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दरोगाजी संभल जाओ

दरोगाजी संभल जाओ

कानपुर के  अपने एक  दरोगाजी सुबह-सुबह निकले सैर पर। गले में मोटी चैन, हाथ में अंगूठियां। सब रुआबदार पैसे वाले का रंग-रोगन कर रही थी। तभी अचानक  बाइक  सवार सट गए। पता पूछने के  बहाने बगल में तमंचा सटा दिया। दरोगा जी हक्का-बक्का सब भूल गए और एक  ही घुड़की में सब उतार कर दे दिया। लुटेरे भी कम मास्टर नहीं थे। उन्हें मालूम है कि  उ.प्र. की पुलिस कैसी है, लिहाजा लेकर चंपत हो गए। सुना है मियां इसके  बाद गरियाते हुए थाने पहुंचे, रिपोर्ट लिखवाई और अब छटपटा रहे हैं कि  लुटेरों ने माल साफ कर दिया। जब अपन ने इस पर जिले के  एक  बड़े अधिकारी से गुफ्तगू शुरू की तो मियां बोल बैठे, भाई उ.प्र. है। यहां तो पुलिस पिटती भी है, लुटती भी है। अब भला कौन बताए कि  भाई तो ठीक है, लेकिन लूट-लूटकर ही तो लुट रही है।

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