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काला धन अपनी सत्ता खो बैठा

काला धन अपनी सत्ता खो बैठा

नरेन्द्र मोदी ने एक बार फिर धमाका कर दिया है। अचानक पाँच सौ और एक हज़ार के नोटों को अर्थव्यवस्था से बाहर कर दिया है। काला धन मुक्त भारत। इस देश में ज़्यादा देर तक कांग्रेस और सोनिया कांग्रेस का ही शासन रहा है इसलिए कांग्रेस और काले धन का चोली दामन का साथ हो गया है। चुनावों से पूर्व मोदी ने जनता से दो वायदे किए थे। कांग्रेस मुक्त भारत और काला धन मुक्त भारत। इस संकल्प को पूरा करने के लिए उन्होंने अचानक पाँच सौ और एक हज़ार के वर्तमान नोटों को शक्तिहीन कर दिया। आम जनता ने दीवाली मनाई लेकिन सोनिया कांग्रेस के पूर्व वित्त मंत्री और अपने आप को अर्थशास्त्री कहने वाले पी चिदम्बरम ने इस क़दम का डट कर विरोध किया। चिदम्बरम से बेहतर कोई नहीं जानता कि इस पहल का सोनिया कांग्रेस के लिए क्या अर्थ है। इसलिए उनको विरोध करना ही चाहिए था क्योंकि मोदी के इस कदम ने सोनिया कांग्रेस की सत्ता में वापसी की सारी उम्मीदों पर भी पानी फेर दिया है। पश्चिम बंगाल में शारदा चिट फंड घोटाले को देखते हुए ममता बनर्जी के विरोध को गंभीरता से न लें, तो सभी ने मोदी की इस पहल का स्वागत किया है। मोदी के इस प्रहार की सबसे बड़ी सफलता यही है कि इसे पूर्ण रुप से गुप्त रखा गया। अन्यथा जिस प्रकार की प्रशासनिक व्यवस्था देश में प्रचलित है, उसके चलते किसी महत्वपूर्ण निर्णय की गोपनीयता बनाए रखना अत्यन्त कठिन माना जाता है। पोखरण परमाणु बम विस्फोट के समय जिस प्रकार की गोपनीयता अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने दिखाई थी ,उसी का प्रदर्शन मोदी सरकार ने इस आर्थिक प्रहार के समय किया और इसी के कारण यह प्रहार सफल हो सका। कहा जाता है कि इस समय देश में चौदह लाख करोड़ का पैसा काले धन के रुप में विद्यमान है। एक मोटे अनुमान के अनुसार देश की अर्थव्यवस्था का पाँचवा हिस्सा, गोरा न होकर काला है। यही काला देश के विकास में सबसे बड़ी बाधा है और यह देश को घुन  की तरह खा रहा है। भ्रष्टाचार को प्रोत्साहित करने में इस काली अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा हाथ है। देश में आतंकवाद का पूरा वित्तीय आधार इयी काली अर्थव्यवस्था पर टिका हुआ है। पाकिस्तान में बैठा दाऊद इसी काले धन के बल पर उछल रहा है। इसलिए सबसे ज्यादा खलबली, आतंकवाद के सूत्र संचालित करने वालों की गुफ़ाओं में मची हुई है। कश्मीर घाटी में पिछले सौ दिनों से अलगाववादी जिस आंदोलन को सींच रहे थे , उसके स्रोतों में पड़ा करोड़ों रुपया क्षण भर में मिट्टी हो गया। गिलानी से लेकर हमदानी तक सब के घरों में मातम पसरा हुआ है।  जाली करंसी अपनी मौत ख़ुद मर जाएगी। देश का आम आदमी ख़ुश है, लेकिन जिन पर यह भीषण प्रहार हुआ है, वे सकते में हैं। एक और वर्ग इस पहल की चुभन बहुत ही बुरी तरह अनुभव कर रहा है  बड़े नौकरशाह, जिन्होंने दलालों के माध्यम से करोड़ों रुपए नकद अपने घरों में और गुसलखानों में छिपा कर रखे हुए थे। उसको ढूँढऩे में भ्रष्टाचार निरोधक दस्ते हलकान हो रहे थे। लेकिन उपलब्धि नगण्य होती थी। अब वह पैसा अपने आप मिट्टी हो गया। ऐसे घरों में भी रुदन हो रहा है।

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सबसे ज्यादा मातमीं धुनें रियल एस्टेट वालों के यहां बज रहीं हैं। क्योंकि ज्यादातर माफिया का पैसा रियल एस्टेट बिजनेस में ही लगा हुआ है। जिनके पास काली कमाई है, उसको सोने का अंडा देने वाली मुर्गी में तब्दील करने के लिए रियल एस्टेट से अच्छा रास्ता कोई नहीं है। यही कारण है कि हर जगह फ्लैट और मकान के भाव आसमान को छूने लगे हैं। (पाठक वर्ग याद रखें, फ्लैट वह है जो आसमान में लटका है और मकान वह है जो जमीन पर खड़ा है) दरअसल जिनके पास काली कमाई है उन्हें पचास लाख का फ्लैट एक करोड़ में खऱीदने में भी भला क्या दिक़्क़त हो सकती है? इसमें भी उसका लाभ ही है। उसकी हराम की कमाई हलाल की हो गई। इस कृत्रिम अर्थव्यवस्था से फ्लैट/मकान के भाव इतने ज्यादा हो गए कि सफेद कमाई वालों की पहुंच से ही बाहर हो गए। लेकिन मोदी के इस नए प्रहार ने ऐसे धन पशुओं के घरों में छिपे धन को मिट्टी में बदल दिया। इस लिए जिन्होंने गगनचुम्बी इमारतों का निर्माण कर रखा था, उन्हें ग्राहक मिलने कम होते जा रहे हैं। यही कारण है कि वे अपने मकानों को उस दाम पर बेचने को भी तैयार हो रहे हैं, जिस पर कम से कम उनकी लागत तो बच जाए। अब तक देश की अर्थव्यवस्था को काली या सफेद बनाने के कौशल में लगे नकाबपोश भी मानते हैं कि मोदी के इस कदम से फ्लैटों के भाव जमीन चाटते नजर आएंगे ताकि आम जनता भी उनको पकड़ सके। (वैसे मैंने भी अपने मित्रों को सचेत कर दिया था कि जिस दिन किसी फ्लैट की कीमत तेरह लाख पर आ जाए , तो मुझे बता देना ताकि मैं भी एक फ्लैट ले सकूं, क्योंकि मेरे पास अब तक कि कुल जमा पूंजी तेरह लाख की एफडी ही है। इससे वे निराश हो गए हैं। कीमत इतनी कम हो जाएगी, ऐसा वे मानने को तैयार नहीं हैं)

दुर्भाग्य से जिनके घरों में मातमी धुनें बज रही हैं, उन्होंने कुछ सीमा तक लोक संचार के माध्यमों पर कब्जा किया हुआ है। यही कारण है कि शुरु में कुछ चैनल किसी नत्थू राम को लेकर खड़े हैं। वह किसी रेलगाड़ी से उतरा है। उसके पास पांच सौ का नोट है। वह रेलवे स्टेशन पर खड़ी चाय बेचने वाली रेहडी से चाय पीना चाहता है। चाय बेचने वाला चाय देने को तैयार नहीं है। क्योंकि उसके लिए पांच सौ का नोट तो बेकार हो चुका है। वह खुले पैसे माँग रहा है। नत्थू राम कैसे चाय पीए? चैनल का आग्रह है कि इस नई आर्थिक नीति के उपयोगी होने या अनुपयोगी होने का मूल्यांकन नत्थू राम की चाय पीने की इस इच्छा को आधार बना कर करना चाहिए। दूसरा चैनल पहले का भी बाप है। उसने रेलवे स्टेशन पर ही किसी तोता राम को पकड़ रखा है। तोता राम भी ट्रेन से उतरा है। उसे टैक्सी पकड़ कर अपने घर जाना है। टैक्सी वाला पांच सौ का नोट लेने को तैयार नहीं है। इससे आम जनता में इस नई नीति से भारी असंतोष पैदा हो रहा है। देश की जनता को समझ नहीं आ रहा कि वह क्या करे। मोदी ने देश में अव्यवस्था फैला दी है। नत्थू राम चाय नहीं पी सकता, तोता राम टैक्सी करके घर नहीं जा सकता। इन दो उदाहरणों को आधार बना  कर चैनल पर एक भरा पूरा विशेषज्ञ दल इस नई आर्थिक नीति की समीक्षा में जुटा हुआ है। लोगों को इस झूठी बहस में उलझा कर चैनल का मालिक नोट गिन रहा है कि जल्दी से जल्दी इस का क्या किया जाए।

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अब लोक संचार माध्यमों पर दूसरा चरण शुरु होता है। नत्थू राम/तोता राम प्रकरण के बाद बैंकों के बाहर लम्बी लाईनों  पर देश के सारे चैनल केन्द्रित हो गए हैं। बैंकों के आगे लम्बी कतारों में लोग खड़े दिखाई देते हैं। वैसे ये लम्बी लाईनें अनेक बार रेलवे स्टेशनों पर भी देखी जाती हैं। कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि जो काले धन को सफेद करवाना चाहते हैं, उन्होंने भी अपने कर्मचारियों को लाईनों में खड़े कर रखा है। दिल का दौरा पडऩे से कुछ लोगों की लाईन में खड़े खड़े मौत हो गई -ऐसी कुछ खबरें भी आई हैं। लोगों को दिक्कत हो रही है, इसमें कोई संशय नहीं है। यह संक्रमण काल की दिक्कत है। यह हर युग और हर परिवर्तन काल में होती है। इसी दिक्कत में से परिवर्तन का नया सूर्य उदय होता है। इस देश में से अंग्रेजों को भगाने के लिए जब महात्मा गान्धी सत्याग्रह करते थे तो आम जनता को उस समय अनेक प्रकार की दिक्कतें होती थीं लेकिन देश की जनता उनको हंस कर बर्दाश्त ही नहीं करती थी बल्कि उसमें गान्धी जी का साथ भी देती थी क्योंकि उसे पता था इन्हीं संकटों में से नया सूर्योदय होगा। महात्मा गान्धी के समय अंग्रेजों से मुक्ति का सत्याग्रह था और इक्कीसवीं सदी में यह काले धन से मुक्ति का सत्याग्रह है। लेकिन उस समय भी मुल्क की अंग्रेजी अखबारें जनता की दिक्कतों का हवाला देकर महात्मा गान्धी के सत्याग्रह का विरोध करती थीं, उसी तरह आज भी कुछ लोक संचार माध्यम उन्हीं आधारों पर नरेन्द्र मोदी द्वारा काले धन के खिलाफ चलाए इस सत्याग्रह का विरोध कर रहे हैं। सभी जानते हैं कि नरेन्द्र मोदी सरकार का देश की अर्थव्यवस्था को साफ-सुथरा करने का यह ऐसा अभियान है जिसका विरोध तार्किक आधार पर करना संभव नहीं है। इस लिए अब उन्होंने नया रास्ता निकाला है। मोदी का यह क़दम तो ठीक है लेकिन सरकार ने पहले से इसकी तैयारी नहीं की थी। उसे यह तैयारी करने के बाद ही इसे लागू करना चाहिए था। ऐसे तर्क देने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि यदि पहले से ही बड़े स्तर पर इसकी तैयारी शुरु कर दी जाती तो यह योजना सफल ही न हो पाती। सब धनपशुओं और मगरमच्छों को इसकी भनक लग जाती और वे अपना काला मुंह सफेद कर लेते। इस योजना की सफलता का कारण ही इसकी आकस्मिकता रहा है। इस लिए सरकार विरोधी जत्थे बैंकों के आगे लगी लाईनों की स्क्रिप्ट को ही आधार बना कर अपनी नौटंकी कर रहे हैं।

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एक दिन इस नौटंकी में राहुल गान्धी भी कूद पड़े। वे एक बैंक के सामने खड़े होकर अपने चार हजार के नोट बदलाने के डायलाग बोलने लगे। उनके आने से आम जनता परेशान हो गई क्योंकि उनकी सुरक्षा के मुद्देनजर उस स्थान की घेराबन्दी कर ली गई थी। लेकिन राहुल गान्धी को यह छोटी सी बात समझ में नहीं आ रही थी। वे लाईन में खड़े होकर ही नोट बदलवाने के अपने संवाद बोलते रहे। लेकिन शायद राहुल गान्धी को पता नहीं था कि इस प्रकार के नुक्कड़ नाटकों में दर्शकों को भी संवाद बोलने की सुविधा होती है। यह बात उन्हें तब समझ आई जब लाईन में खड़े अनेक लोगों ने कहना शुरु कर दिया कि सबसे ज्यादा दिक्कत राहुल के आने से हो रही है।

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देश की अर्थव्यवस्था पर पैनी नजर रखने वाले मानते हैं कि सरकार के इस कदम से जम्मू कश्मीर के आतंकवादियों और नक्सल प्रभावित इलाकों में माओवादियों की कमर टूट गई है। जम्मू कश्मीर में आतंकवादियों की रणनीति को गहरा धक्का लगा है। लेकिन जम्मू कश्मीर के ग़ुलाम नबी आजाद इस बात को मानने को तैयार नहीं हैं। गुलाम नबी सोनिया गान्धी के खेमे के राजनीतिज्ञ हैं। सोनिया गान्धी ने उन्हें एक बार प्रान्त का मुख्यमंत्री भी बना दिया था। उन्हें इस बात का दुख है कि सरकार ने बड़े नोट बन्द क्यों कर दिए हैं। इससे जम्मू कश्मीर में आतंकवादियों पर नकेल कसी जाएगी, इससे उन्हें कुछ लेना देना नहीं है। जबकि जमीनी सच्चाई यह  कि सरकार के इस क दम से सबसे ज्यादा घबराहट गुलाम नवी आजाद के अपने राज्य जम्मू-कश्मीर के आतंकी संगठनों में ही मची हुई है। सरकार के इस कदम से घबराहट तो पाकिस्तान की आई एस आई में है, पाकिस्तान के उन तस्करों में है जो नेपाल और बांग्लादेश के रास्ते तस्करी में अरसे से संलग्न थे। नोटों के बन्द होने से इन की कमर टूट गई है।  सीमा के उस पार भी घबराहट है और जो आतंकी अन्दर घुस चुके हैं, उनके भी हाथ-पांव फूले हुए हैं। कागज के जिन नोटों की झलक दिखा कर वे घाटी के लोगों को सड़कों पर नाच नचवाते थे उन नोटों की ताकत अब समाप्त हो गई है। कश्मीर घाटी के आतंकी संगठनों की हालत पंचतंत्र के उस चूहे के समान हो गई है, जिस के बिल के नीचे से स्वर्ण मुद्राओं से भरा घड़ा निकाल लिया गया है और अब वह लाख जोर लगाने पर भी दूर खूंटी पर लटके सत्तू के थैले तक नहीं पहुंच पा रहा है। आतंकवादियों और उनके प्रत्यक्ष परोक्ष पैरोकारों को छोड़ कर बाकी सभी लोग सरकार के इस फैसले से खुश हैं। वहां पत्थरबाजी की घटनाएं समाप्त हो गईं हैं क्योंकि एक पत्थर मारने के लिए जो पांच सौ रुपए मिलते थे, वे आतंकवादियों के हाथों में रखे रखे ही मिट्टी हो गए हैं। पाकिस्तान आतंकी संगठनों को जाली भारतीय करंसी मुहैया करवाता था, वह मशीन बन्द हो गई है । आशा बनने लगी है कि जम्मू-कश्मीर में सामान्य जन -जीवन पटरी पर लौटने लगा है। जम्मू कश्मीर के बाशिंदे होने के नाते गुलाम नवी को तो सरकार के इस साहसी कदम का स्वागत करना चाहिए था। जम्मू-कश्मीर का आतंकवादी उद्योग जिस काले धन के बलबूते फल-फूल रहा था, वह काला धन भारत सरकार ने इस साहसी पहल से मिट्टी कर दिया है।

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लेकिन गुलाम नबी खुश नहीं हैं। वे एक ही स्थान पर अड़ गए हैं। उनका कहना है कि सेना के उड़ी शिविर पर हमला करके पाकिस्तानी आतंकवादियों ने जो उन्नीस भारतीय सैनिक शहीद कर दिए थे, उसी तर्ज पर बैंक के आगे दिल का दौरा पडऩे से स्वर्गवास हो गए व्यक्ति को शहीद मान लिया जाए। यदि गहराई से विश्लेषण किया जाए तो गुलाम नबी आजाद के कहने का अर्थ है कि उड़ी में भारतीय सैनिक पाकिस्तान के आतंकवाद का शिकार हुए हैं और बैंक के आगे दिल का दौरा पडऩे से स्वर्गवास हुआ व्यक्ति सरकार के आतंक से मरा है। इतनी गहरी बात गुलाम नबी आजाद ही कह सकते हैं और उस पर अडे भी रह सकते हैं। पाकिस्तान सरकार का भी यही आरोप है कि भारत सरकार जम्मू-कश्मीर में लोगों को अपने आतंक का शिकार बना रही है। गुलाम नवी आजाद ने भी लगभग यही बात कहीं है। अन्तर केवल इतना ही है कि बैंक के आगे दिल के दौरे से स्वर्गवास हो जाने वाला कोई व्यक्ति अभी तक जम्मू कश्मीर का नहीं है, इसलिए उन्हें फिलहाल यह कहने का मौका नहीं मिला कि सरकार का यह कदम जम्मू-कश्मीर के लोगों पर एक और प्रहार है। हो सकता है वे जम्मू कश्मीर में से काले धन/नकली नोटों/तस्करी की अर्थव्यवस्था को समाप्त करने के लिए भारत सरकार द्वारा उठाए इस कदम  पर चर्चा करने के लिए भी राज्य के सभी सटेक्होलडरज को बातचीत के लिए आमंत्रित करने की मांग भी कर दें। सभी जानते हैं कि सोनिया कांग्रेस स्टेकहोल्डरज में हुर्रियत कान्फ्रेंस को भी मानती है और हुर्रियत वाले इसमें पाकिस्तान को भी शामिल को भी शामिल करते हैं। गुलाम नबी आजाद को पूरी आज़ादी है कि वे सरकार के इस फैसले का विरोध करें। यदि वे मानते हैं कि यह कदम जन विरोधी है तो उन्हें इसकी तार्किक आलोचना भी करनी ही चाहिए। लेकिन आखिर गुलाम नबी आजाद इस फैसले की तुलना जम्मू कश्मीर में आतंकवादियों के हाथों मारे गए सैनिकों से क्यों कर रहे हैं? कहीं इसका उद्देश्य लोगों का ध्यान कश्मीर घाटी में आतंकियों की पैशाचिक हरकतों से हटाना तो नहीं है? या फिर गुलाम नबी आजाद भारत सरकार को भी पाकिस्तान समर्पित आतंकी संगठनों के समकक्ष पेश करना चाहते हैं? जम्मू-कश्मीर आजकल जिस प्रकार पाकिस्तानी हमलों का शिकार हो रहा है, उस वातावरण में गुलाम नबी के गुलाम बोल सचमुच व्यथित करते हैं। इस प्रकार के विश्लेषणों से पाकिस्तान समर्थक आतंकियों को सम्मान मिलता है। उन्होंने पुराने नोटों का चलन बंद होने से हुई इक्का-दुक्का घटनाओं की तुलना उड़ी के शहीदों से कर, एक प्रकार से उन शहीदों का ही नहीं, बल्कि आतंकवाद के खिलाफ चल रही इस लड़ाई में शहादत प्राप्त किए हर शहीद का अपमान किया है। लेकिन इतना भी पक्का है कि ग़ुलाम नबी अपने इस व्यवहार पर मुआफी नहीं मांगेंगे। क्योंकि नरेन्द्र मोदी का विरोध करने में वे किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। मोदी ने इस पूरी जमात को सत्ताच्युत कर दिया है। उसी सत्ता की लालसा में सोनिया कांग्रेस के मणिशंकर अय्यर पाकिस्तान में जाकर वहा के लोगों से कह सकते हैं कि आप मोदी को हटाओ तो गुलाम नबी मोदी सरकार को पाकिस्तान के आतंकियों के बराबर कैसे नहीं ठहरा सकते? राजनीति का इतना पतन हो जायेगा, ऐसी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। लेकिन गुलाम नबी के गुलाम बोल। वे आखिर किस की गुलामी कर रहे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि वे ख़ुश होने के लिए भी आजाद नहीं हैं?

भारत की अर्थव्यवस्था में लम्बे अरसे से इस पहल की जरुरत थी। देश की एक समानान्तर अर्थव्यवस्था बैंकों से बाहर ही चल रही थी। इसका निवेश उत्पादन क्षेत्र में नहीं होता था। अब इस अर्थव्यवस्था को मजबूरन बैंकों के दायरे में आना पड़ेगा। बैंकों के दायरे में आने का अर्थ है, उसका लाभ देश के विकास में लिया जा सकेगा। अब तक यह काली समानान्तर अर्थव्यवस्था कुछ गिने चुने धन-पशुओं के भोग विलास का साधन थी। मैं यह मानने को तैयार नहीं की डा. मनमोहन सिंह इसकी आवश्यकता को समझते नहीं होंगे। लेकिन उनका नियंत्रण सोनिया गान्धी के पास था, वह शायद उन्हें यह कदम उठाने की अनुमति नहीं देती होंगी। क्योंकि इस कदम से अन्तत: कांग्रेस पार्टी ही ज्यादा घायल होती।

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ब्रह्मांड के हर विषय पर चीं-चीं करने वाले अरविन्द केजरीवाल जो इस समय दिल्ली शहर के मुख्यमंत्री हैं, को शुरु में तो जैसे लकवा ही मार गया हो। अंत में ममता बनर्जी को समर्थन देकर अपने पुराने राजनैतिक गुरु अन्ना हजारे का नाम बदनाम किया। अब वे फिर चहकने लगे हैं। नोट बंद करने को भी वे एक बड़ा घोटाला बता रहे हैं। दिल्ली में कभी सब्ज़ी मंडी जाकर खड़े हो जाते और बताने लगते हैं कि इस निर्णय से सभी गरीब कितना हलकान हो रहे हैं। मंडी के सभी गरीब लोग हंसते हैं और बीच बीच में मोदी-मोदी कहने लगते हैं। पंजाब में जाकर भाषण कर रहे हैं। मोदी ने नोट बंद करके गरीब आदमी की कमर तोड़ दी है। लोग तालियां बजाते हैं और टैलीविजन वालों को बताते हैं कि मोदी ने यह कदम उठा कर भ्रष्टाचारियों पर नकेल कस दी है। मायावती और मुलायम सिंह का कुनबा पूछ रहा है कि इस कदम से भ्रष्टाचार कैसे रुकेगा? काला धन कैसे बाहर आएगा? शायद इन दोनों से बेहतर कोई नहीं जानता कि मोदी के इस कदम का बाकी लोगों पर जो असर पड़ेगा, उसका पता बाद में चलेगा, लेकिन इन दोनों की हवा इस पहल ने निकाल दी है। इन दोनों का विरोध ही यह दर्शाता है कि चोट कितनी गहरी और घातक है। चुनाव सिर पर हैं और मोदी ने सब गुड़-गोबर कर दिया। नोटों के बंधे-बंधाए बंडलों को वहीं पड़े पड़े मिट्टी कर दिया। मिट्टी से चुनाव जीता जाता है क्या? मायावती, मुलायम, राहुल गान्धी, केजरीवाल, शरद यादव सब मिल कर चलने की कोशिश कर रहे हैं ताकि एटीएम के बाहर खड़े लोगों को जाकर बता सकें कि वे कितने कष्ट में हैं। लोग हैं कि लाईन में खड़े धक्का-मुक्की भी सह रहे हैं लेकिन बीच में कह भी देते हैं। कहो जो मर्जी, लेकिन मोदी ने कमाल कर दिया।

 कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

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