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समान नागरिक कानून का मुस्लिम योद्धा

समान नागरिक कानून का मुस्लिम योद्धा

इन दिनों समान नागरिक कानून और तीन तलाक पर बहस जोरों पर है और ज्यादातर मुस्लिम संगठन इनके खिलाफ हैं। कुछ तो इन्हें सरकार द्वारा छेड़ा गया  अंदरूनी युद्ध मानते  है। तीन तलाक की हिमायत करने वाले महिला संगठन भी तीन तलाक के तो खिलाफ हैं मगर समान नागरिक कानून के हिमायती हैं। तब याद आती है मुस्लिम समाज के विद्रोही विचारक और क्रांतिकारी समाज सुधारक हमिद दलवाई की जो जीवनभर समान नागरिक संहिता की पुरजोर वकालत करते रहे। उन्होंने साठ साल पहले 18 अप्रैल 1966 को समान नागरिक कानून लागू करने की मांग को लेकर मुंबई मोर्चा भी निकाला था। उस जमाने में हमिद दलवाई मुस्लिम समाज में  स्त्री पुरूष समता की मुखर आवाज थे। मगर हमिद दलवाई की पहचान इससे आगे यह भी थी कि वे मुस्लिम समाज के ऐसे बिरले विचारक थे जिन्होंने इस्लाम और मुस्लिम मानसिकता का बहुत तटस्थ होकर अध्ययन किया और उसे बुद्धि, तर्क और सेकुलर तथा लोकतांत्रिक मूल्यों की कसौटी पर कसने की कोशिश की और उनके आधार पर मुस्लिम समाज को बदलने का अभियान चलाया।

इन दिनों रास्व संघ के विचारक मागो वैद्य ने समान नागरिक कानून न माननेवालों का वोट का अधिकर खत्म करने का सुझाव दिया है जिस पर काफी विवाद है । इस तरह का सुझाव सबसे पहले हमिद दलवाई ने दिया था। वे समान मुस्लिम कानून को  मुस्लिम समाज के लिए इतना महत्वपूर्ण मानते थे कि इसे न अपनानेवालों को दूसरे दर्जे की नागरिकता देने की  विवादास्पद विकल्प भी पेश करते थे। वे  अपने  हिन्दू दोस्तों से कहते थे कि आप  मुसलमानों से साफ साफ कहिए कि उन्हें इस देश में समान नागरिकता, समान अधिकार और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता दी गई है इसलिए उन्हें समान नागरिक कानून को स्वीकार करना चाहिए। अगर वे यह स्वीकार करने को तैयार नहीं  हैं तो उन्हें दूसरे दर्जे की नागरिकता दी जानी चाहिए। मुसलमानों को समान नागरिक कानून या दूसरे दर्जे की नागरिकता इन दो विकल्पों में से एक विकल्प को चुनने की छूट मिलनी चाहिए।कम से कम इस विकल्प का प्रचार तो किया जाना चाहिए। लेकिन कोई यह बात कहने को तैयार नहीं है और जब मेरे जैसा कोई बोलने लगता है तब हिन्दू तक कहने लगते हैं कि यह हिन्दू साप्रंदायवादियों से ज्यादा हिन्दू है। इसे क्या कहा जाए?

मुसलमानों की सेकुलरिज्म के प्रति आस्था को लेकर वे आशंकित थे। उनका मानना था कि हिन्दू और पश्चिमी देश जिस रूप में सेकुलरिज्म को स्वीकार हैं उस रूप में  मुसलमान स्वीकार नहीं करते । मुसलमानों ने उसका सुविधाजनक अर्थ निकाला है कि उनके  धार्मिक कानून में हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा जो उनके हिसाब से अपरिवर्तनीय है। यदि सरकार को मुसलमानों के इस अर्थ को स्वीकार करना है तो उसे  हिन्दुओं को मनुस्मृति के मुताबिक सामाजिक आचरण करने की इजाजत देनी चाहिए।मगर सत्ताधारियों नें धर्मनिरपेक्षता का दोहरा अर्थ लगाया है मुसलमानों के मामले में हस्तक्षेप नहीं करना और हिन्दुओं के मामले में हस्तक्षेप करके सुधार कराना ।

राजनीतिक शास्त्री रामजंद्र गुहा ने अपनी पुस्तक- मेकर्स आफ माडर्न इंडिया – में हमिद दलवाई को भी शामिल किया तब लोगों ने इस पर आश्चर्य प्रकट किया क्योंकि उसमें लोकमान्य तिलक,गोपाल कृष्ण गोखले .आंबेडकर,ज्योतिबा फुले और ताराबाई शिंदे जैसे नाम है। मुस्लिमों में अबुल कलाम आजाद के बजाय हमिद दलवाई का नाम रखा जिसे लोग कम ही जानते हैं।। इसके जवाब में गुहा ने लिखा है कि आजाद की तुलना में मैंने हमिद दलवाई को इसलिए चुना क्योंकि आजाद स्कॉलर और राष्ट्रवादी थे पर उनके लेखन में आज की समस्याओं के बारे में कुछ नहीं हैं।

Layout 1दूसरी तरफ मुस्लिम समाज जीवन से जुड़े हर मुद्दे को उठाना दलवाई की खासियत रही भले ही उनके विचार मुस्लिमों को बहुत रास नहीं आए। महाराष्ट्र में जन्मे मराठी के साहित्यकार हमिद दलवाई केवल 44 वर्ष तक ही जिये मगर उन्होंने इस्लाम का धर्मशास्त्र, दर्शन, इतिहास और वर्तमान,हिन्दू मस्लिम संबंध,समान नागरिक कानून,सेकुलरिज्म आदि सभी मुद्दे उठाए है । उनकी सबसे चर्चित पुस्तक है मुस्लिम पॉलीटिक्स इन इंडिया। इसके अलावा मुस्लिम राजनीति और सांप्रदायिकता के अंतर्विरोधों को उजागर करने वाले उनके लेख और भाषण भी नई राह दिखाते हैं। उनका उपन्यास ईंधन और कहानियों का मराठी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने  रेशनलिस्ट मुस्लिम सत्यशोघक  मंडल की भी स्थापना की । वे डा. लोहिया के अनुयायी थे लेकिन विचारक के तौर पर उनका अलग व्यक्तित्व था मगर अपनी क्रांतिकारी सोच के कारण दलवाई मुस्लिम समाज में आउट साइडर ही रहे । मगर अक्सर लगता है यदि मुस्लिम समाज को कट्टरतावाद, सामाजिक पिछड़ापन से मुक्ति पाकर हिन्दू मुस्लिम एकता को मजबूत बनाना है तो उन्हें दलवाई की राह अपनानी होगी।

हमेशा अपने को मुसलमान मानने वाले  हमिद दलवाई के विचार मुस्लिम समाज के लिहाज से बेहद क्रांतिकारी थे जो इस्लाम के  बुनियादी सिद्धांतो के बारे  में सवाल खड़े करते थे। मुस्लिम समाज की यह त्रासदी रही है कि उसमें समाज सुधारक कम हुए और जो हुए उनमें से बहुत कम ने बुनियादी सिद्धांतो पर कोई सवाल नहीं उठाए। उन्होंने इस्लामी धर्मशास्त्रों की चौखट कभी नहीं  लांघी लेकिन दलवाई ने कभी इस चौखट को स्वीकार ही नहीं किया। वे इस्लाम के सबसे केंन्द्रीय व्यक्तित्व मोहम्मद पैगंबर के बारे में बेबाकी से कहते हैं- मेरा ईश्वर में विश्वास नहीं है। इसलिए मैं नहीं मानता कि मोहम्मद  अल्लाह के पैगंबर थे और कुराऩ ईश्वरीय वाणी है । वे यह भी कहते थे मोहम्मद पैगंबर के बाद कोई और पैगंबर नहीं होगा इस सिद्धांत ने मुसलमानों के वैचारिक परिवर्तन को अवरूद्ध किया है। धार्मिक,सामाजिक ,राजनीतिक क्षेत्रों में यथास्थिति और जड़ता पैदा कर दी है।

भारतीय राजनीति में मुस्लिम सांग्रदायिकता के बढते प्रभाव के बारे में उन्होंने बार बार इस बात को रेखांकित किया कि केवल सत्तारूढ दल ही नहीं गांधीवादी,समाजवादी और कम्युनिस्ट आदि सभी मुस्लिम पूर्वाग्रहों को तुष्ट ही करते रहे । उन्होंने कभी इस्लाम के वास्तविक चरित्र को समझने की कोशिश ही नहीं की। मसलन गांधीवादी कहते हैं कि सारे धर्म समान हैं, इस्लाम की शिक्षाएं उदात्त हैं मगर उनकी ये बातें काल्पनिक और तथ्यहीन हैं । इस्लाम अपने  को सच्चा और सर्वश्रेष्ठ धर्म और बाकी धर्मों को झूठा मानता है। इसलिए कोई जब मुसलमान की तरह मरता है तो ही उसे स्वर्ग प्राप्त होता है। यह सोच सर्व धर्म समभाव की सोच के साथ मेल नहीं खाती ।वास्तव में सर्व धर्म समभाव की सारी आशाएं ऐसी हास्यास्पद सोच पर आधारित है। गांधीजी आदर्श हिंदू कहलाते थे। उनकी यह अपेक्षा थी कि हिन्दू और मुसलमानों को आदर्श हिन्दू और आदर्श मुसलमान होना चाहिए। उनका मानना था कि दोनों आदर्श धर्मों पर आचरण करनेवालों के आपसी संबंध भी आदर्श होंगे। लेकिन  देश में आदर्श अच्छे संबंध के बजाय आदर्श दुश्मनी पैदा होती रही। क्योंकि हर धर्म की आदर्श की धारणा न केवल अलग वरन एक दूसरे के विपरित होती हैं। मगर गांधीवादियों ने कभी इसबात पर विचार ही नहीं किया कि ऐसा क्यों हुआ ?वाम दलों से भी इस बारे में कम गलतियां नहीं हुई । वे  हमेशा मुस्लिम संप्रदायवादियों का मुकाबला करने से बचते रहे।वे अगर सभी धर्म के लोगों के लिए समान नागरिक कानून होने की मांग पुरजोर तरीके से उठाते तो हिन्दू संप्रदायवादियों के मामले में स्पष्ट और द्रढ़ रवैया अपना सकते थे।

समाज सुधार की पहली शर्त होती है समाज का निर्मम आत्मालोचन। यह काम दलवाई ने बखूबी किया । इसके कारण वे हिन्दू और मुस्लिम सांप्रदायिकता को एक ही तराजू में तौलने से इन दोनों सांप्रदायिकताओं में बुनियादी फर्क है। मुस्लिम सांप्रदायिकता मुख्यरूप से इस्लाम के धार्मिक विस्तारवाद की सोच पर आधारित और अक्रामक है।  हिन्दू धर्म में धार्मिक विस्तारवाद की सोच न होने के कारण हिन्दू सांप्रदायिकता का रूप आक्रामक नहीं होता। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता मुसलमानों के प्रति पूर्वाग्रह रखनेवाले सांप्रदायिक  हिन्दुओ  का समूह इस देश में मौजूद है। मगर हिन्दुओं में जैसे सांप्रदायिक तत्व है उसी तरह बड़ी तादाद में उदारवादी भी है। मुसलमानों में उदावादियों का अभाव है। इसलिए उनमें हमेशा कट्टरपंथी ही हावी रहते हैं। जब मुस्लिमों में भी उदारवादी बड़ी संख्या में होंगे और हिन्दू उदारवादियों को उनका समर्थन भी मिलेगा तभी हिन्दू मुस्लिम एकता सही मायने में कायम हो पाएगी।

सतीश पेडणेकर

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