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नानाजी देशमुख भारतीय संस्कृति के ध्वजवाहक

नानाजी देशमुख  भारतीय संस्कृति के ध्वजवाहक

नानाजी देशमुख बड़ी शक्चिसयत थे और उन्हें किसी पहचान की दरकार नहीं है। उनकी विलक्षण बौद्घिकता और अनोखी संगठन शक्ति ने भारतीय राजनीति में एक अमिट छाप छोड़ी है। एक संगठक, नेता और ग्रामोदय के प्रति समर्पित दिग्गज के नाते नानाजी देशमुख से हमें कई रूपों में प्रेरणा मिलती है। राजनीति से संन्यास लेने के बाद उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता की नई भूमिका अपनाई और दूरदराज के ग्रामीणों के सामाजिक-आर्थिक कल्याण और उनमें नैतिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों का संचार करने का बीड़ा उठाया। उन्होंने पहले उत्तर प्रदेश के सबसे पिछड़े जिले गोंडा में काम शुरू किया। फिर, सूखा पीडि़त और गरीबी से त्रस्त महाराष्ट्र के बीड जिले को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। अंत में वे उत्तर प्रदेश के चित्रकूट में करीब 500 गांवों में नैतिक मूल्यों के साथ व्यापक सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए वहीं जम गए। चित्रकूट परियोजना संस्थागत विकास और ग्रामीण विकास के एक मॉडल के रूप में अनोखा प्रयास है। इसमें ऐसे विकास पर जोर दिया गया है, जो भारत के लिए सबसे माकूल है। इसका संदेश है कि राजनैतिक ताकत से जनता की ताकत अधिक गंभीर, स्थायी और टिकाऊ है। शोषितों और उपेक्षितों के साथ एक रूप होकर ही प्रशासन और राजकाज का गुर सीखा जा सकता है। युवा पीढ़ी में विलक्षणता और आत्मनिर्भरता का भाव जगाए बगैर सामाजिक विकास और समृद्घि संभव नहीं है। इसी सिद्घांत पर चित्रकूट परियोजना चित्रकूट के आसपास के पांच गांवों के समूह बनाकर सौ गांव समूहों को विकसित करने के लिए तैयार की गई। चित्रकूट परियोजना आत्मनिर्भरता की मुहिम है। इसके तहत गांव के हर व्यक्ति, परिवार और समाज के जीवन के हर पहलू पर गौर किया जाता है। इस मुहिम की कुंजी है समाज शिल्पी दंपती। ये दंपती गांव के ही होते हैं और पांच गांवों के समूह में प्ररेणा देने की जिम्मेदारी निभाते हैं। सबसे पहले इनकी आय वृद्घि पर विचार किया जाता है। इसके लिए जरूरत के मुताबिक जल संचयन और मृदा प्रबंधन की तकनीक अपनाई जाती है। 2.5 से 1.5 एकड़ की जोत में आदर्श कृषि की विधि अपनाई जाती है, ताकि छोटे और हाशिए के किसानों की पारिवारिक जरूरतें पूरी हो सकें। इसके साथ उद्यम कौशल और स्व-सहायता समूह के जरिए आय बढ़ाने के उपाय अलग होते हैं और ये सभी उपक्रम जुड़े होते हैं। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम ने नानाजी की चित्रकूट परियोजना को देखा और उसे भारत के लिए सबसे उपयुक्त बताया था। उन्होंने पाया कि जिले के 80 गांव पूरी तरह मुकदमों से छुटकारा पा चुके हैं।

चित्रकूट नानाजी की आखिरी कर्मभूमि थी। वैसे तो पूरा देश ही उनकी कर्मभूमि थी। यह याद किया जा सकता है कि बचपन में उन्हें कई दिनों तक खाना नसीब नहीं होता था। लेकिन उससे वे नक्सल नहीं बने। सही उम्र में उनका आरएसएस से जुड़ाव और सही व्यक्तियों के साथ संबंधों ने उन्हें एक महान राष्ट्रवादी बनाया, जिसने अपनी मातृभूमि के गौरव के लिए ही पूरा जीवन होम कर दिया।

उनकी पृष्ठभूमि के ज्यादातर लोग एक सीमित समूह के ही बनकर रह जाते हैं, लेकिन नानाजी हमेशा एक कदम आगे जाने की सोचते रहे। उनके दूसरी राजनैतिक पार्टियों, उद्योग घरानों, मीडिया और सीविल सोसायटी के नेताओं से व्यक्तिगत संबंध थे। वे अपने राजनैतिक संगठन के बारे में भी दो-टूक राय जाहिर करने से कभी नहीं हिचके। उनमें राष्ट्र हित में खुलकर बोलने और पार्टीगत विचारों से ऊपर उठने की अद्भुत क्षमता थी। नानाजी देशमुख में समाज कल्याण और राष्ट्र निर्माण के प्रति अनोखी प्रतिबद्घता थी। उनके ही प्रयासों से गोरखपुर में शुरू हुआ शिशु मंदिर देश भर में सुपरिचित शिक्षा संस्थान बन गया। नानाजी ने कई उद्योगपतियों को भी सामाजिक उद्देश्य के लिए काम करने को प्रेरित किया। नानाजी का मानना था, ”विज्ञान तो सार्वभौमिक होता है पर तकनीक स्थानीय होनी चाहिए।’’ नानाजी देशमुख का समाज के प्रति नि:स्वार्थ सेवा भाव हमारे लिए हमेशा प्रेरणास्रोत बना रहेगा

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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