाली बहुत दिनों बाद भारत में आई है। आइए इस बार एक नए विश्वास के साथ दीपावली मनाएं। दीपावली की शुभकामनाएं।

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