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भिंड में भड़के 1857 की क्रांति के शोले

भिंड में भड़के 1857 की क्रांति के शोले

लक्ष्मीबाई की जन्मतिथि (19 नवम्बर) पर भिण्ड की ऐतिहासिक वीरता का स्मरण

आजादी के प्रथम संग्राम 1857 में भारत का इतिहास भिंड होकर गुजरा था। झांसी की रानी कालपी से चिंगारी की तरह भिंड की ओर मुड़ी थी। भिंड के लोगों ने झांसी की रानी को जी जान से समर्थन देकर स्वतंत्रता संग्राम को एक ज्वाला बना दिया था। ग्वालियर की ओर बढ़ती युवा लक्ष्मी बाई वीरता और संकल्प के साथ जन सैलाब को साथ लिए हुए थीं। क्रांति की इस ज्वाला के हर कदम को विश्व उत्सुकता से देख रहा था।

ग्वालियर की धरती पर घटित होने वाले इस अभियान की सफलता तथा ब्रिटिश पूंजीवाद के समाप्ति की प्रतीक्षा में सारा विश्व टकटकी लगाए बैठा था। परंतु जो होना था वो नहीं हुआ। झांसी की रानी 1857 के संग्राम में अपना बलिदान देकर आजादी का बीज बोकर शहीद हो गईं।

4 अप्रैल 1858 को झांसी पर अंग्रेजों के घोर आक्रमण के बाद रानी को झांसी छोडऩा पड़ा। झांसी से पलायन में भी झलकारीबाई के बलिदान का स्वर्णिम इतिहास छिपा हुआ है। इस महायज्ञ में अपनी जान को न्योछावर कर देने वाली झलकारी बाई का बलिदान सभी की आत्मा को चौंकाता है।

इस महान बलिदान की मुंडेर से झांसी छोड़ते हुए रानी भांडेर की ओर बढ़ी। अंग्रेज उसका निरंतर पीछा कर रहे थे। भांडेर में एक जोखिम भरी मुठभेड़ को पार करते हुए रानी कालपी (उत्तर प्रदेश) पहुंचीं। रानी ने कालपी में ही अपने घोड़े को थामा। उन्होंने नाना साहेब के सामने अपनी तलवार समर्पित करते हुये कहा कि इन हालात में मुझे अंग्रेजों से टक्कर लेना संभव दिखाई नहीं दे रहा है। नाना साहेब के भतीजे राव साहेब तात्यांटोपे और बांदा के नवाब आदि के मजबूत आश्वासन पर झांसी की रानी ने फिर से अपना आत्मबल मजबूत किया और अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष करने का ऐलान किया।

क्रांतिकारियों की इस मुहिम की भनक पड़ते ही अंग्रेजों ने कालपी की घेराबंदी की, सर ह्यू रोज ने अंग्रेजी सेना के साथ कई दिनों तक चारों ओर से क्षेत्र में घेरा डाल दिया।

अन्ततोगत्वा क्रांतिकारियों को कालपी छोडऩा पड़ा। 26 मई को रानी तथा सहयोगी क्रांतिकारियों ने गोपालपुरा जालौन में आगे की रणनीति पर विचार किया, राव साहेब का सुझाव था की अपने पुराने साम्राज्य दक्षिण को पुन: मजबूत किया जाए। किसी ने बुंदेलखंड पर कब्जा करने का सुझाव दिया।

उल्लेखनीय है कि तात्यांटोपे ने कुछ समय पूर्व ग्वालियर कि सेना घुसपैठ कर क्रांतिकारियों का समर्थन हासिल किया था। निर्णय लिया कि ग्वालियर पर कब्जा करना अंग्रेजों को देश से बाहर करने के लिए उचित होगा। ब्रिगेडियर मालेशन ने 1857 का इतिहास लिखते हुये, इस निर्णय की सराहना की।

उनका मत था कि क्रांतिकारियों द्वारा ग्वालियर पर कब्जा करने से राजस्थान का राजपुताना बुंदेलखंड एवं दक्षिण के साथ दिल्ली पर भी अपने प्रभाव से अंग्रेजों को देश से बाहर करने में मदद मिलेगी।

भिंड के लोगों को जब युवा रानी के आजादी के संघर्ष की जानकारी मिली तो वे हजारों की तादाद में रानी के साथ हो गए, भले ही झांसी की रानी के पास सैन्य बल कम था परन्तु प्रबल जनसमर्थन उसके उत्साह और संकल्प को चौगुना कर रहा था। गोपालपुरा के इस महानिर्णय के साथ झांसी का अगला पड़ाव मिहौना था। 27 मई की शाम मिहौना में आकर बांदा के नवाब की सेना भी झांसी की रानी के साथ शामिल हो गई। इन्दुरखी, बोहारा के जागीरदारों ने झांसी की रानी को खुला समर्थन दिया। जनता के साथ रजवाड़े भी आजादी की इस लड़ाई में शामिल हो गये।

सिंधिया के ठोस प्रभाव क्षेत्र में झांसी की रानी अमायन पहुंची, सिंधिया के समर्थकों ने इस अभियान को रोकने का प्रयास किया, परन्तु राव साहेब ने कहा की सिंधिया तो हमारे ही साम्राज्य के हैं, अत: हम उनसे क्रांतिकारियों के लिए सहयोग की अपेक्षा करते हैं।

जन सैलाब के साथ क्रांतिकारियों का यह महा अभियान गोहद तहसील के देहगांव में 29  मई को पंहुचा। अगले दिन उत्साह से भरपूर रानी और सभी सहयोगी क्रांतिकारी ग्राम सुपावली (ग्वालियर) पहुंची। यहां पर भी सिंधिया के अधिकारियों ने ग्वालियर की तरफ रास्ता रोकने की कोशिश की। राव साहब ने कहा की वे दक्षिण की तरफ जा रहे हैं। परन्तु वे सिंधिया से अपनी सेना के लिए खाना एवं अन्य सहायता लेकर के ही आगे निकलेंगे।

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31 मई को भिंड की लगभग 1 लाख जनता, सैनिक क्रांतिकारियों के साथ मोरार के पास बड़ागांव पहुंची। यहां पहुंचने पर यह संशय बरकरार रहा कि संभवत: सिंधिया क्रांतिकारियों का सहयोग न करें। भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड कैनिंग सैन्य अधिकारियों को अपने टेलीग्राफिक सन्देश में व्यक्त किया था। ‘यदि सिंधिया विद्रोहियों से मिल जाते हैं तो हमें कल ही बिस्तर बांधना होगा।’

दूसरी ओर सिंधिया अंग्रेजों के मार्गदर्शन में क्रांतिकारियों का मुकाबला करने के लिए भी पूरी तैयारी कर ली थी। इस तैयारी में 9000 पैदल, 2300 घुड़सवार और 14 तोप से सेना सुसज्जित थी। 1 जून को सुबह सिंधिया की सेना की ओर से क्रांतिकारियों के पड़ाव पर तोप का एक गोला दागा गया। झांसी की रानी और राव साहेब चकित रह गये, यह भी विचार आया कि संभवत: सिंधिया की ओर से क्रांतिकारियों के स्वागत के लिए यह तोप का गोला दागा गया था। पर शीघ्र ही स्थिति स्पष्ट हो गई और क्रांतिकारियों से सिंधिया की सेना की मुठभेड़ हुई। पूर्व से क्रांतिकारियों का समर्थन का मन बनाये हुए सिंधिया की सेना क्रांतिकारियों से जा मिली। सिंधिया के दीवान दीनकर राव निरंतर अंग्रेजी रेजिडेंट के संपर्क में थे। अत: विपरीत परिस्थितियों को देखते हुए अंग्रेजों की सलाह पर क्रांतिकारियों से युद्ध त्याग कर सीधे ही महाराजा जीवाजी राव सिंधिया और उनके सहयोगी आगरा के लिए रवाना हो गये। क्रांतिकारियों ने ग्वालियर पर कब्जा कर लिया।

सिंधिया राज्य खजांची राम चंद्र माठिया ने क्रांतिकारियों का स्वागत करते हुए सरकार का पूरा खजाना सौंप दिया। इससे सभी सैनिकों को वेतन दिया गया और खाने और ठहरने की व्यवस्था की गई। दिनांक 3 जून को राव साहेब द्वारा विजय उत्सव मनाया गया। इस समारोह आयोजन को झंडो, मालाओं से और आम के हरे पत्तों से सजाया गया। खुशियां मनाई जा रही थीं कि अंग्रेजी शासन खत्म हो चुका है, और पुराना वैभव पुनस्र्थापित हो चुका है। 14 दिन तक ब्राह्मणों को भोजन कराने का आदेश दिया गया। मंगलमय भविष्य के आशीर्वाद अंग्रेजों के साथ रानी अंग्रेजों के पुन: आक्रमण को रोकने की तैयारियों में जुटी थीं।

राव साहेब द्वारा आयोजित इस जश्न में रानी ने भाग नहीं लिया। उनका मत था कि शीघ्र ही हमें अंग्रेजों से मुकाबला करना होगा। अत: वह सैन्य शक्ति की व्यवस्था में जुटी रही। रानी ने लगातार सैनिकों के साथ निरंतर गश्त कर किले के पश्चिम और पूर्वी मार्गों पर अंग्रेजों की किसी भी प्रकार की घुसपैठ रोकने के लिए सैनिक दस्ते तैनात किए। वे निरंतर हाथ में तलवार और घोड़े पर सवार होकर निरंतर नगर भ्रमण करती रहीं। झांसी कि रानी को सलाह देने पर भी उन्होंने शहर में विजय जुलूस निकालने से मना कर दिया। परिणाम स्वरूप आम जनता को यह स्पष्ट नहीं हो सका कि वास्तव में वे झांसी कि रानी के आधीन हो चुके हैं। ओर सेना में भी भ्रम की स्थिति बनी रही।

शीघ्र ही सुगठित अंग्रेजों द्वारा घेराबंदी ग्वालियर के चारों ओर होने लगी। सर ह्यूरोज ने 16 जून को मुरार में अपनी सेनाएं तैयार कर ली, दूसरी ओर ब्रिगेडियर स्मिथ ने कोटा के सरास से 17 जून को सुबह से ही अंग्रेज सैनिकों को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया। रानी द्वारा तैनात क्रांन्तिकारी सेना के दस्ते अंग्रेज सेनावों का मुकाबला नहीं कर सके। किले की ओर बढ़ती सेना अपना दबाव बनाय हुये थी। क्रांतिकारियों की सेनायें संगठित नहीं थी।

झांसी की रानी ही पूरे जोश से अंग्रेजों का मुकाबला कर रही थीं। सैनिकों के साथ युद्ध करते हुए एक अंग्रेज सैनिक ने रानी के सर पर तलवार से वार किया परंतु घायल रानी ने आक्रामकों के टुकड़े-टुकड़े कर दिये, इसके बाद रानी की भुजाएं, शक्तिहीन होती चली गई और वो गिर पड़ीं। उनकी इच्छानुसार गंगादास की बगिया में उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। अंग्रेज उनके शरीर को छू नहीं सके। सर रॉबर्ट हेमिल्टन ने प्रात: 9 बजे गवर्नर जनरल को टेलीग्राम से सूचित किया कि ‘झांसी की रानी मारी गई।’  रानी लक्ष्मीबाई देश में क्रांति की ज्वाला की प्रथम ज्योति बनकर सदा के लिए अमर हो गईं।

                (लेखक लोकसभा में सांसद हैं)

डॉ. भागीरथ प्रसाद

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