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नए अध्याय की शुरुआत 

नए अध्याय की शुरुआत 

दुनिया के सामने फिर एक ऐसा उदाहरण पेश हुआ जो काबिल-ए-तारीफ है। नोबेल कमेटी ने इस बार जो कदम उठाया उसकी जितनी भी तारीफ की जाए कम है। कमेटी ने ये साफ कर दिया कि जीवन का गीत गाने वाले ही श्रेष्ठ गायक हैं। अमेरिकी गीतकार एवं गायक बॉब डिलन को इस बार साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार दिए जाने का ऐलान कुछ यही जाहिर करता है। हालांकि ये सच भी है लेकिन यह निर्णय विवादस्पद विचारधारा वाले लोगों को नागवार भी गुजऱ सकता है। वस्तुत: आज भौतिकता इतनी आगे बढ़ गई है कि इंसान की शख्सियत गौण होती जा रही है। रातों-रात आगे जाने क़ी आपाधापी ने इंसान को इंसान का दुश्मन बना कर रख दिया है।

यही वजह है कि व्यक्तित्व कहीं अंधेरे में गुम होता जा रहा है, ऐसे में अमेरिकी गीतकार एवं गायक बॉब डिलन को नोबेल दिया जाना अपने आप में अविस्मरणीय पल होगा। ये पहला मौका है जब किसी गीतकार को साहित्य का नोबेल दिया जाएगा। 1901 से अब तक 115 वर्षों में 109 विशिष्ट व्यक्तित्वों को यह नोबेल मिला, लेकिन ये पहला मौका है जब किसी गीतकार को साहित्य के लिए नोबेल दिया जा रहा है। दरअसल 75 साल के डिलन ने अमेरिका की महान गीत-परंपरा में कविता की एक नई अभिव्यक्ति लाने का सराहनीय कार्य किया।

बताते चलें की डिलन ने 54 साल तक खुद की ही खोज जारी रखी। अपने अंदर खुद को तलाश करने की जद्दोजहद ने उन्हें अंदर से अति परिपक्व बना दिया और समाज के सामने उन्होंने एक अनुकरणीय उदाहरण पेश किया, जो अब नोबेल अवार्ड के ऐलान के रूप में सबके सामने है। हालांकि 1997 में इटली के डारिओ फो को भी साहित्य के लिए नोबेल मिला था। डारिओ भी डिलन की तरह गीतकार थे ,लेकिन उन्हें ड्रामा राइटर के लिए नोबेल दिया गया था, जबकि डिलन को गीतकार के रूप में नोबेल दिए जाने की घोषणा की गई है जो अपने आप में एक सराहनीय उदाहरण है। एक गायक-गीतकार को नोबेल देकर नोबेल कमेटी वास्तव में साहित्य जगत को एक नया आयाम जरूर दे देगा, इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं। कहा जा सकता है इन दिनों दुनिया में रची जा रहीं ज्यादातर रचनाएं औचित्यहीन हैं या फिर उनकी प्रासंगिकता सवालों के घेरे में है। ऐसे में बॉब डिलन ने औचित्यपूर्ण गीतों को आवाज देकर आम आदमी के दु:ख-दर्द को रेखांकित किया है। उनके गीतों में इंसानी दर्द की अनुभूति है, जिन्हें सहज ही महसूस की जा सकती है।

नोबेल कमेटी ने डिलन की इस प्रासंगिक आवाज को पहचाना और आखिरकार उन्हें नोबेल के लिए चुना। इस पर यह कहा जा सकता है कि जो इंसान समर्पण और लगन के साथ सार्थक दिशा में लगा रहता है, उसकी पहचान जरूर की जाती है और प्रतिभा का मूल्यांकन जरूर होता है। दरअसल बॉब डिलन ने 1959 में मिनिसोटा के एक कॉफी हाउस अपने म्यूजिक करियर की शुरुआत की थी। इसके बाद वे लगातार आगे बढ़ते रहे। 1960 के दशक में वे काफी लोकप्रिय हुए। उन्हें अमेरिका की तकलीफें बताने वाला अनौपचारिक इतिहासकार भी कहा जाता है। उन्होंने 54 सैलून में 70 एलबम निकले, 653 गाने गाए और 6 किताबें खुद लिखीं। बॉब ने परंपरा से अलग हटकर बिल्कुल अलग तरह के गीत लिखे। उनके गीतों आम इंसान का दु:ख दर्द है। अलग तरह के गाने लिखने के कारण बॉब कई बार विवादों में भी आय। लीक से अलग हटकर काम करने वाले बॉब डिलन को साहित्य के लिए नोबेल दिए जाने को लेकर भी कुछ लोग विवाद खड़े कर सकते हैं, इसमें कोई शक नहीं, लेकिन वास्तव में नोबेल कमेटी का प्रयास सराहनीय है। आपको बताते चलें कि भारत में साहित्य का पहला नोबेल पुरस्कार भी एक ऐसे रचनाकार को मिला जिनकी रचनाएं मूलत: गेय थीं। वह साहित्यकार थे कविगुरु रविन्द्र नाथ टैगोर। ‘गीतांजली’ के रचनाकार रविन्द्र नाथ टैगोर ही थे जिन्हें पहली बार नोबेल दिया गया था। इसके बाद इस पुरस्कार पर तत्ववेत्ताओं ने लगातार कई वर्षो तक अधिकार जमाये रखा और अब एक बार फिर से नोबेल कमेटी ने इतिहास दुहराया है और एक सराहनीय कदम उठाते हुए एक ऐसे गीतकार और गायक को यह सम्मान देने का ऐलान किया है जो वास्तव में आम आदमी का गीतकार रहा।

नोबेल कमेटी द्वारा लिए गए इस फैसले के बाद भारत के रचनाकारों को भी गंभीरता से सोचने की जरूरत है। फूहड़ और अश्लील रचनाएं आपको आर्थिक लाभ और क्षणिक लोकप्रियता दिल सकतीं हैं मगर साहित्य का शीर्ष मकाम नहीं दिल सकतीं हैं। शीर्ष पर आपको कालजयी रचनाएं ही पहुंच सकतीं हैं। इसके लिए भारत के रचनाकारों को नए सिरे से सोचने की जरूरत है।

देखा जाए तो कविताओं में जो लय होनी चाहिए वह गायब होती जा रही है। हालांकि हर कविता गेय नहीं हो सकती लेकिन इसके बावजूद भी उसमें लयात्मकता होनी चाहिए। साहित्य हर जाती और देश में रहा है और अनंतकाल तक रहेगा। जरूरत है इसकी महिमा और गुणवत्ता को बरकरार रखने की। भारत में भी अपरिमित संभावनाएं हैं। सही दिशा में कार्य करने की आवश्यकता है। अगर सही दिशा में कार्य किया गया तो इसका मूल्यांकन जरूर होगा। नोबेल कमेटी के इस फैसले से भारतीय रचनाकारों को सबक लेना चाहिए। अंत में नोबेल कमेटी के इस फैसले पर मेरा साधुवाद। वस्तुत: नोबेल कमेटी ने फिर से एक नए अध्याय की शुरुआत कर दी है।

संजय सिन्हा

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