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सेवा संस्कृति के समाज की ओर

सेवा संस्कृति के  समाज की ओर

गत वर्ष एक प्रतिनिधि मण्डल के सदस्य के रूप में मुझे जापान जाने का अवसर मिला, जहां एक अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में कई देशों के सांसद भाग ले रहे थे। अचानक एक सांसद को दिल का दौरा पड़ा। सम्मेलन में भाग लेने वाले न्यूजीलैण्ड के एक अन्य सांसद ने उस पीडि़त सांसद को प्राथमिक चिकित्सा के माध्यम से तब तक होश में बनाये रखा जब तक नियमित चिकित्सा सहायता उपलब्ध नहीं हुई। इसके उपरान्त विशेषज्ञ चिकित्सकों की देखरेख में उपचार प्रारम्भ हुआ। यदि समय पर यह चिकित्सा सहायता उपलब्ध न करवाई जाती तो कुछ भी अनर्थ हो सकता था। इस घटना को देखकर मेरे मन में अचानक यह विचार आया कि प्राथमिक चिकित्सा में पारंगत होना कभी-कभी इतना विस्मयकारी भी हो सकता है कि हम किसी पीडि़त व्यक्ति की जान बचाने में सहयोगी हो सकते हैं।

इस विचार को लेकर मैं भारत वापिस आया। मैंने सांसद के रूप में कई साथियों के साथ प्राथमिक चिकित्सा प्रशिक्षण के बारे में चर्चा की। जब मुझे भारतीय रेडक्रास सोसाइटी के उपसभापति के रूप में कार्यभार संभालने का अवसर प्राप्त हुआ तो इसी सिद्धान्त पर मैंने इस सोसाइटी के प्रमुख अधिकारियों के साथ में विचार-विमर्श किया। अन्तत: इस विचार को क्रियान्वयन में न लाने के लिए हमने हाल ही में एक योजना भी तैयार की है। जिसके अनुसार लोकसभा तथा राज्यसभा के माननीय सदस्यों के साथ एक प्राथमिक चिकित्सा प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया जायेगा। जब मैंने इस योजना की रूपरेखा माननीय उपराष्ट्रपति जी के समक्ष प्रस्तुत की तो उनकी तरफ से मुझे बहुत प्रोत्साहन देने वाली प्रतिक्रिया प्राप्त हुई। उपराष्ट्रपति जी राज्यसभा के पदेन सभापति हैं। कई उच्च अधिकारियों ने तो यहां तक सुझाव दिया कि ऐसे प्रशिक्षण का लाभ शिक्षा पद्धति के माध्यम से भारत के जन-जन तक पहुंचाया जाना चाहिए।

प्रथम चरण में हमारा प्रयास है कि संसद सदस्यों के साथ शीघ्र ही एक शिविर का आयोजन किया जाये। उसके उपरान्त दूसरे चरण में राज्य सरकारों तथा रेडक्रास सोसाइटी की राज्य स्तरीय शाखाओं के समन्वय से यह आयोजन विधानसभा सदस्यों के लिए किया जाये। तीसरे चरण में रेडक्रास सोसाइटी की जिलास्तरीय इकाईयों तथा जिला प्रशासन के समन्वय से पंचायत स्तर पर निर्वाचित सदस्यों तथा नम्बरदार जैसे प्रतिनिधियों को शामिल करके इस प्रकार के प्राथमिक चिकित्सा शिविरों का आयोजन किया जाये। इस प्रकार तीन चरणों में प्राथमिक चिकित्सा की अवधारणा सारे भारत में स्थापित की जा सकती है।

प्राथमिक चिकित्सा प्रशिक्षण में अचानक हृदय रोग जैसी गम्भीर विपत्तियों के अतिरिक्त गर्मी या किसी अन्य कारण से अचानक बेहोशी, वाहन दुर्घटनाओं में पीडि़त होने वाले लोगों की तत्काल चिकित्सा, दुर्घटनाओं या किसी अन्य कारण से खून बहने की रोकथाम, किसी गर्म वस्तु से जलने जैसी दुर्घटनाओं, सांप आदि किसी जहरीले जीव के काटने, नाक से खून बहने, प्रदूषण या किसी अन्य कारण से श्वास गति के रूक जाने, अचानक खांसी का प्रकोप और यहां तक कि अचानक उठने वाले दर्दों या सामान्य ज्वर आदि जैसी आकस्मिक अवस्थाओं से निपटने का पूरा प्रशिक्षण सरल रूप से शामिल किया जा सकता है।

मेरा प्रयास यह भी है कि प्राथमिक चिकित्सा की विभिन्न अवस्थाओं के अतिरिक्त प्रशिक्षार्थियों को कई अन्य प्रकार की स्थानीय आपात स्थितियों से निपटने के लिए भी तैयार किया जा सकता है। आपात स्थिति केवल  भूकंप, भूस्खलन, बाढ़ या सुनामी जैसी दैविक विपदाओं के समय ही उत्पन्न नहीं होती, कभी-कभी सामान्यकाल में भी आपात स्थितियां पैदा हो जाती हैं। अचानक किसी छोटी या बड़ी सड़क का टूट जाना, आंधी, तूफान आदि के कारण सड़कों पर वृक्षों का गिर जाना या किसी भयंकर वाहन दुर्घटना या किसी अन्य कारण से सड़क मार्ग का अवरूद्ध होना आदि भी कभी-कभी स्थानीय स्तर पर एक आपातस्थिति ही पैदा कर देती हैं। ऐसे समय में यदि नजदीकी गांव के पंचायत प्रतिनिधि तथा अन्य लोग सचेत हों तो ऐसी विकट परिस्थितियों का सरल और तुरन्त उपाय कर सकते हैं। अक्सर किसी भी विकट परिस्थिति में नियमित सरकारी सहायता पहुंचने में थोड़ा-बहुत समय अवश्य ही व्यतीत हो जाता है।

यदि हमारी इस विस्तृत योजना का यह तीसरा चरण एक या दो वर्षों में सफल हो जाता है तो हम देश में प्राथमिक चिकित्सा तथा आपदा प्रबन्धन की एक विशाल और देशव्यापी संस्कृति का निर्माण करने में सफल हो पायेंगे। इस सारी योजना की सफलता के बाद हमारे समक्ष एक दीर्घकालीन योजना यह होगी कि प्राथमिक चिकित्सा और आपदा नियंत्रण के इस महत्वपूर्ण विचार को सारे देश की शिक्षा पद्धति के माध्यम से विद्यालयों के एक-एक छात्र और छात्रा के मन-मस्तिष्क में पहुंचाया जाये। इस कार्य में एन.सी.सी. तथा स्काउट्स जैसी इकाईयों को भी शामिल किया जा सकता है।

यदि हमारी यह योजना अपने चार चरण सफलतापूर्वक पार कर गई तो हम अपने देश में एक ऐसी सेवा और सहायता संस्कृति का निर्माण करने में सफल हो पायेंगे जिससे यह स्पष्ट दिखाई देने लगेगा कि इस देश के किसी भी कोने में यदि किसी नागरिक को आपातस्थिति का सामना करना पड़ता है तो उसकी सहायता के लिए अनेकों हाथ प्रस्तुत हो जाते हैं। संकट के समय केवल परिस्थतियों को दोष देने वाले लोगों के स्थान पर संकटमोचक नागरिकों का निर्माण इस सारी योजना का सूत्रबद्ध लक्ष्य होगा।

प्रथम दृष्टि में कुछ लोगों को ऐसा लगता होगा कि दूसरों की सहायता करने में अपना समय और कभी-कभी थोड़ा बहुत धन भी व्यय करना पड़ता है। परन्तु हमारे देश की आध्यात्मिक संस्कृति ही नहीं अपितु साक्षात् विज्ञान भी इस सिद्धान्त को स्वीकार करता है कि जब भी हम किसी दूसरे व्यक्ति की सहायता में अपना कुछ समय या धन खर्च करते हैं तो हमारे अन्दर समाज सेवा का एक व्यापक उत्साह पैदा होता है जो हमारी मानसिकता को मजबूत करते हुए हमें प्रसन्नतापूर्वक जीने और दीर्घायु जैसे लाभ प्रदान करता है।

हमारी सेवा और सहायता कार्यों को देखकर अन्य लोगों में भी जब इसी प्रकार की प्रेरणाएं संचारित होती हैं तो उससे सारे समाज की संस्कृति ही उदार हृदय बन जाती है। सेवा कार्यों में लगे व्यक्तियों के अपने कई प्रकार के शारीरिक और मानसिक रोग भी कम हो सकते हैं। सेवा कार्यों में लगे व्यक्तियों का रक्तचाप और तनाव आदि कभी नहीं बढ़ता। उनके अन्दर एक पवित्र आध्यात्मिक शक्ति का जागरण होने लगता है। इन कार्यों में लगा व्यक्ति यह स्पष्ट महसूस करने लगता है कि उसने अपने जीवन में अपार संतोष और मानव जीवन के उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफ लता अर्जित की है। एक बार जब समाज में सेवा संस्कृति की स्थापना हो जाती है तो समाज की भावी संताने अपने आप ही उस संस्कृति का अनुसरण करने लगेंगी। मेरे मन में इस सारी योजना को लेकर एक ऐसा विचित्र उत्साहजनक भविष्य प्रस्तुत हो रहा है जिसमें निकटवर्ती भविष्य का भारतीय समाज अनेकों धार्मिक और सामाजिक संगठनों की तरह सेवा संस्कृति का ही समाज नजर आयेगा।

आखिर कब तक हमारे समाज की राजनीति और इस पेशे से जुड़े बहुतायत कार्यकर्ता केवल पदों की प्राप्ति, निर्वाचन प्रक्रिया की धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार जैसे उद्देश्यों को लेकर समाज के भौतिक विकास का ढोंग करते रहेंगे। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के स्वप्न – ‘सबका विकास सबका साथÓ को पूरा करने का एक ही उपाय है कि हम अपने समाज की राजनीति के साथ सामाजिकता का मार्ग एक आध्यात्मिक और देशभक्तिपूर्ण विचार के साथ प्रगाढ़ रूप में जोड़ दें। जो लोग अपनी राजनीति को सच्चे मन से सामाजिक स्वरूप प्रदान करेंगे आने वाला भविष्य केवल उन्हीं का नेतृत्व स्वीकार करेगा।

(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व भारतीय रेड क्रॉस सोसायटी के उपाध्यक्ष हैं)

अविनाश राय खन्ना

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