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भारत बनाम डी.आर.एस. बनाम विश्व

भारत बनाम डी.आर.एस. बनाम विश्व

एक लम्बे समय तक डी आर एस का विरोध करने के बाद, बी सी सी आई ने आखिरकार इसके इस्तेमाल को हरी झंडी दिखा ही दी। भारत और इंग्लैंड के पहले टेस्ट से पहले,बी सी सी आई ने इसे पहली बार ट्रायल आधार पर इस्तेमाल करने का फैसला किया था। बीसीसीआई हालांकि लंबे समय तक इस प्रणाली का विरोध करता रहा था। भारतीय टीम मैनेजमेंट को लगता था कि आउट देने के लिए जिस बॉल ट्रैकिंग सिस्टम का इस्तेमाल होता था, उसमें कई सारी खामियां थीं।

डी आर एस यानि निर्णय समीक्षा प्रणाली जिसमें खिलाड़ी अंपायर के फैसले को चुनौती दे सकता है। इसके बाद थर्ड अंपायर विभिन्न तकनीकी प्रणालियों की मदद से निर्णय की समीक्षा कर सही निर्णय लेता है। भारत ने अंतिम बार 2008 में श्रीलंका के खिलाफ उसकी सरजमीं पर डी आर एस का इस्तेमाल किया था। बोर्ड ने कहा कि आईसीसी और हॉकआई अधिकारियों के साथ हालिया बैठक में बी सी सी आई ने इस प्रणाली में किए गए सुधारों का आंकलन किया था। बोर्ड ने आगे कहा कि वह संतुष्ट है कि उसके द्वारा जतायी गयी चिंताओं और सुझावों का काफी हद तक निराकरण किया गया था।

जहां एक ओर विश्व के अधिक्तर देश इस सिस्टम को लागू करने के पक्ष में ही रहे वहीं क्रिकेट के सबसे बड़े बोर्ड की आनाकानी से यह खेल का नियमित रूप से हिस्सा नहीं बन सका। ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, दक्षिण अफ्रीका, पाकिस्तान व श्रीलंका जैसे देश समय-समय पर इसका इस्तेमाल करते रहे हैं। श्रीलंका में ही 2008 में पहली बार डीआरएस यानी डिसीजन रिव्यू सिस्टम का इस्तेमाल हुआ था। तब बीस रेफरल में से सिर्फ एक का फायदा भारत को मिला। तब से बीसीसीआई इसके खिलाफ रही है और द्विपक्षीय सीरीज में भारत इसका इस्तेमाल नहीं करने देता। विदेशी मीडिया कहती रही है कि सचिन तेंदुलकर डीआरएस के खिलाफ थे। इसलिए बीसीसीआई इसका विरोध करती रही है। वैसे आईसीसी के मैचों में डीआरएस लागू रहता है।

तेंदुलकर ने कहा कि ‘विश्व में हर जगह एक जैसी प्रौद्योगिकी होनी चाहिए क्योंकि मैंने पाया कि दुनिया के किसी हिस्से में स्निकोमीटर तो अन्य हिस्से में हॉटस्पाट का उपयोग किया जाता है इसमें एकरूपता नहीं थी। जब आप टेस्ट क्रिकेट खेलते हैं, तो कुछ चीजें जो दुनिया में हर जगह एक जैसी होनी चाहिए और जब डीआरएस इसका हिस्सा बन गया है, क्रिकेट से जुड़ गया है तो फिर यह विश्वभर में हर जगह एक जैसा होना चाहिए।’

वहीं पाकिस्तानी कप्तान मिस्बाह उल हक का मानना है कि यह काफी उपयोगी सिस्टम है और भविष्य में तकनीक खेल में काफी बड़ा योगदान अदा करेगी। इंग्लैंड के पूर्व कप्तान माइक ब्रीयर्ली ने  कहा, कि तकनीक की उपयोगिता से सब सहमत हैं और इसे आजमा भी रहे हैं लेकिन सिर्फ बीसीसीआई इसके खिलाफ थी। ऐसा कैसे हो सकता है। सोचिए कि प्रीमियर लीग में सभी टीमों के मैचों में गोललाइन तकनीक का इस्तेमाल हो लेकिन सिर्फ मैनचेस्टर युनाइटेड के मैचों में न हो, ऐसा कैसे हो सकता है। मेरी राय यह है कि डीआरएस में कोई कमी नहीं है। ऐसे में बीसीसीआई का इसे नहीं अपनाना, समझ से परे था।

वैसे डी आर एस को समझना इतना मुश्किल भी नहीं है। डी आर एस में पहले गेंद कहां पिच हुई फिर पडऩे के बाद किस तरफ गई और फिर क्या गेंद विकटों पर लगी, इत्यादी का निरीक्षण किया जाता है। साथ ही देखा जाता है कि क्या नो बॉल तो नहीं है और क्या बल्ले व गेंद के बीच कुछ संर्पक तो नहीं हुआ। किसी भी टीम को प्रत्येक पारी में कुल दो बार डी आर एस मिल सकता है। हां, अगर फैसला टीम के हक में हो तो डी आर एस कम नही होता।

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भारतीय कप्तान विराट कोहली भी यही मानते हैं, ‘मुझे लगता है कि टीवी पर देखकर हमने काफी सीखा है कि डीआरएस का इस्तेमाल कैसे होता है। अगर रैफरल लिया जाना है तो यह काफी हद तक इस पर निर्भर करता है कि गेंदबाज और विकेटकीपर विशिष्ट मामले को लेकर क्या सोचते हैं। यह सामान्य सी बात है। ऐसा नहीं है कि हम इस पर काफी ध्यान लगा रहे हैं। यह आपको सिर्फ उस फैसले को दोबारा देखने का मौका देता है जो आपको लगता है कि सही नहीं है। और मुझे लगता है कि यह उचित है। यह सिस्टम इस्तेमाल करने में बेहद आसान है और इसकी गतिविधि को समझने के लिए किसी प्रकार के कोर्स की जरूरत नहीं है। यही वजह है कि हमने कंसिस्टेंसी के साथ प्रदर्शन किया है और हमारा एक मात्र लक्ष्य, एक टीम के तौर पर बेहतर बनना और मैचों को जीतते जाना है। हमारे लिए कुछ भी नहीं बदला है।’

डी आर एस का भविष्य क्या है यह तो कह पाना अभी मुश्किल है। लेकिन भारत के सबसे जोशीले व आक्रामक कप्तान और भारत के सबसे सफल गेंदबाज व निवर्तमान कोच अनिल कुंबले ने डी आर एस पर सकारात्मक रवैया ही अपनाया है। और वैसे भी इस बार डी आर एस की तकनीक में काफी बदलाव किया गया है और इसकी सटीकता पर भी काफी ध्यान दिया गया है। अगर इंग्लैंड के खिलाफ भारत डी आर एस का सफल प्रयोग कर पाया तो भविष्य में डी आर एस खेल का नियमित हिस्सा होगा। उम्मीद तो यही है कि श्रंखला के साथ भारत डी आर एस की स्पर्धा में भी अंग्रेजों को मात दे।

सौरभ अग्रवाल

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