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परिवार में आधुनिक परिवर्तन एक मनोवैज्ञानिक अध्ययन

परिवार में आधुनिक परिवर्तन  एक मनोवैज्ञानिक अध्ययन

परिवार अपने सदस्यों को मानसिक सुरक्षा और संतोष प्रदान करता है। परिवार के सदस्यों में परस्पर प्रेम, सहानुभूति और सद्भाव पाया जाता हैं । वही बालक में आत्म-विश्वास पैदा करता हैं जिन बच्चों को माता-पिता का प्यार एवं स्नेह नहीं मिल पाता, वे अपराधी एवं विघटित व्यक्तित्व वाले बन जाते हैं। माता-पिता में से किसी की मृत्यु, तलाक, पृथ्ककरण, घर से अनुपस्थिति आदि के कारण बच्चे को स्नेह एवं मानसिक सुरक्षा नहीं मिल पाने पर उसके व्यक्तित्व का विकास नहीं हो पाता है।

परिवार में होने वाले परिर्वतनों को दो भागों में बांटा गया है -(1) वे परिवर्तन जो परिवार के ढांचे या संरचना में हो रहे हैं। (2) वे परिवर्तन जो परिवार के कार्यों अथवा प्रकार्यों में हो रहे हैं।

अनेक कारणों के संयुक्त प्रभाव के फलस्वरूप परिवार के नये प्रतिमान उभरकर सामने आ रहे है। परिवार के आकार, प्रकार, सदस्यों के संबंधों, प्रस्थिति और भूमिकाओं, अधिकारों एवं कर्तव्यों तथा परिवार के ढांचे को निर्मित करने वाले नियमों में वर्तमान समय में काफी परिर्वतन आये है –

वर्तमान समय में परिवार का आकार अर्थात् सदस्य-संख्या घटती जा रही है। अब सीमित परिवार की ओर लोगों का झुकाव बढ़ता जा रहा है। सन्तति निग्रह या परिवार नियोजन से सम्बन्धित विभिन्न विधियों के प्रयोग ने परिवारों की सदस्य – संख्या घटाकर दो या तीन तक सीमित कर दी हैं। अब परिवार में 20 या 25 सदस्य दिखायी नहीं पड़ते । अब तो पति-पत्नी और उनके अविवाहित बच्चों से मिलकर नाभिक परिवार ही बनने लगे है।

कुछ समय पूर्व तक पत्नी के लिए पति ही परमेश्वर या देवता के रूप में था। चाहे पति क्रूर या अत्याचारी क्यों न हो, पत्नी को उसे परमेश्वर मानकर उसकी उचित-अनुचित सभी प्रकार की आज्ञाओं का पालन करना पड़ता था। अब इस स्थिति में अन्तर आया है। शिक्षा तथा सामाजिक चेतना ने स्त्रियों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनाया है, अब वे दासी के रूप में नही बल्कि सहचरी या साथी के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगी है।

अब परिवार अधिनायकवादी आदर्शों से प्रजातान्त्रिक आदर्शों की ओर बढ़ रहे है। अब पिता परिवार में निरंकुश शासक के रूप में नहीं रहा है। परिवार से सम्बन्धित महत्वपूर्ण निर्णय अब केवल पिता के द्वारा ही नहीं लिये जाते। अब ऐसे निर्णयों में पत्नी और बच्चों का महत्व भी बढ़ता जा रहा है। अब परिवार में स्त्री को भारस्वरूप नहीं समझा जाता । अब बच्चों के प्रति भी माता-पिता के मनोभावों में परिर्वतन आया हैं। वे समझने लगे है कि बच्चों को मार-पीट कर या उनकी इच्छाओं का दमन करके उन्हें सही रास्ते पर नहीं लाया जा सकता और उनके व्यक्तित्व का ठीक से विकास नहीं किया जा सकता। स्पष्ट है कि परिवार में स्त्री-सदस्यों एवं बच्चों का महत्व बढ़ा है।

वर्तमान में विवाह एवं यौन-सम्बन्धों की दृष्टि से काफी परिर्वतन आये हैं। अब बाल-विवाहों की संख्या घटती और विलम्ब-विवाहों की संख्या बढ़ती जा रही हैं। अब जीवन-साथी के चुनाव में भी लड़के-लड़कियां पहले की तुलना में काफी स्वतन्त्र हैं। आजकल प्रेम-विवाह, कोर्ट मैरिज तथा अन्तर्जातीय विवाहों की संख्या बढ़ती जा रही है। अब विवाह में रोमांस का महत्व बढ़ता जा रहा है। आजकल लोग एक-विवाह को ही उचित समझते है। अब परिवार में विधवाओं के प्रति सहिष्णुतापूर्ण दृष्टिकोण पाया जाता है।

वर्तमान में परिवार की सम्पत्ति में स्त्रियों के साम्पतिक अधिकार बढ़े है। अब इन्हें नौकरी या व्यापार करने की भी स्वतंत्रता है। इससे स्त्रियों की आर्थिक स्वतंत्रता बढ़़ी है। अब वे परिवार पर भार या पुरूषों की कृपा पर आश्रित नहीं है। इससे परिवार में स्त्रियों का महत्व बढ़ा है परन्तु साथ ही उनके दायित्वों के बढ़ जाने से और अन्य सदस्यों की अपेक्षाओं के अनुरूप दायित्व नहीं निभा पाने के कारण उन्हें अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। आज उनके जीवन में अनेक तनाव एवं कुण्ठाएं पायी जाती है। स्त्री-शिक्षा के प्रसार ने सामाजिक चेतना लाने और स्त्रियों को अपने अधिकारों के प्रति सजग बनाने में योग दिया है। अब वे सामाजिक जीवन से सम्बन्धित विभिन्न गतिविधियों में भाग लेती है। इससे पारिवारिक क्षेत्र में कहीं-कहीं भूमिका संघर्ष की स्थिति पायी जाती है।

वर्तमान समय में नाते-रिश्तेदारों का महत्व कम होता जा रहा है। अब लोग अपने रिश्तेदारों से दूर भागना चाहते है। आज नाते-रिश्तेदारों के साथ सम्बन्धों में घनिष्ठता का अभाव पाया जात है।

आजकल अनेक परिवारों को अस्थायित्व की समस्या का सामना करना पड़ता है। जहां पति  या पत्नी कर्तव्यों के बजाय अधिकारों पर अधिक जोर देते हैं और अपनी स्वयं की सभी आवश्यकताओं को हर दशा में पूरा करना चाहते हैं, वहां पारिवारिक तनाव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है जो आगे चलकर तलाक का रूप ग्रहण कर लेती है। आज विशेष रूप से नगरीय क्षेत्रों में तलाकों की संख्या बढ़ती जा रही है जो परिवारों के स्थायित्व के लिए एक खतरा है।

आज के आधुनिक परिवारों में व्यक्तिवादिता बड़ी तेजी से बढ़ती जा रही है। व्यक्ति आज अपने परिवार, माता-पिता, भाई-बहनों या अन्य निकट के रिश्तेदारों की चिन्ता नहीं करते हुए अपने ही स्वार्र्थ की पूर्ति में लगा रहता है। इससे पारिवारिक संगठन पर कुप्रभाव पड़ता है। अब परिवार के सदस्यों में उतना सहयोग व त्याग की भावना नहीं पायी जाती जितनी कुछ समय पूर्व तक पायी जाती थी। आज परिवार की नियन्त्रण शक्ति पहले की तुलना में काफी घटी है।

आज परिवार के अनेक कार्य अन्य समितियों ने छीन लिये है। राज्य के कार्यों एवं महत्व का विस्तार हुआ है। राज्य ने बालकों को शिक्षा प्रदान करने का दायित्व अपने पर ले लिया है। परिवार की नियंत्रण-शक्ति घटी है और राज्य की नियन्त्रण-शक्ति बढ़ी है। राज्य विभिन्न अधिनियमों के माध्यम से विवाह और परिवार को काफी कुछ प्रभावित कर रहा है। इतना सब कुछ होते हुए भी यह नहीं कहा जा सकता कि परिवार का स्थान और कोई संस्था ले लेगी।

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखे तो परिवार के कार्यों अथवा प्रकार्यो में काफी परिर्वतन आए है। लोग हर दिन नई-नई बातों को सीखते है, जानते और समझते रहते है जिससे उनके मस्तिष्क में परिर्वतन की अभिलाषाएं प्रतीत होती है। आज का युग प्रतियोगिता का युग है । समाज में आज हर व्यक्ति एक दूसरे से आगे बढऩा चाहता है और वह अपने जीवन में एक सफल व्यक्ति के रूप में अपने आप को प्रस्तुत करता है। हर व्यक्ति का मूल मंत्र है एक सफल और कर्मठ व्यक्तित्व को प्रस्तुत करना।

बिन्दा कुमारी

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