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बहालियों में गोरखधंधों का साम्राज्य

बहालियों में गोरखधंधों का साम्राज्य

समाज के प्रत्येक व्यक्ति को जीवन जीने हेतु मूलभूत आवश्यकता के तहत रोजगार एक महत्वपूर्ण पड़ाव होता है। यह वह पड़ाव है जहां से व्यक्ति के बहुमुखी विकास का रास्ता भी साफ होता है। हम अपने नौनिहालों को अच्छी से अच्छी शिक्षा महज इसलिए नहीं दे रहे हैं कि व्यक्ति की नैतिकता का विकास हो, ताकि वह समाज का एक हिस्सा बने, लेकिन इसलिए अवश्य ऐसा हो रहा है, क्योंकि आर्थिक प्रगति के इस युग में रोजगार का महत्व प्राचीन काल की नैतिक शिक्षाओं पर बेतरतीब तरीके से हावी होता जा रहा है।

यहां यह तथ्य इसीलिए अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है कि रोजगारनामा ही जिन्दगी का असली मुकाम बनता जा रहा है। इसमें कोई आपत्ति भी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि समय-दर-समय स्थितियों में बदलाव अवश्यम्भावी होता है। अत: आज नैतिक शिक्षा बलवती न होकर रोजगार ही महत्वपूर्ण हो गया है। यह कितना महत्वपूर्ण है इसकी गंभीरता अभी— अभी के उदाहरण दिल्ली महिला आयोग की प्रमुख स्वाति मालिवाल और उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दारोगा बहाली परीक्षाओं में अनियमितता को लेकर विभिन्न एजेंसियों और माननीय कोर्ट के फटकार से लगाई जा सकती है। व्यापम की भ्रष्टाचारी व्यापकता का अनुमान तो पहले ही लग चुका है।

इलाहाबाद हाइकोर्ट के चीफ जस्टिस की बेंच द्वारा उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष की फजीहत इसी मामले को लेकर पूर्व में की जा चुकी है। यह आयोग तो मुलायम तबेला एवं यादव लोक सेवा आयोग के रूप में काफी सुर्खियां भी बटोर चुका है। यहीं माध्यमिक शिक्षा आयोग के चैयरमैन को इन्हीं गोरखधंधों के कारण अपने पद से हाथ धोना पड़ा। यही हाल 2011-12 के बिहार लोक सेवा आयोग के अन्तिम परीक्षा परिणामों में एक विषय विशेष दर्शनशास्त्र के साथ स्केलिंग और मॉडरेशन का घिनौना खेल खेला गया था, जिसके मामले कोर्ट में काफी चर्चित भी रहे थे। खैर, बिहार लोकसेवा आयोग को कोई बूढ़ा लोक सेवा आयोग कहता है तो कोई बदहाल लोक सेवा आयोग।

असल में ये लोक सेवा की जगह लोक मेवा आयोग ही कहे जाने चाहिए। एक आम आदमी काफी सपने संजो कर अपनी जीवन भर की कमाई बच्चों पर खर्च महज आयोगों की पौ बारह करने के लिए नहीं करता है। सरकारों के पास जनता की खून पसीने की कमाई का पैसा होता है सो इनका दुरूपयोग कर वह अक्सर ऐसे मामलो में जीत ही जाती है। ऐसे ही कुछ मामले झारखण्ड लोग सेवा आयोग की प्रथम दो परीक्षाओं में मिला तथा ऐसे लोगों का चुनाव देश के शासन को संभालने के लिए किया गया, जिनको ढंग से एक पत्र भी लिखना नहीं आता था। इन्हीं आरोपों के कारण जेपीएससी के तत्कालीन अध्यक्ष दिलीप प्रसाद जी को जेल भी हुई। पंजाब राज्य में कुछ वर्ष पहले डी.एस.पी. पद के कुछ अधिकारियों की नियुक्तियां ही कुछ वर्षों के बाद रद्द कर दी गयीं।

हरियाणा के बारे में कहावत प्रचलित थी कि खोखों में नोट भरो और मन माफिक रोजगार पाओ। यह सब श्री ओमप्रकाश चौटाला के राज्य में इंतहा को प्राप्त हो गया था। पर आज कारागार ही उनका आवास है। किन्तु हुड्डा की कांग्रेस सरकार ने भी स्व जाति के लोगों को भारी रूप से बहला किया। अभी कुछ समय पूर्व दिल्ली विश्वविघालय में भी संघयुक्त सरकार में सबसे ज्यादा नियुक्तियां कांग्रेसियों की ही हुईं, क्योंकि कुलपति साहब कांग्रेस की विरासत से आते थे। यहां भी एक जाति विशेष को बहाल करने का आरोप भूतपूर्व कुलपति पर लगता रहा है लेकिन फिर भी कांग्रेसी और वामपंथी पुरजोर तरीके से भगवाकरण का अनर्गल प्रलाप करते हुए नहीं थकते।

अब सवाल यह उठता है कि जिस अभ्यर्थी के पास किसी भी तरह की वांछित योग्यता नहीं है, लेकिन बशर्ते वह योग्य है, तो उसके पास क्या रास्ते बचते हैं। उस योग्यता के लिए उसके क्या मायने रह जाते हैं। यह एक यक्ष प्रश्न बनता जा रहा है। 16वीं लोकसभा के पश्चात् आई मोदी सरकार ने आते ही सी एवं डी ग्रेड की नौकरियों से इंटरव्यू की प्रक्रिया को समाप्त तो कर दिया, लेकिन ए एवं बी ग्रेड की परीक्षाओं में हो रहे घोटालों का कौन रखवाला है। आज कमोबेश हर राज्य में उच्च नौकरियों के साक्षात्कार भ्रष्टाचार की गिरफ्त में हैं। उत्तर प्रदेश को ही लें यहां इंटरव्यू में पी.सी.एस. की परीक्षाओं में 200 में से 132 अंक देने की उगाही होती है। बिहार लोक सेवा आयोग के लेक्चरर के होने वाले इंटरव्यू संभवत: उगाही न हो पाने के कारण ही रद्द कर दिये गये हैं। इसका कारण यह होता है कि यदि आपने मुख्य परीक्षा पास भर कर ली है तो लगभग इतने अंक इंटरव्यू में प्राप्त कर नौकरी अवश्य प्राप्त कर सकते हैं। उच्च शिक्षा आयोग में तो क्या टी.जी.टी., क्या पी.जी.टी. क्या असिस्टेंट प्रोफेसर, क्या प्रिंसिपल सब पदों के इंटरव्यू में बिना रकम के काम ही नहीं हो सकता है। स्वयं एक उच्च अधिकारी की हालिया स्वीकारोक्ति ने तो रोजगार में मलाई वाले रोजगार अर्थात डी.एम. पद के लिए 70 लाख रुपये की बात कहकर सनसनी अवश्य फैला दी, परन्तु अनुमान है कि इस भारी भरकम कमाऊ पद के लिए यह रकम प्रतिवर्ष की दर से ली जाती होगी।

मतलब साफ है कि चहुंओर गोरख-धंधों का साम्राज्य फैल चुका है। कहीं सरकार चाहती है कि न्यायिक नियुक्ति आयोग के रास्ते उसे जजों को लगाम लगाने का काम मिल जाये तो माननीय जज भी कॉलोजियम व्यवस्था के तहत अपने चहेतों को जज की कुर्सी तक पहुंचाने का पुश्तैनी पेशा बरकरार रखना चाहते हैं। सारी लड़ाई प्रतिस्पर्धा के सहारे अपनों को भरने की ही है। चाहे वह कोई भी रोजगार हो, कोई जातिवाद के रास्ते, कोई क्षेत्रवाद के रास्ते, कोई पद की बोली लगवाकर हर हाल में हर व्यक्ति स्व को संतुष्ट करना चाहता है। पर सबसे मूलभूत समस्या यह है कि ये कितने लोग हैं जो अपनी मर्जी से बहालियों को प्रभावित कर रहे हैं। गौर करने पर यही बात सामने आती है कि इस देश में महज 5-8: लोग ही ऐसे हैं जिनके परिवारों में नौकरीनुमा शख्स उमड़-घुमड़ रहा है लेकिन अभी भी लगभग 90-93: लोगों का सहारा भगवान भी नहीं बन पाया है। आज ऐसी कोई भी नौकरी नहीं बची जहां आप बिना सिफारिश या किसी इसी तरह की विशेष योग्यता के अभाव में प्राप्त कर सकते हैं। कमोबेश पूरे भारत की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है।

इसी कड़ी में अभी दिल्ली की सरकार द्वारा महिला आयोग की चुनी गयी अध्यक्ष ने भी किया, जो कि जांच का विषय बन चुका है। स्वयं मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के खिलाफ भी जब एफ.आई.आर. दर्ज हुई तो आनन में जनाब ने इसे अपने लिए गलत कहा है जबकि जगजाहिर है कि स्वाति मालिवाल किनकी चहेती हैं। इसीलिए उन्होंने अपने कार्यकत्र्ताओं को सैकड़ों की संख्या में भर लिया। हद तो भारत सरकार के केन्द्रीय दिल्ली विश्वविघालय की बहालियों से उजागर होती हैं। यहां एक प्रिंसिपल और टीचर इंचार्ज क्लास वन की नौकरी की बंदरबांट करते दिखते हैं। वहीं एडहॉक सिस्टम के उम्मीदवारों ने अभी-अभी राष्ट्रपति से गुहार लगाकर अपनी स्थायी नियुक्ति मांगी है। सोचिये दो लोगों द्वारा चुने गये व्यक्ति देश की संभ्रान्त पगार पर स्थायित्व चाहते हैं। इस स्थायित्व के लिए योग्य होते हुए गॉडफादर के अभाव वाले का कोई मालिक नहीं। अत: यह पुस्तैनी मालिकाना हक समाप्त होना चाहिए ताकि योग्य और जरूरतमंदों को भी मौका मिल सके।

आर.के. चौहान

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