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हिन्दू पुनर्जागृति की ओर

हिन्दू पुनर्जागृति की ओर

दक्षिण भारत के प्रसिद्ध सबरीमला मंदिर में रजस्वला महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी की परंपरागत प्रथा के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई है। किंवदंती यह है कि  इस मन्दिर के अधिष्ठाता देव ‘अयप्पन’ ब्रह्मïचारी हैं इसलिए रजस्वला महिलाओं के स्पर्श से दूर रहते हैं।

केरल सरकार ने पहले धार्मिक आस्था और पुराने रीति-रिवाजों का हवाला देकर महिलाओं के मन्दिर में प्रवेश पर रोक को जायज ठहराया था, लेकिन वहां सत्ता बदली तो राज्य सरकार ने 8 अक्टूबर को सबरीमला मन्दिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक को यह कहकर हटा दिया की मन्दिर में कौन प्रवेश करेगा, कौन नहीं, यह तय करने का अधिकार मन्दिर को नहीं है।

इस घटना के संदर्भ में यह भी देखा जाना चाहिए कि कुछ दिन पहले ही खबर आई कि सर्वोच्च न्यायालय की एक संविधान पीठ विञ्जिान्न राजनीतिक दलों के चुनाव प्रचार के समय ‘धर्म का प्रयोग करने’ जैसे विषय पर चर्चा कर रही है, जिसमें ‘हिन्दुत्व’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ जैसे शद्ब्रदों का असल मतलब पूछा जा रहा है। यह घटना मुझे पिछले वर्ष की एक घटना की याद दिलाती है। एक बड़े ही महत्वपूर्ण देश के राजनयिक जो अपने तीन वर्ष के  कार्यकाल के पश्चात की अन्तिम विदाई समारोह में अपने भारतीय मित्रों तथा अपने सहपाठियों को संबोधित करते हुए ञ्जाारत जैसे महान देश के अपने अद्भुत अनुभव को साझा किया। उन्होंने एक बड़ी ही महत्वपूर्ण बात कही कि मैने यहा आने से पहले हिन्दू और हिन्दुत्व के बारे में बहुत सुना था और मैने यह सोचा था की मैं अपने कार्यकाल के दौरान इस प्राचीन और महान धर्म को यहां आकर बड़े स्पष्टता से अध्ययन करूंगा। लेकिन यहां आने के बाद मैंने यह देखा कि भारत के अधिकतर बुद्धिजीवी हिन्दुत्व  की अपेक्षा इस्लाम और इसाईयत के पक्ष में कुछ ज्यादा ही झुकाव रखते थे और हिन्दुत्व की तीक्चाी आलोचना करते थे।

जिस देश में 80 प्रतिशत हिन्दू हैं, वहां हिन्दुत्व को जिस दृष्टि से देखा जाता है, उससे राजनायिक खुश हुए या दुखी, यह उन्होंने नहीं बताया। लेकिन हमारे हिन्दू पत्रकार मित्र की पुक्चता राय थी कि हिन्दुत्व पुरे संसार में सबसे बेकार, अवैज्ञानिक धर्म है जो जातिवाद, असमानता और उत्पीडऩ को बढ़ावा देता है। लेकिन मेरे मित्र मेरी इन बातों को समझ नही पाये कि हर महान धर्म और सञ्जयताओं में अछाइयां और कुरीतियां होती हैं।  इसके बावजूद यह हिन्दू धर्म ही है जहां महिलाओं को देवी के रूप में पूजा जाता है। वहीं दूसरी तरफ  इस्लाम में महिलाओं को पुरुषों की अपेक्षा कम अधिकार है और अभी कुछ समय पहले तक कितने ऐसे विकसित ईसाई देश थे जहां महिलाओं को मतदान करने का अधिकार नही था। मैने अपने मित्र से कहा कि जातिवाद की अवधारणा अत्यधिक वैज्ञानिक आधार पर थी। उसमें श्रम  के बंटवारे के सिद्धान्त को स्वीकार किया, जिसका स्पष्ट मतलब है एक सिद्धान्त जो सुनिश्चित करता है की समाज का हर वर्ग अपना योगदान दे। हां, यह सत्य है कि यह सिद्धान्त उस समय खराब होगया जब किसी का जीवन कार्य के बजाय उसके जन्म के आधार पर तय किया जाने लगा। इसको सुधारने की आवश्यकता है। लेकिन इसका कोई ये मतलब नही कि अच्छाई के लिए हिन्दुत्व को हिन्द महासागर में प्रवाहित कर देना चाहिए।

वास्तव में दुसरे धर्मो से अलग हटकर, हिन्दुत्व देवी-देवताओं की बहुलताओं के रूप में बहुलतावाद को बढ़ावा देता है, जिसके अनुसार किसी भी हिन्दू पर कोई एक देवी-देवता की पूजा करने की बाध्यता नहीं होती और ना ही यह किसी भी देवी-देवता की किसी एक नियमानुसार पूजा-अर्चना करने के लिए दबाव डालता है। असल में हिन्दुत्व उनका भी सम्मान करता है जो पूजा-अर्चना नहीं क रना चाहते हैं। हिन्दुत्व अपने आप में समावेश करने वाला है। यह अपने मानने वालों पर अपने आप को नहीं लादता इसलिए दूसरों द्वारा पैदा की गई गतिविधियों के पीछे इसका दबाव होने का प्रश्न ही नहीं उठता।

इस जीवन का सिद्धान्त प्राचीन समय से इस भूमि पर वास करने वाले लोग सफ लता पूर्वक अभ्यास करते और मानते हैं। यही कारण था कि वे सकाओं और छूणों की घुसपैठ को स्वीकार करते हुए उन्हे अपने समाज में सम्मलित कर लिया। यही कारण था कि उन्होने ज्यूस, पारसी, शिया मुस्लिम और इसाईयों को  इस धरती पर जगह दी जो अपने देश मे उनके विचारधारा को जगह न मिलने से यहां एक शरणार्थी के रूप में आये थे। वो उस समय इस धरती पर एक अल्पसंख्यक के रूप में थे। महत्वपूर्ण बात यह है कि उस समय उनकी रक्षा करने के लिए ना तो कोई संविधान और ना ही पंथनिरपेक्ष लोग थे। वो हिन्दू ही थे जिन्होंने उनके जीवन की रक्षा की। हिन्दुत्व का विवादरहीत होना केवल एक सिद्धान्त भर नहीं है, बल्कि यह अञ्जयास किये जाने वाली एक जीवन पद्धति है, जिसका सदियों से अनुसरण किया जा रहा है। लेकिन मेरे पत्रकार मित्र को हिन्दुत्व के इतने महीन गुणों को सुनने के पश्चात ञ्जाी संतोष नहीं हुआ।

असल में मेरा यह मित्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के बहुत बड़े प्रशंसक है। जो नेहरूवियन धारा के साथ हमेशा खड़ा रहते है । नेहरू ने कई बार स्वीकार किया है कि वे शिक्षा से एक अंग्रेज, दृष्टि से अंतराष्ट्रवादी, संस्कृति के हिसाब से मुस्लिम और केवल दुर्घटना से हिन्दू धर्म में जन्म लेने के कारण हिन्दु हुं। 1953 में नेहरू ने कैलाश काटजू को लिखे पत्र मे कहा था कि ‘हिन्दू धर्म को मानने वाला हर हिन्दू बाकि देशों के लोगों की तुलना में ज्यादा संकीर्ण सोच का होता है’। यह कहना गलत नही होगा कि नेहरू हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति,  हिन्दू समाज और औसतन हिन्दुओं के प्रति अपमानजनक सोच रखते थे।

1956 में नेहरू ने हिन्दू पर्सनल लॉ को श्रेणीबद्ध तो कर दिया, जिसके अन्तर्गत तालाक, हिन्दू रिति-रिवाज और हिन्दू अनुष्ठान जैसे  महत्वपूर्ण कानून आते है। लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ को बिना छुए ज्यों का त्यों छोड़ दिया। यही कारण था कि जे बी कृप्लानी ने नेहरू को साम्प्रदायिक करार देते हुए हिन्दू कोड बिल का विरोध किया था। कृप्लानी ने कहा था कि यदि आप हिंदुओं के लिए तलाक का प्रावधान करना चाहते हैं तो कीजिए लेकिन यह कैथोलिक समाज के लिए भी आवश्यक होना चाहिए। यह लोकतांत्रिक होगा, लेकिन आप जो कर रहे हैं वह बिल्कुल साम्प्रदायिक है।

उन्होंने कहा कि केवल महासभा वाले ही साम्प्रदायिक नहीं है बल्कि यह सरकार भी सम्प्रदायिक सोच रखती है। उन्होंने नेहरू को कहा था कि मैं आपको साम्प्रदायिक करार देता हूं क्योंकि आप केवल हिन्दू पर्सनल लॉ को ही श्रेणीबद्ध कर रहे हैं । आपको मुस्लिम समाज को भी इसके अन्तर्गत लाना चाहिए। यह मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि मुस्लिम समाज इस सुधार के लिये तो तैयार हैं पर आप इसके लिये तैयार नहीं हैं ।

यह नेहरूवियन पंथनिरपेक्षता ही थी कि उस समय की सरकार ने विश्वनाथ, तिरूपती, पुरी, नाथद्वारा और गुरूवायूर जैसे मन्दिरों पर ट्रस्ट नियुक्त कर दिया । केरल में तो मन्दिर मामलों के मंत्री (कदाकमपाली सुरेशन) हैं जो सबरीमाला में एकत्रित धनराशी की जानकारी तो रखते हैं, लेकिन यही सरकार मस्जिदों, चर्चों और गुरूद्वारों की संपति संबंधित जानकारी इकट्ठा करने को साम्प्रदायिक मानती है।

यह नेहरूवियन सोच ही है जो अपने समर्थकों को प्रेरित करने के लिए हिन्दू आचार्यों का खुलेआम विरोध करती है और बात जब फतवा और हुकुम जारी करने वालों के विरूद्ध होती है तो उसे साम्प्रदायिक माना जाता है।

हिन्दू समुदाय को कमजोर बनाये रखना, उनमें मतभेद पैदा करना, उनकी संस्कृति को नीचा दिखाना और किसी भी तरीके से उनका अपमान करना नेहरूवाद के हिन्दू विरोधी  रुख  की पहचान है।  इन सब वजहों से हिन्दू आज एक बहुत ही खराब दौर से गुजर रहे हैं। इस कारण हिन्दू आज न सिर्फ  धार्मिक बल्कि सामाजिक और राजनितिक समस्यायों से घिरे हुए हैं । साथ ही ना सिर्फ  बाहरी तौर पर बल्कि अंदरूनी झंझावातो से भी जूझ रहे हैं। अगर अलग नजरिये से देखा जाए तो जब तक नेहरूवाद भारत की सरकारी मानसिकता में जड़ जमाये रखेगा तब तक  देश में हिन्दुओं को अलग-थलग करने की कोशिश और वोट बैंक की राजनीति जारी रहेगी। फिर इसका उपाय क्या है? इसका उपाय हिन्दू पुनर्जागरण है जो की समावेश करने के उद्देश्य का हो ना की अल्पसंख्यको के खिलाफ जैसा की मैंने पहले भी कहा है एक वास्तविक हिन्दू कभी भी एक गैर हिन्दू के हितों को नुकसान नहीं पहुंचा सकता।  इसलिए इस हिन्दू पुनर्जागरण में हमारे मुस्लिम और ईसाई भाइयों को भी साथ आना चाहिए।  इसके लिए मैं कुछ सुझाव देना चाहूंगा :-

एक वृहत्तर संगठन की जरुरत है जहाँ हिन्दू शिक्षा, शोध और प्रशिक्षण की व्यवस्था हो जिसमे धर्म, दर्शन, संस्कृति और इतिहास के विभिन्न विभागों की पढाई भारतीय भाषाओ में हो।

सामाजिक बुराइयों जैसे दहेज, सती और अश्पृश्यता का पूरी तरह से भत्र्सना करना और लोगों को जागरूक करना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बुराइयां हिन्दू धर्म शास्त्रों के विरुद्ध हैं।

यह बहुत जरुरी है की एक बड़े मास मीडिया संस्थान की स्थापना हो ताकि वह बड़े पैमाने पर भारतीय लोगों के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनितिक और सामाजिक मुद्दों पर हिन्दू दर्शन फैला सके। सबसे जरुरी है एकता – चाहे वह मध्यम वर्ग हो, बुद्धिजीवी हो, मीडिया से हो, व्यापारी वर्ग से हो, फिल्म या खेल जगत से हो, अप्रवासी भारतीय हो या फिर कोई भी जो आवाज उठाने की क्षमता रखता हो- ताकि ऐसे लोग एक अभियान खड़ा कर सकें जो इतना मजबूत हो की वोट बैंक की राजनीति को जाति व धर्म से हटा कर प्रदर्शन और सुशासन की ओर मोड़ सके।

Mr.-Prakash-Nanda

प्रकाश नंदा

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