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मुनि तरुणसागर क्रांतिकारी राष्ट्रसंत

मुनि तरुणसागर क्रांतिकारी राष्ट्रसंत

भारत का इतिहास संतों और मुनियों की गौरवमयी गाथाओं से भरा है। इस देश की धरती पर अनेक तीर्थंकर, अवतार, महापुरुष एवं संतपुरुष अवतरित हुए जिन्होंने अपने व्यक्तित्व एवं कर्तव्य से समाज व राष्ट्र को सही दिशा और प्रेरणा दी। महापुरुषों की इस अविच्छिन्न परम्परा में जैन मुनि श्री तरुणसागरजी एक ऐसे ही क्रांतिकारी संत हैं जो देश में हिंसा और क्रूरता के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहे हैं तथा अहिंसक समाज की संरचना में संलग्न हैं। वे बहुआयामी साहित्य के सृजनकार हैं। एक महान साधक एवं आध्यात्मिक युगपुरुष भी हैं। अपने साहित्य के माध्यम से वे मानवीय मूल्यों के प्रति जनचेतना का सृजन अनेक वर्षों से कर रहे हैं। समाज में व्याप्त बुराइयों एवं विसंगतियों को दूर करने के लिये अपनी लेखनी एवं व्यवहार द्वारा जन-जन को आन्दोलित कर व्यापक परिवर्तन ला रहे हैं। उनके ‘कड़वे प्रवचन’ देश और दुनिया में लोकप्रिय ही नहीं है, बल्कि जन-जन को जीने की एक नई दिशा एवं नई दृष्टि प्रदत्त कर रहे हैं। ‘कड़वे प्रवचन’ उनकी  क्रांतिकारी व्यक्तित्व की पहचान तो है ही इसके साथ-साथ उसने अनेक विश्व कीर्तिमान स्थापित किये हैं। ‘कड़वे प्रवचन’ हिन्दी, अंग्रेजी, मराठी, गुजराती, बांग्ला, आसमिया, पंजाबी, उडिय़ा, नेपाली, तमिल, तेलुगू, मलयालम, कन्नड़, उर्दू  आदि भाषाओं में लाखों-लाखों प्रतियों में प्रकाशित हुआ है।

26 जून 1967 को दमोह जिले के गुहंची गांव में जन्मे मुनि तरुणसागरजी का पूर्व नाम पवन कुमार जैन था। पिता श्री प्रतापचंद जैन के घर-आंगन में माता श्रीमती शांतिबाई की कोख से जन्मा यह बालक बाल्यावस्था से ही विलक्षण प्रतिभा-संपन्नथा। मुनिश्री की प्राइमरी शिक्षा अपने गांव में हुई। इसके बाद जब वे माध्यमिक शिक्षा के लिए अपने गांव से 2 किलोमीटर दूर झालोन ग्राम में पढ़ रहे थे, तब एक दिन वहां युग प्रवर्तक जैनाचार्य पुष्पदंतसागरजी महाराज का आगमन हुआ। बालक पवन विद्यालय से अपने घर लौटते हुए मार्ग में आचार्यश्री का प्रवचन सुना। प्रवचन से वह बड़ा प्रभावित हुआ और जीवन को अध्यात्म के मार्ग पर ले जाने के लिये संकल्पित हो गया, उनके भीतर का संतत्व जाग उठा और 13 वर्ष की उस किशोरावस्था में उन्होंने गृह-त्याग कर दिया। 18 जनवरी, 1982 को अकलतरा (जिला-बिलासपुर, म.प्र) में देशव्यापी विरोध के बावजूद आचार्य श्री पुष्पदंतसागरजी के करकमलों द्वारा क्षुल्लक दीक्षा लेकर बालक पवन ने एक नया इतिहास रच डाला। उन्होंने जैन श्रमण जीवन की कठोर साधनाएं साधकर यह सिद्ध कर दिखाया कि धर्म पचपन में नहीं, बचपन में किया जा सकता है। निरन्तर अध्ययन-मनन किया एवं साधना को निरंतरता प्रदान करते हुए 20 जुलाई, 1988 को बांसवाडा जिले के बागीदौरा (राजस्थान) में दिगम्बरत्व का बाना लेकर समाज की नग्नता को ढकने के लिए अपने तन के वस्त्र तक छोड़ दिए।

मुनि तरूणसागरजी एक दिगम्बर मुनि है। ‘दिक् एवं अम्बरं यस्य स: दिगम्बर:।’ जिनका दिक् अर्थात दिशा ही वस्त्र हो, वह दिगम्बर। दिगम्बर का अर्थ यह भी है कि जो अंतरंग-बहिरंग परिग्रह से रहित है वो निर्ग्रन्थ है। निर्ग्रन्थता का अर्थ जो क्रोध, मान, माया, लोभ, अविद्या, कुसंस्कार काम आदि अंतरंग ग्रंथि तथा धन धान्य, स्त्री, पुत्र सम्पत्ति, विभूति आदि बहिरंग ग्रंथि से जो विमुक्त है उसको निर्ग्रन्थ कहते हैं। दिगम्बर मुनि आजीवन ब्रह्मचर्य की साधना करते हैं अर्थात मन में किसी भी प्रकार का विकार नहीं लाते इसलिए नग्न रहते हैं, हमेशा नंगे पैर पैदल चलते हैं, दिन भर (24 घंटे) में एक ही बार एक ही स्थान पर खड़े होकर अपने हाथों (अंजली) में ही पानी व शुद्ध बना हुआ भोजन लेते हैं। हाथ में मयूर पंख की पिच्छी धारण करते हैं जिससे सूक्ष्म से सूक्ष्म जीवों को भी हटाने में उन्हें कष्ट न हो, उनकी रक्षा हो। अपनी आत्मशक्ति को बढ़ाने के लिए केशलोंच करते हैं अर्थात सिर, दाढ़ी व मूंछ के बालों को दो महीने में हाथ से निकालते हैं। इस तरह अहिंसा का सूक्ष्म जीवन जीने वाले मुनि न केवल भारतवासियों के लिये बल्कि सम्पूर्ण दुनिया के लिये प्रणम्य है। ऐसे त्यागी एवं तपस्वी संतों की साधना पर ही यह दुनिया कायम है। किसी ने कहा भी है कि संत न होते जगत में तो जल जाता संसार। सुख शांति होती नही मचता हाहाकार।

किसी भी देश की माटी को प्रणम्य बनाने एवं कालखंड को अमरता प्रदान करने में साहित्यकार और धर्मगुरु की अहं भूमिका होती है। धर्मनेता होते हुए भी मुनि तरुण सागरजी राष्ट्र की अनेक समस्याओं के प्रति जागरूक ही नहीं हैं, अपितु समय-समय पर समस्याओं के समाधान के अनेक विकल्प भी प्रस्तुत करते रहते हैं। यही कारण है कि उनकी सांस-सांस में मानवीय मूल्यों के उत्थान की आहट सुनाई देती है, उनकी वाणी में लोकमंगल और सर्वकल्याण की भावना प्रतिध्वनित होती रहती है, उन्होंने जीवन के बहुमूल्य क्षण अपाहिज मानवता की सेवा में समर्पित कर दिए। ऐसे दूरद्रष्टा और उदात्त महापुरुष के राष्ट्रीय कर्तृत्व को उकेरना सूर्य को दीपक दिखाना होगा या मोम के दांतों से लोहे के चने चबाना। फिर भी उनके व्यक्तित्व को मापने के प्रयास होते रहे है। उनका विरोध भी बहुत हुआ है। वे विरोध को विनोद मानते रहे हैं। हाल में हरियाणा विधानसंभा में उनके प्रवचन से एक विवाद खड़ा हुआ, फिर किसी ने उन्हें ‘युग चेतना के प्रतिनिधि’ कहा तो किसी ने ‘नए युग का मसीहा’ कहा। किसी ने ‘राष्ट्र संत’ के रूप में उनकी अभ्यर्थना की तो किसी ने ‘कान्त द्रष्टा’ के रूप में अभिवंदना की। उनकी प्रवचन-सभा में जैन-अजैन का भेद समाप्त हो गया। परिणामस्वरूप उनका व्यक्तित्व और अधिक राष्ट्रव्यापी तथा सार्वजनीन बनता चला गया। विशेष अवसरों पर अनेक बार उन्होंने इस संकल्प को व्यक्त करते हैं।

मुनि तरुणसागरजी उनका व्यक्तित्व जितना सम्मोहक है, उनके विचार उतने ही प्रभावशाली हैं। जैन-मुनियों में काफी बड़े-बड़े संत हुए हैं, लेकिन देश और विदेश की गैर-जैन जनता पर अपनी छाप छोडऩे वाले मुनि तरुणसागरजी अद्वितीय संत हैं। संसार की ऐसी कौन सी समस्या है, जिस पर मुनिजी के विचार प्रकट न हुए हों। देश के राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक सभी ज्वलंत प्रश्नों पर तरुणसागरजी की दो टूक राय रही है। वे अपनी राय कभी छुपाते नहीं हैं। देश के बड़े नेता को भी वे अपनी बात साफ-साफ कह देते हैं, लेकिन उनके विचारों को पढऩे से पता चलता है कि कोई महापुरुष ‘सत्यं वद्,  प्रियं वद्’ की साधना कैसे करता है। इस अत्यंत दुर्लभ और अति-मानवीय गुण के स्वामी होने के कारण ही मुनि तरुणसागरजी का नाम देश के दिग-दिगन्त में गूंजता है।

मुनिश्री तरुणसागरजी के प्रवचन शास्त्र-सम्मत तो होते ही हैं किन्तु इतने सरल, व्यावहारिक, रोचक एवं बोधगम्य होते हैं जो सीधे हृदय को स्पर्श कर जाते हैं। उनके प्रवचनों में हर जगह अपार जनसमुदाय की माजूदगी इसका साक्षात प्रमाण है। उनके प्रवचन सर्वग्राही हैं। यही कारण है कि उनकी धर्मसभाओं में न केवल जैन बल्कि वैष्णव, सिंधि-पंजाबी बल्कि मुसलमान तक शिरकत करते देखे जा सकते हैं। मुनिश्री का चिंतन अत्यंत व्यापक और उदार है। वे केवल जैन धर्म या जैन समाज के हित में नहीं सोचते हैं बल्कि उनके चिंतन में राष्ट्रीयता और विश्व कल्याण की मंगल भावनाएं निहित हैं। यही कारण है कि वे जैन संत नहीं अपितु जन-जन के रूप में पहचाने जाते हैं। उनकी दृढ़ मान्यता है कि व्यक्ति-सुधार से ही राष्ट्र-सुधार संभव है।

धर्म के संबंध में मुनिश्री का चिंतन है कि धर्म ओढऩे की नहीं, जीने की चीज है। आज धर्म को जिया नहीं जा रहा है। यही कारण है कि भारत धर्मप्राण देश होने के बावजूद भी अनेक बुराइयों की गिरफ्त में है तथा निरंतर समस्याओं से जूझ रहा है। मानव सेवा और जनकल्याण के प्रति समर्पित मुनिश्री ने देश के कई प्रांतों में करीब हजारों किलोमीटर की पैदल यात्रा करके मार्ग में समागत हजारों-लाखों लोगों को धर्म का उपदेश देकर उन्हें मांसाहार, नशा तथा अन्य बुराइयों से मुक्ति दिलाई है। युवाओं को सामाजिक बुराइयों और व्यसनों से मुक्ति दिलाना उनका एक मिशन भी है। आधुनिकता और भौतिकता के दुष्चक्र से मुक्त होकर इस लोक में सुख और समृद्धि के साथ सार्थक जीवन जीने और जीवन-मुक्ति की दिशा में अग्रसर होने के लिए मुनिश्री तरुणसागरजी जो उपदेश दे रहे हैं, उन उपदेशों ने प्रेरणा लेने की जरूरत है।

लोगों का अनुभव है कि वे जब बोलते हैं तो केवल मुंह से नहीं बोलते हैं, उनका रोम-रोम बोलता है, कण-कण बोलता है। उनकी भाव-भंगिमा इतनी सजीव होती है कि प्रवचनों में प्राण आ जाते हंै। जो भी उनके मुखारविन्द से फूटी ज्ञानगंगा के झरनों में स्नान कर लेता है वह बार-बार इसकी अभिलाषा रखता है। वे कहते हैं कि जब तक इस मुल्क में आदर्शों को व्यावहारिक और सार्वजनिक जीवन में स्थान नहीं मिलेगा, तब तक जीवन, व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र समस्याओं से मुक्त नहीं हो सकता इसलिए वे महावीर स्वामी को चैराहे पर खड़ा करने की बात करते हैं। वे कहते हैं- ”मैं महावीर को मंदिरों से मुक्त करना चाहता हूं। यही कारण है कि मैंने आजकल तुम्हारे मंदिरों में प्रवचन करना बंद कर दिया है। मैं तो शहर के व्यस्ततम चौराहों पर प्रवचन करता हूं क्योंकि मैं महावीर को चौराहे पर खड़ा देखना चाहता हूं। मेरी एक ही आकांक्षा है कि महावीर जैनों से मुक्त हों ताकि उनका संदेश, उनकी चर्या, उनका आदर्श जीवन दुनिया के सामने आ सके।’’ निश्चित ही यह बड़े दुस्साहस की बात है कि आज तक किसी जैन मुनि ने इस तरह की बात नहीं कही लेकिन मुनिश्री ने जो क्रांति की घोषणा की है, वह समय की मांग है। मुनिश्री ने भगवान महावीर द्वारा निरूपित अहिंसा, अनेकांत और अपरिग्रह का पाठ दुनिया को पढ़ाने का बीड़ा उठाया है और अपने इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए अहर्निश संलग्न हैं।

ललित गर्ग

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