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नोटबंदी यानी मोदी की सोशलिस्ट मुहिम

नोटबंदी यानी मोदी की सोशलिस्ट मुहिम
  • अमीर और गरीब के बीच बढ़ती गैर-बराबरी की खाई को पाटो
  • राजनीति में पैसेवालों और काले धन वालों का दबदबा घट जाएगा

भारत के इतिहास में 8 नवंबर 2016 की तारीख सबसे बड़े वित्तीय बदलाव के लिए जानी जाएगी, जो इसके पहले कभी नहीं हुआ। अब दस दिन बाद यह कहा जा सकता है कि लोगों को कम से कम तकलीफ के साथ यह दौर गुजर गया। इसमें कोई शक नहीं कि बैंकों में लंबी कतारें लगी हैं, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को तेजी से हो रहे मौद्रिक सुधार के साथ चलना होगा और खुदरा क्षेत्र में अस्थायी गिरावट भी दिखेगी।

एक ही झटके में देश में जारी 86 प्रतिशत मुद्रा को गैर-कानूनी करार दिया गया। इससे बैंकिंग व्यवस्था से अभी भी बाहर रहने वाली लगभग आधी आबादी हैरान रह गई, जो अपनी गाढ़ी कमाई को अपने पास रखने की आदी है और बैंक में जाने से कतराती है। यह बिलाशक क्रांतिकारी कदम है। राष्ट्रीय आय को हजम करने वालों ने करीब 14.90 लाख करोड़ रु. मूल्य के बड़े नोटों में से करीब 70 प्रतिशत काले धन के रूप में बैंकिंग व्यवस्था से छुपाकर रखा था। उन्हें सबसे अधिक चोट पहुंचने वाली है।

गरीबों को होने वाली तकलीफ के नाम पर नोटबंदी का विरोध करने वाले एक भी ठोस दलील नहीं दे पाए हैं। सभी इससे सहमत हैं कि भ्रष्टाचार से लड़ाई लडऩी चाहिए। वे इससे भी सहमत हैं कि काला धन भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा स्रोत है। इससे गैर-बराबरी और महंगाई बढ़ती है और मुद्रा का अवमूल्यन होता है। इतना ही चिंताजनक भारी मात्रा में नकली मुद्रा की मौजूदगी है, जो आतंक, अपराध वगैरह के काम आती है। सभी इससे भी सहमत हैं कि नकली नोट भी काले धन के बराबर ही बाजार में चल रहे हैं। हकीकत यह भी है कि कश्मीर घाटी में पिछले दस दिनों से शांति है। स्कूलों में इम्तिहान के लिए 100 फीसदी उपस्थिति है और माओवादियों की उगाही की रकम महज कागज के टुकड़े बन गई है। इससे इस सर्जिकल स्ट्राइक का मकसद पूरा होता दिख रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस कदम को भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर के. सुब्बा राव, रंगराजन, डॉ. मेघनाद देसाई और डॉ. सुरजित भल्ला सहित सभी समझदार अर्थशास्त्रियों ने साहसिक और लंबे समय से जरूरी बताया है। विपक्षी दलों का कहना है कि बैंकिंग व्यवस्था से एकदम बाहर दूर-दराज के लोगों को इससे भारी तकलीफ हो रही है। असम सरकार की तारीफ करनी होगी कि उसने दूर-दराज के इलाकों के चाय बागान मजदूरों की समस्या दूर करने के लिए अनोखा तरीका निकाला।

चाय बागान के कर्मचारी बैंक में खाता खोलने में कभी रुचि नहीं रखते रहे हैं। हजारों मील में फैले इलाके में करीब 40 लाख मजदूर वर्षों से हफ्ते में तनख्वाह पाते रहे हैं। मोदी ने नोटबंदी और नकद लेनदेन पर पाबंदी का ऐलान किया तो बकौल असम के मुख्य सचिव वी.के. पीपरसेनिया, सरकार की सबसे बड़ी चिंता चाय बागान के मजदूरों की थी। उन्होंने बताया कि केंद्र की मदद से राज्य सरकार ने चाय बागान मजदूरों को भुगतान के लिए पर्याप्त रकम निकालने की विशेष इजाजत हासिल की। इसमें निजी चाय कंपनियों का सहयोग लिया गया। कंपनियों से कहा गया कि वे राज्य सरकार के खाते में चेक जमा कराएं। राज्य सरकार ने उतनी ही रकम निकाली और बागान मजदूरों को तनख्वाह दिलाने में मदद की। दरअसल असम में कुछ ही दिनों में हालात सामान्य हो गए। यह दूसरे राज्यों के लिए भी उदाहरण है। पीपरसेनिया यह भी कहते हैं कि जल्दी ही ये सभी बैंक खाता वाले बन जाएंगे, जो वित्तीय समावेश की दिशा में एक बड़ा कदम होगा। इलाके में बैंकों के हजारों आउटलेट खुल जाएंगे। दरअसल, जन धन योजना के तहत पिछले दो साल में इतने खाते खुले हैं जितने आजादी के बाद से उसके पहले तक नहीं खुले थे।

अगर मकसद लाक कल्याण है तो नोटबंदी सबसे जनहितैषी कदम है। अब तक किसी भी सरकार ने ऐसा कदम नहीं उठाया है। जिस समाज में 59 प्रतिशत राष्ट्रीय संपत्ति महज एक प्रतिशत अमीर लोगों के पास हो और निचले पायदान के 10 प्रतिशत गरीब लोगों के पास महज 0.2 प्रतिशत संपत्ति हो, वहां गरीब-अमीर के बीच खाई बेहिसाब है। एक ताजा अध्ययन के मुताबिक, गरीब-अमीर के बीच यह खाई 2004 से 2014 के बीच 1480 गुना से 2450 गुना तक बढ़ गई है। ऐसे में नरेंद्र मोदी का यह कदम खाई को पाटने की दिशा में अहम है। समाज में ऐसी गैर-बराबरी बर्दाश्त के बाहर है। नोटबंदी इस दिशा में एक बड़ा कदम है।

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इस कदम के जरिए प्रधानमंत्री ने अपनी प्रतिबद्धता संविधान में प्रदत्त समानता की ओर जाहिर की है, जिसे डॉ. बी.आर. आंबेडकर ”सामाजिक और आर्थिक समानता’’ कहते हैं। इस कदम से धनबल और काले धन की भूमिका घट जाएगी। इससे सभी राजनैतिक उम्मीदवारों को समान अवसर उपलब्ध होंगे और राजनीति की ओर प्रतिभाओं का आकर्षण बढ़ेगा।

इससे कीमतें घटेंगी और ब्याज दरें कम होंगी। यह निवेश का माहौल भी पैदा करेगा। इससे अपराध और आतंक की गतिविधियों के लिए काले धन और नकली नोटों का इस्तेमाल बंद होगा, जिससे आम आदमी का जीवन सुरक्षित होगा। काले धन के खिलाफ मुहिम से सरकार के खजाने में अधिक राजस्व आएगा। इससे इंफ्रास्ट्रक्चर, कल्याणकारी योजनाओं, स्वास्थ्य और शिक्षा पर अधिक खर्च की संभावना बढ़ेगी। कैपिटेशन फीस के दिन अब लद गए। शिक्षा अब पहले जैसा कारोबार नहीं रह जाएगा। जमीन-जायदाद की बेहिसाब कीमतों के कारण सबको आवास और 5 करोड़ बीपीएल परिवारों को मुफ्त रसोई गैस कनेक्शन देने का मोदी का सपना पूरा नहीं होता। मोदी गरीबों का मसीहा बनकर उभरे हैं।

सरकार का उद्देश्य एक समतामूलक समाज का गठन, सत्ता के दलालों और कालेधन तथा भ्रष्टाचार का खात्मा है, ताकि संपत्ति का यथासंभव समान बंटवारा हो सके। नोटबंदी सर्वाजनिक खर्च में पारदर्शिता लाने और बहुसंख्यक आबादी की कीमत पर कुछ अमीरजादों के पैसे के भोंड़े प्रदर्शन को रोकने की शुरुआत है।

डॉ. आर. बालशंकर

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