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वहाबियों के निशाने पर सूफी

वहाबियों के निशाने पर सूफी

पाकिस्तान में हाल ही में सूफी दरगाह नूरानी पर आईएस के आतंकवादियों द्वारा हमला इस बात का प्रतीक है कि पाकिस्तान भले ही मुस्लिम देश हो मगर वहां मुस्लिम पूजास्थल भी असुरक्षित है। अब तक कई सूफी संतों की दरगाहों पर हमले हो चुके हैं। कुछ माह पहले सूफी कव्वाली गायक साबरी की हत्या कर दी गई थी। ये हमले पाकिस्तान में सूफियों के खिलाफ वहाबी संप्रदाय के पिछले कई दशकों से चल रही जंग का अहम पड़ाव है। अब तक वहां तीस दरगाहों पर हमले हो चुके हैं।

सदियों से पाकिस्तान सूफी संतों की जमीन रहा है। इस्लाम की एक रहस्यवादी और सहिष्णु धारा, जिसकी रस्में सम्मोहित करने वाली हैं। आज भी इसे मानने वाले लाखों की संख्या में हैं लेकिन कट्टर वहाबी इस्लाम के विस्तार के साथ, सूफीवाद का दायरा कम हो रहा है। दरअसल सूफी पाकिस्तान में अल्पसंख्यक नहीं बहुसंख्यक है। कोई भी राजनीतिक पार्टी उनके  सहयोग के बिना सरकार नहीं चला सकती। असल में सूफी पाकिस्तान ही नहीं सारे भारतीय उपमहाद्धीप में मुस्लिमों में बहुसंख्यक हैं। उन्हें बरेलवी भी कहा जाता है, लेकिन हकीकत यह है कि बरेलवी कभी राजनीतिक तौर पर संगठित नहीं हो पाते यही कारण है कि उनके प्रतिद्वंदी संख्या कम होने के बावजूद संगठित होने में उनसे आगे हैं। यही वजह है कि वे वहाबियों का निशाना बन रहे हैं।

दुनिया के सभी बड़े आतंकवादी संगठन जैसे इस्लामिक स्टेट, अल कायदा, तालिबान, बोको हराम, अल शबाब पाकिस्तान के लश्करे तौयबा और जैशे मोहम्मद आदि वहाबी हैं। इन वहाबियों का पाकिस्तानी संस्करण है तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान जो हमेशा सूफी दरगाहों पर आतंकी हमलें करता है जिसमें सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं। मगर हाल ही का हमला आईएस ने किया है जो कुछ अर्से पहले ही पाकिस्तान में उभरा है। पिछले ही महीने उसने केडेट सेंटर पर हमला किया था जिसमें 70 केडेट मारे गए। आईएस अपने वहाबी रुझान के कारण सूफी दरगाहों को अपना निशाना बना रहा है। वहाबियों की सूफियों के खिलाफ जंग पाकिस्तान ही नहीं दुनिया के कई देशों में चल रही है।

डा. खुर्शीद अनवर के मुताबिक वहाबी संप्रदाय के संस्थापक मोहम्मद इब्न-अब्दुल-वहाब ने एक-एक कर इस्लाम में विकसित होती खूबसूरत और प्रगतिशील परंपराओं को ध्वस्त करना शुरू किया और उसे इतना संकीर्ण रूप दे दिया कि उसमें किसी तरह की आजादी, खुलेपन, सहिष्णुता और आपसी मेलजोल की गुंजाइश ही न रहे। कुरान और हदीस से बाहर जो भी है उसको नेस्तनाबूद करने का बीड़ा उसने उठाया। इस कारण वह दरगाहों और मजारों की पूजा आदि सूफियों के साथ इस्लाम  में अनेक परंपराओं को वह गैर इस्लामी मानती है और उसे खत्म करना चाहते हैं। वहाब ने लिखा ‘जो किसी कब्र, मजार के सामने इबादत करे या अल्लाह के अलावा किसी और से रिश्ता रखे वह मुशरिक (एकेश्वरवाद विरोधी) है और हर मुशरिक का खून बहाना और उसकी संपत्ति हड़पना हलाल और जायज है।’

 दूसरी तरफ जिन देशों में इस्लाम पहुंचा वहां सूफी मत भी पहुंच चुका था। सूफी भी मध्य पूर्व से लेकर दक्षिण एशिया खासकर भारत, पाकिस्तान, अफगानस्तान, तो  अफ्रीका में  सूडान, सोमालिया, नाइजीरिया, लीबिया, माली और ट्यूनिशिया, बालकान देशों मे चेचेन्या आदि देशों में फैले हुए है। वहाबी इस्लाम सारी दुनिया में अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहता है। तो इसका मुकाबला सूफी सिलसिलों के साथ होना ही था। वहाबियों को सारी मदद सऊदी अरब से मिलती है। तेल के कारण उसक पास अपार संपत्ति आई है इसके एक हिस्से को वह वहाबी इस्लाम  और आतंकवाद  को बढाने में  लगाता है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान  और अन्य देशों में  सैंकड़ों देवबंदी मदरसें सऊदी पैसे से बने हैं।

इराक, ईरान, पाकिस्तान, भारत  अफगानिस्तान, तुर्की, सीरिया, जॉर्डन, फिलीस्तीन जैसे और कई देशों में इस्लाम से जुड़ी ऐसी तमाम ऐतिहासिक धरोहरें हैं जिनका संबंध इस्लामी जगत के सूफी संतों, फकीरों, से है। पूरी दुनिया का मुसलमान ऐसी जगहों पर आता-जाता रहता है, मन्नतें व मुरादें मांगता है। जबकि इसके विपरीत वहाबी अल्लाह को सजदे यानी नमाज़ पढने के सिवा किसी भी अन्य स्थल, दरगाह, मकबरा आदि में चलने वाली गतिविधियों जैसे मजलिस, ताजिय़ादारी, नोहा, मातम, कव्वाली, नात आदि चीजों को गैर इस्लामी मानते हैं तथा इसे शिर्क (बहुदेववाद) की संज्ञा देते हैं। पाकिस्तान में यही विचारधारा दरगाहों, धार्मिक जुलूसों में आत्मघाती हमले तथा लोगों की हत्याएं करती नजर आती है।

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पाकिस्तान में तालिबान ने 2005 से  अब तक कम से कम तीस सूफी दरगाहों को निशाना बनाया है जिनमें कई तो सौ साल से ज्यादा पुराने थे। अब तक इस्लामाबाद के बड़ी इमाम दरगाह, मोहमंद एजेंसी में हाजी साहब तुरंगजई की दरगाह, पेशावर के चमखानी में अब्दुल शकूर बाबा की दरगाह समेत कई मकबरों, पेशावर में 17वीं सदी के सूफी कवि अब्दुल रहमान बाबा ,डेरा ग़ाज़ी खान में साखी सरवर दरगाह, पाकपत्तन शहर में एक सूफी दरगाह, चमकानी में फंडू बाबा की दरगाह, सूफी हजरत बाबा फरीद, सूफी अब्दुल्लाह शाह गाजी की दरगाह पर आतंकी हमले हो चुके हैं। जिनमें बड़ी तादाद में श्रद्दालु मारे गए। कभी अफगानिस्तान भी सूफी पीर औलिया और दरवेशों का केंद्र था। मगर  वहाबी इस्लाम के अनुयायी तालिबान की क्रुरता ने उन्हें जिंदा नहीं रहने दिया।

वहाबी आतंकवाद  केवल पाकिस्तान और अफगानिस्तान तक सीमित नहीं रहा। वह अफ्रीका के देशों में फैला हुआ है। नतीजतन अफ्रीका  के देश सूफी और वहाबी गृहयुद्ध का अखाड़ा बनते जा रहे हैं। सोमालिया जो मुख्यत: सूफी परंपरा का अनुयायी रहा है, वहां सऊदी हस्तक्षेप ने वहाबियत का जहर भर दिया। लेकिन यहा सूफीवाद और वहाबी इस्लाम के बीच संघर्ष जारी है लेकिन सोमालिया में अब सूफी संगठन के लोगों ने अल शबाब का मुकाबला करने के लिए बंदूक उठाली है। कहीं-कहीं वे सरकार का साथ भी दे रहे हैं जो अल शबाब पर नकेल कसने की कोशिश कर रही है। अल-शबाब के अलावा अफ्रीका में बोको हराम नाम से एक खतरनाक आतंकवादी संगठन लगातार सक्रिय है और यह भी अल-कायदा समर्थित है।

उसने हाल ही में नाइजीरिया में  कई सूफी मस्जिदों और मजारों के खिलाफ अभियान चलाया हुआ है। लीबिया में भी इस्लामी आतंकवादियों ने त्रिपोली और बेनगाजी में कई प्राचीन दरगाहों को अपना निशाना बनाया है। इस तरह वहाबियों की सूफियों के खिलाफ जंग अब अंतर्राष्ट्रीय रूप लेती जा रही है। सूफी भी अब संगठित होकर उसका जवाब देने लगे हैं।

सतीश पेडणेकर

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