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शुचिता की सर्जिकल स्ट्राइक

शुचिता की सर्जिकल स्ट्राइक

नरेन्द्र मोदी ने मगंलवार को वो कर दिखाया जो आज तक देश का कोई प्रधानमंत्री नहीं कर पाया। भ्रष्टाचार, घूसखोरी, कालेधन, समानान्तर अर्थव्यवस्था और टैक्स चोरी के खिलाफ भाषणबाजी और नारेबाजी तो हर नेता ने की है, मगर उसे रोकने के खिलाफ सार्थक और ठोस कदम किसी ने नहीं उठाया। कारण था कि हमाम में सब नंगे थे। 500 और 1000 के नोट सिर्फ रिश्वतखोर अफसरो, कालाबाजारियों टैक्सचोर व्यापारियों, भ्रष्ट न्यायाधीशों की तिजोंरियो में नहीं भरे पड़े। इस काले धन की असली जड़ तो हमारी राजनैतिक व्यवस्था है। छुटमय्यै नेता से लेकर  दलों के पदाधिकारियों और ज्यादातर मंत्रीयों, मुख्यमंत्रीयों की दुकान इस दो नंबर की कमाई से ही चलती हैं।

शायद इसी कारण कल रात से ही वाट्सएप  पर एक चुटकुला चल रहा हैं: च्च्अब मायावती और मुलायम सिंह यूपी में क्या करेंगे क्योंकि जो नोटो की गड्डियंा चुनाव के लिए उन्होंने जमा कर रखी है वो तो अब बेकार हो गयी।  अब तो बीजेपी की पौबारह हो गयी।ज्ज्

इस चुटकुले को मजाक मानकर छोड़ दिया जाए तो भी ये हमारी राजनैतिक  व्यवस्था पर तल्ख टिप्पणी तो है ही। यकीन मानिए देश का समूचा राजनीतिक तन्ज इस पर चलता है। बीजेपी भी इसमें शामिल हैं। मोदी की राजनीतिक इच्छाशाक्ति को दाद देनी पड़ेगी क्येांकि बीजेपी के वोट बैंक यानि छोटे व्यपारियों, दुकानदारों और किरान स्टोरों का तो सारा काम ही कैश मे चलता है। 500 और 1000 के नोटों का चलन बंद करने से सबसे ज्यादा कुलबुलाहट इसी वर्ग में मच सकती है। यहां यह कहने का मकसद नहीं है कि ये सब भ्रष्ट हैं-मगर ये सब कैश में भी डील करते ही हैं। इसलिये उन्हें तकलीफ तो होगी ही। इसी तरह उनकी पार्टी के नेताओं को भी अन्य दलों के नेताओ की तरह काफी तकलीफ उठानी पड़ेगी।

देश की आर्थिक, प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था की सफाई के लिए उठाया गया ये कदम साहसिक होने के साथ-साथ राजनीतिक सूझबूझ और कुछ कर दिखाने की क्षमता का प्रतीक है। उन लोगों में उसे लेकर कफी बैचेनी है जिनके पास कालेधन की बोरियाँ भरी पड़ी हैं। हाल ही में एक परिचीत ने बताया कि सरकारी अफसर बड़े बेचैन हैं। उन्होंने पिछले हफ्ते ही दिल्ली में अपनी एक प्रोपर्टी बेची थी। पैसा मिला उसमें 60′ कैश में हैं। बेचारे को सूझ नही रहा की अब क्या करें। उसी तरह दिल्ली नगर निगम के कई नेता इधार उधर फोन करके पूछ रहें हैं कि च्च्भाईसाहब कोई तरीका हो तो बताओ, नहीं तो चुनाव लडने के लाले पड़ जाएंगे। ये किसी विपक्षी दल के नहीं बल्कि बीजेपी से ही ताल्लुक रखते हैं। कांग्रेस की हालत भी समझी जा सकती है। उसके कई नेताओ ने जा अकूल पैसा जमा किया है उसका अब क्या होगा? जिन नेताओ और अफसरों ने कालेधन से बेशुमार सम्पत्ति जमा की है उनके भी होश उड़े हुए हैं क्योंकि आने वाले दिनों में प्रापर्टी के दाम नीचे गिरने तो अब तय ही हैं। मगर हा कानून पसंद टैक्स देने वाला और मेहनत से पैसा कमाने वाला इस कदम की तारीफ कर रहा है। आज ईमानदार वेतनभोगी भारतीय अपने को सम्मान्ति सा महसूस कर रहा है क्योंकि उसने टैक्स की चोरी नहीं की। वह अब तक देखता था कि टैक्स चोर किस तरह से सम्पन्नताकी डींगें बखारते थे और वह बेचार घुटकर रह जाता था। कुछ लोग कह रहे हैं कि अगर ये बताकर होता तो ठीक रहता। अब जरा इनसें पूछिए कि अगर एक दो दिन का समय भी दे दिया गया होता तो लोग जुगत लगाकर काले धन को सफेद नहीं कर लेते?

पर ये उतना आसान भी नहीं होगा। महीने दो महीने सामान्य लोगों में काफी तकलीफ होगी। मगर ये तकलीफ वैसी ही होगी जैसी कि शरीर के पुराने फोड़े से मवाद निकलने में होती है। लोग ये भी जानते है कि अगर भ्रष्टाचार का मवाद समाज के शरीर से नहीं निकला तो फिर पूरा शरीर ही सड़ जाएगा। इसलिए मुझे यकीन है कि लोग राष्ट्र को शुचितापूर्ण और यकीन है गौरवशाली बनाने की इस प्रक्रिया में ये दर्द सहन कर लेगें।

 उमेश उपाध्याय

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