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कुत्ता तो हूं पर शर्मिन्दा नहीं

कुत्ता तो हूं पर शर्मिन्दा नहीं

मैं चाहे हर गली व कूचे में बेलगाम घूमता हूं। पर मैं कोई आम कुत्ता नहीं हूं। मेरा खानदान बड़ा उंचा है। इस तथ्य का ज्ञान मुझे मेरे भाइयों ने दिया। इसी कारण वह मुझे बहुत सम्मान देते हैं। मेरा जन्म एक ऊंचे घराने में हुआ था। मेरे मालिक भी बड़े आदमी थे, इतने बड़े कि वह अपने भाई-बन्धुओं से चाहे हिन्दी या स्थानीय भाषा में बोल लें पर वह मेरे माता-पिता से तो बस अंग्रेजी में ही बात करते थे। मेरे माता-पिता भी अपने मालिक से कम सभ्य नहीं थे। वह अंग्रेजी के सिवाय तो कोई और भाषा समझते ही नहीं थे। गांव के गंवार जब मेरे मालिक से मिलने आते या उनके घर पर नौकरी करते तो उनको बड़ी मुसीबत होती थी। उनको तब ऐसा लगता कि वह भारत में नहीं बरतानिया में ही पहुंच गये हैं। कई बार तो खीज कर कह ही देते थे, ”अंग्रेजों की औलाद’’। यह सुनकर हम तब बड़ें खुश होते थे, गर्व महसूस करते थे।

मैं शुरू से ही स्वतन्त्रता का मालिक रहा हूं। मुझे स्वतन्त्रता से बहुत प्यार है। अभी बहुत छोटा था जब मैं एक दिन चुपचाप अपने मालिक के घर से खिसक गया। वास्तव में मेरा मालिक मुझे बेच देना चाहता था। एक बड़े उंचे घराने का अरबपति मुझे खरीदने के लिये मुंह मांगे दाम देने को तैयार था। मेरी तरह मेरे एक बड़े भाई को भी एक अमीरजादा खरीद कर ले गया था। उसने उसकी शादी एक बड़े अमीर घराने में कर दी थी। उसकी शादी बड़ी धूमधाम से मनाई गई थी। इतनी शानो-शौकत से कि बड़े-बड़े ऊंचे-ऊंचे लोगों को उससे ईष्र्या होने लगी क्योंकि उनकी अपनी शादी इतनी धूमधाम से नहीं मनाई गई थी, इतनी बड़ी दावत नहीं दी गई थी। यही नहीं। मेरे भाई को तो बहुत बड़ा दहेज भी मिला था। दहेज लेना-देना मनुष्यों के लिये अपराध है। हमारे समाज में ऐसी कोई बात नहीं है।

मुझे अपनी स्वतन्त्रता, पूर्ण स्वतन्त्रता, से प्यार है। उस पर गर्व है। वह आजादी जिस पर तो कई बार मानव भी हम से ईर्षा करने लगता है, उसकी नक़ल मारना चाहता है। मेरे भाई जो बड़े-बड़े घरों, बड़े-बड़े खानदानों में बड़े लाड-प्यार से अवश्य पलते व रहते हैं पर प्राथमिक स्वतन्त्रताओं से वंचित रहते हैं। न उन्हें अपनी मर्जी की संगति करने, संगठन बनाने, विचार बनाने व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होती है और न सैक्स की। उन्हें लाड़-प्यार तो बहुत मिलता है जिस कारण वह बिगड़ भी जाते हैं पर उनका जीवन तो गुलाम ही रह जाता है। वैसे देखा जाये तो हमारी ही एक जाति हैं जो सदैव स्वतन्त्र रही है और रहेगी। हमारे देश में कई राजे-महाराजे आये और चले गये। शासन की कई व्यवस्थायें आईं व बदली। देश गुलाम भी हुआ पर कोई भी शासक हमारी स्वतन्त्रता पर अंकुश न लगा पाया। मानव कई बार हालात के आगे बेबस हो गया पर हम कभी किसी के आगे नहीं झुके। न कोई हमें परास्त ही कर सका।

हमें किसी पर भी भौंकने की पूर्ण स्वतन्त्रता है। हम जिसके पीछे चाहें भाग सकते हैं। कई मानव तो हम से इतने डर जाते हैं कि उनसे पैंट में ही पेशाब निकल जाता है। हमें पूरी छूट होती है कि हम जिसको चाहें काट लें। पर किसी को यह अधिकार नहीं है कि वह गुस्से में आ जाये और हमें पत्थर मार कर घायल कर दे या लाठी से हमें पीट दे। यदि कोई व्यक्ति ऐसी हिमाकत कर दे तो उसे उल्टे लेने के देने पड़ जायेंगे। उस पर ही पशु अत्याचार निरोधक कानून के अन्तर्गत अपराध दर्ज हो जायेगा। तब वह अपनी पीड़ा भूल कर अपने आप को कोसने लगेगा कि वहं अपने गुस्से पर काबू क्यों नहीं रख सका। अब तो सभ्य समाज मानने लगा है कि किसी पर भी भौंकना व किसी को भी काट खाना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है जैसे कि मानव कहता है कि स्वतन्त्रता उसका जन्मसिद्ध अधिकार है।

वास्तव में हमारा समाज सब से अधिक सुसंस्कृत व उदार हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से तो हम बहुत उंचे हैं। हम तो व्यर्थ के बन्धनों, रिश्ते-नातों में गुलाम होते ही नहीं। न ही हम झूठे प्यार व भावनाओं का ढोंग रचने में विश्वास रखते हैं। हम जिस सम्बन्ध में विश्वास रखते हैं और जिसकी मर्यादा हम निभाते हैं वह है नर और मादा का। हमारा तो समाज नारी प्रधान है, न कि मानव की पुरूष प्रधान व्यवस्था जिसमें बस नारी का ही शोषण होता है और कुछ नहीं। हम केवल अपनी मां को याद रखते हैं। जब हम बड़े हो जाते हैं तो हम उसे भी भूल जाते हैं। तब वह भी एक मादा ही बनकर रह जाती है। हम तब सारे नातों-रिश्तों से मुक्त हो उठते हैं।

अब तो मानव भी विशेष कर वह जो अपने आपको आधुनिक व उदारवादी मानते हैं हमारी उच्च सामाजिक व्यवस्था की उत्कृष्ठता का सिक्का मानने लगे हैं। चाहे बहुत लम्बे समय के बाद ही सही पर अब तो लगता है कि मानव समाज भी हमारे उच्च नैतिक मार्ग की ओर आकृष्ठ हो रहा है और चाहे थोड़े ही सही पर कुछ लोगों ने बहन और बेटी के रिश्ते को भी भुला कर उन्हें भी एक महिला ही समझना शुरू कर दिया है और सारे रिश्ते-नाते तोड़ कर उनके साथ शारीरिक सम्बंध बनाने शुरू कर दिये हैं। यही कारण है कि मानव द्वारा अपनी बहन-बेटी के साथ शारीरिक रिश्ते बनाने के समाचार दिनोंदिन बढ़ते जा रहे हैं। हमें खुशी है कि हमारे मानव भाइयों ने अब हमारे द्वारा दिखाये गये रास्ते पर अग्रसर होना शुरू कर दिया है। वह चाहे आज मानें या न मानें पर उन्हें कल को तो हमें अपना गुरू तो मानना ही पड़ेगा।

हमारे उदार विकसित समाज में व्यभिचार नाम की कोई चीज नहीं होती। हम तो मुक्त सैक्स में आस्था रखते हैं। हम कभी प्यार व विवाह के झूठे बन्धनों में नहीं बन्धते। जब भारत गुलाम था तो ब्रिटिश सरकार ने व्यभिचार को एक अपराध घोषित कर भारतीयों पर थोप दिया था पर हमारे लिये न तो विदेशी सरकार और न वर्तमान सरकार ऐसा कोई कानून बना पाई है। पर अब जबकि भारत गुलामी से आजाद हो गया है, अब लोग इसी गुलामी के समय के कानून की बेड़ी से मुक्त होना चाहते हैं। मानव अब हमारी नक़ल करना चाहता है। उसने भी प्रावधान कर दिया है कि दो व्यस्क स्त्री-पुरूष यदि अपनी सहमति से ऐसा कुकर्म करें तो यह व्यभिचार का अपराध नहीं है। हमें गर्व है कि किसी बात पर ही सही कम से कम एक आदर्श की प्रेरणा तो हम ने ही मानव को दी है ना। यह एक ऐसी स्वतन्त्रता है जिसे हमने पृथ्वी पर संस्कृति के प्रारम्भ से ही अपनाया है। मनुष्य तो अब हजारों साल बाद इसे प्राप्त करने के लिये संघर्ष ही कर रहा है। कुछ वर्ग अब भी इतना रूढ़ीवादी व पिछड़ा है कि वह आज भी इसका विरोध कर रहा है।

मेरा एक भाई एक बड़ी कोठी में रहता है। वह किसी भी महिला से लिपट सकता है। उसे प्यार कर सकता है। उसे किस्स कर सकता है। जब वह किसी महिला को किस्स करता है तो वह अपने आपको ऐसे धन्य समझती है मानो अमरीका के राष्ट्रपति या इंगलैंड की महारानी ने उसे किस्स कर लिया हो। खुशी से उसकी बांछें खिल जाती हैं। वह अपनी मालकिन के बिस्तर में घुस सकता है। उसके साथ सो सकता है। है कोई मानव माई का लाल जो ऐसा कर सकता हो, उसका कहना है कि अब तो मानव भी उसकी स्वतन्त्रता पर ईर्षा करने लगा है।

उसने बताया कि उसका मालिक या मालकिन उसे प्रतिदिन समय पर बाहर सैर करवाने ले जाते हैं। इस बहाने उनकी भी सैर हो जाती है। उसका जहां दिल करता है टट्टी-पेशाब कर देता है, सड़क पर बगीचे में, उसके साथ सटी झाडिय़ों में, पैदल चलने वालों के लिये बनी पटरी पर और जहां उसका दिल चाहे। कोई नहीं रोकता।

मैं अपनी मर्जी का मालिक हूं। मैं इनसान नहीं जो जहां चाहे टट्टी-पेशाब कर दूं। मैं पहले हर जगह, हर मकान, हर दीवार को सूंघता हूं। फूंक-फूंक कर टट्टी-पेशाब करता हूं। यदि मुझे ठीक लगे तो ही मैं वहां पेशाब करता हूं। करोड़ो की बीएमडब्लयू या मर्सीडीज पर भी तब तक पेशाब नहीं करता जब तक कि मैं उसके टायर को सूंघ न लूं और वह मुझे मेरे पेशाब करने लायक न लगे। मैं इनसान नहीं जो बीएमडब्लयू या मर्सीडीज गाड़ी देखकर ही अपने होश-हवास खो बैठता हूं।

कुछ भी हो। मुझे तो अपनी किस्मत पर गर्व होता है। मैं तो अपने आप को इनसान से भी अधिक भाग्यशाली मानता हूं। मेरी स्वतन्त्रता का तो मानव भी मुकाबला नहीं कर सकता। मेरा सीना तो तब गर्व से तन जाता है जब मैं पाता हूं कि मेरे कुछ आदर्शों को तो इनसान भी अपनाना चाहता है।

पर मुझे इनसान से एक ही गिला-शिकवा है। वह गुस्सा अपने पर किसी को भी कुत्ता कह देता है बिना सोचे-समझे कि क्या वह कुत्ता कहलाने के काबिल है भी कि नहीं। अपनी ओर से मानव तो अपने दुश्मन को गाली देता है पर वास्तव में यह गाली हम पर बन जाती है।

मैं चाहे सड़क का पैहरेदार हूं पर अपने रोज मिलने वालों को पहचानता हूं जो मुझे रोटी देते हैं। समय-समय पर मेरे पर प्यार का हाथ भी फेरते हैं। मैं उन पर कभी नहीं भौंकता।  उन्हें कभी नहीं काटता। उल्टे मैं उनके सामने वफादारी की पूंछ हिलाता रहता हूं। कोई उन पर वार करने आये तो मैं उस पर टूट पड़ता हूं। उसे भगा देता हूं। मैं उसका सब से बड़ा वफादार साबित होता हूं। कोई मेरी वफादारी पर संदेह नहीं कर सकता। सब जानते हैं कि मैं कुत्ता हूं, कोई मानव नहीं।

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