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एक तू ही धनवान है “प्रभु’’ 

एक तू ही धनवान है “प्रभु’’ 

ईश्वर की प्रार्थना करते समय अक्सर हम अपनी सुख-समृद्धि या फिर धन- वृद्धि की कामना करते हैं। मनुष्य जितनी भी स्वच्छ परिस्थितियों में क्यों ना हो उसके मन में हमेशा अधिक पाने की इच्छा रहती है। इससे मनुष्य सदा-सर्वदा दु:ख और तनाव में रहता है।  कोई ज्यादा तो कोई काम, हर कोई यहाँ परेशान रहता है। कोई अपने रुग्ण शरीर के कारण, तो कोई आर्थिक समस्या के कारण, तो कोई अपने आस-पास के लोगो के अपने प्रति होने वाले व्यवहार के कारण दुखी रहता है। ज्यादातर लोगों के दु:ख का  कारण उनकी आर्थिक परिस्थिति होती है। आज की दुनिया का मानना है की जिसके पास पैसा होता है वही अधिक खुश रहता है। हम हमेशा मेहनत करते हैं की कुछ अर्थ-उपार्जन कर पाएं लेकिन हम यह निर्णय नहीं कर पाते हैं की हमें कितने अर्थ की आवश्यकता है।  पहले तो हम अपनी मौलिक आवश्यकता पूरी करने के लिए अर्थ-उपार्जन की सोचते हैं ,लेकिन जैसे ही हमारी वह आवश्यकता पूरी हो जाती है, हमारी दूसरी आवश्यकता जन्म ले लेती है। इस प्रकार हमारी आवश्यकता और इच्छा अंतहीन हो जाती है और हमारा अधिक अर्थ-उपार्जन का लालच कम नहीं हो पाता है। अर्थ-उपार्जन की जो

हमारी जरुरत होती  है  धीरे-धीरे हमारी आदत बन जाती है।  हम हमेशा अधिक से अधिक अर्थ-उपार्जन में लगे रहते है। कोई अपने अर्जित ज्ञान के माध्यम से तो कोई अपनी दक्षता के माध्यम से। कई लोग तो  अधिक अर्थ-उपार्जन के लिए गलत रास्ता अपनाने से भी नहीं कतराते। आपस मे  एक प्रतिद्वंदिता सी होने लगती है की कौन इस दौड़  में प्रथम स्थान प्राप्त कर सके।

व्यक्ति कितना धनवान है वह पता चलता है उसकी सेवा और सुविधा उपभोग से। सुख सुविधाएं मनुष्य को आनंद तो देती है लेकिन उसे आतंरिक सुख नहीं देती। यह सुविधाएं मनुष्य को धीरे-धीरे कमजोर बना देती हैं जिससे उसकी कर्म करने की क्षमता कम हो जाती है। इन्ही सुविधायों की वजह से उसे कितनी बड़ी विपत्ति का सामना करना पड़ता है, इसका उसे एहसास नहीं होता। केवल कुछ धन अपने नाम कर लेने से व्यक्ति धनवान नहीं बन जाता। धन के बल पर लोगों को खरीद कर भी आदमी धनवान नहीं बन सकता क्योंकि इन समस्त चीज़ों से मनुष्य को संतुष्टि भाव नहीं मिलता है। असल में देखा जाए तो धनी वही व्यक्ति होता है, जो सदा सर्वदा खुश और संतुष्टि भाव से रहता है। जब उसे किसी से कुछ  भी अपेक्षा नहीं रहती, मन में एक अपूर्व संतुष्टि रहती है।

 अभी हाल ही में एक दृश्य ने मन उद्द्वेलित कर दिया। रात के समय कहीं जाते हुए देखा की कुछ आश्रयविहीन लोग फुटपाथ पर निश्चिन्त हो कर सोये पड़े थे। यह वो लोग थे जिनके लिए अगले दिन क्या होगा -नहीं होगा, किसी भी तरह की सुरक्षा का आभाव, अल्प चीजों से गुजर करना जैसी चीजें मायने नहीं रखती है। इन लोगो को इतनी निश्चिन्तता से सोते देख यह एहसास हुआ कि मनुष्य को यही तो चाहिए – दिन भर की मेहनत के बाद एक सुकून भरी नींद। यही अंतर है इन लोगो और बड़े-बड़े महलों में रहने वाले लोगों में। एक धनवान के लिए धन का क्या प्रयोजन यदि वह उसे एक निश्चिन्त और संतोषजनक जीवन ना दे पाए।  धन की तलाश करने बैठते है तो यह ज्ञात होता है की असली धन तो मनुष्य के अंदर होता है। यह ऐसा धन है जो संतोष तो जरूर देता है लेकिन उसका उपयोग करने से उसका उपचय नहीं घटता।  वह धन मनुष्य का अपना मन का संतोष भाव है।  बड़े बड़े धनी व्यक्ति इस धन को पाने को तरसते हैं। इस धन को पाने के लिए केवल अभ्यास की आवश्यकता है।  यद्यपि इसे समाज से भिन्न होकर सोचना मुश्किल तो है लेकिन नामुमकिन नहीं। इस असली धन को एक बार प्राप्त कर लेने पर यह जीवनपर्यन्त हमारे साथ रहता है। भगवत विश्वास और निर्मल ह्रदय इस धन को पाने में सहायक होते है। धन-उपार्जन करके धनवान बनना गलत नहीं लेकिन धन को अधिक महत्व देकर बाकी सभी चीज़ों को गौण समझना गलत है। इस दुनिया में समस्त कार्य ईश्वर की इच्छा से हो रहे है यह एहसास होना चाहिए।  एक विशाल ह्रदय व्यक्ति ही असल में धनवान व्यक्ति होता है।

उपाली अपराजिता रथ      

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